कम पानी, कम बीज और ज्यादा कमाई-क्या है चिया सीड्स की खेती का राज?

चिया सीड्स की खेती की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी है. इस फसल में न तो भारी मात्रा में खाद डालने की जरूरत पड़ती है और न ही बार-बार दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता है. पौधों में मौजूद प्राकृतिक गंध की वजह से जानवर भी इसे नुकसान नहीं पहुंचाते.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 13 Feb, 2026 | 10:00 AM

Chia seeds farming: खेती अब सिर्फ परंपरा निभाने का काम नहीं रह गई है, बल्कि यह समझदारी और सही फसल चुनने का खेल बन चुकी है. बढ़ती लागत और बदलते मौसम के बीच किसान ऐसी फसल चाहते हैं, जिसमें जोखिम कम हो और मुनाफा ज्यादा मिले. इसी जरूरत ने चिया सीड्स की खेती को किसानों के बीच लोकप्रिय बना दिया है. सेहत के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण चिया सीड्स की मांग तेजी से बढ़ रही है और यही वजह है कि आज यह फसल किसानों के लिए “सफेद सोना” साबित हो रही है.

क्यों खास है चिया सीड्स की खेती

चिया सीड्स की खेती की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी है. इस फसल में न तो भारी मात्रा में खाद डालने की जरूरत पड़ती है और न ही बार-बार दवाइयों का छिड़काव करना पड़ता है. पौधों में मौजूद प्राकृतिक गंध की वजह से जानवर भी इसे नुकसान नहीं पहुंचाते. इसके अलावा चिया सीड्स पोषण से भरपूर होते हैं. इनमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, फाइबर, प्रोटीन और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं. यही कारण है कि हेल्थ फूड, डायट प्लान और आयुर्वेदिक उत्पादों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है.

कम पानी और कम बीज में तैयार फसल

चिया की खेती रबी मौसम में आसानी से की जा सकती है. इस फसल को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, जिससे यह उन इलाकों के लिए भी उपयुक्त है जहां सिंचाई की सुविधा सीमित है. चिया की फसल 90 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है. बीज की मात्रा भी बहुत कम लगती है. एक एकड़ खेत के लिए केवल 1.5 से 2 किलो बीज पर्याप्त होता है, जिससे शुरुआती लागत काफी कम हो जाती है.

चिया सीड्स की खेती की पूरी प्रक्रिया

चिया की खेती की प्रक्रिया सरल है, जिसे कोई भी किसान आसानी से अपना सकता है.

खेत की तैयारी

सबसे पहले खेत की एक से दो बार हल्की जुताई करें. मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए ताकि बीज आसानी से जम सके. जल निकास की उचित व्यवस्था जरूरी है, क्योंकि खेत में पानी भरने से फसल को नुकसान हो सकता है.

बीज बोने का तरीका

बीज को खेत में छिटकवां विधि से या हल्की कतारों में बोया जा सकता है. बीज बहुत छोटे होते हैं, इसलिए उन्हें ज्यादा गहराई में न बोएं. हल्की मिट्टी डालकर बीज को ढक देना पर्याप्त होता है.

सिंचाई प्रबंधन

बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें. इसके बाद जरूरत के अनुसार सिंचाई करें. ज्यादा पानी देने से बचें, क्योंकि चिया की फसल कम पानी में बेहतर बढ़ती है.

खाद और पोषण

अगर खेत की मिट्टी उपजाऊ है, तो अतिरिक्त रासायनिक खाद की जरूरत नहीं पड़ती. गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट एक बार डालना काफी होता है. इससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और उपज भी अच्छी मिलती है.

खरपतवार नियंत्रण

शुरुआती 20–25 दिनों में एक बार निराई-गुड़ाई करना फायदेमंद रहता है. इसके बाद पौधे खुद ही खरपतवार को दबा देते हैं.

फसल की देखभाल

चिया की फसल में कीट और रोग बहुत कम लगते हैं. जरूरत पड़ने पर नीम आधारित घोल का हल्का छिड़काव किया जा सकता है.

कटाई और बीज निकालने की विधि

जब पौधे पूरी तरह पक जाते हैं और उनके फूल सूखने लगते हैं, तब कटाई का समय आ जाता है. सही समय पर कटाई करना जरूरी है, ताकि बीज झड़ें नहीं. कटाई के बाद पौधों को सुखाया जाता है और फिर हल्की पिटाई या मशीन की मदद से बीज निकाले जाते हैं. बीजों को अच्छी तरह साफ और सुखाकर भंडारण किया जाता है.

सिर्फ मंडी नहीं, खुद बनाएं बाजार

चिया सीड्स की मांग सिर्फ मंडियों तक सीमित नहीं है. किसान सीधे व्यापारियों, प्रोसेसिंग यूनिट, हेल्थ फूड कंपनियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से भी जुड़ सकते हैं. अगर किसान पैकिंग और ब्रांडिंग पर ध्यान दें, तो उन्हें और बेहतर दाम मिल सकता है. आज कई किसान सीधे उपभोक्ताओं को चिया सीड्स बेचकर ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं.

लागत कम, मुनाफा ज्यादा

चिया की खेती में बुवाई से लेकर कटाई तक कुल लागत लगभग 6,000 से 7,000 रुपये प्रति एकड़ आती है. वहीं उत्पादन 4 से 6 क्विंटल प्रति एकड़ तक हो सकता है. बाजार में चिया सीड्स की कीमत गुणवत्ता के आधार पर 14,000 से 18,000 रुपये प्रति क्विंटल तक मिल रही है. इस हिसाब से यह फसल पारंपरिक फसलों की तुलना में कहीं ज्यादा लाभदायक साबित होती है.

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