Economic Survey: मक्का एथेनॉल से बढ़ी आमदनी, फिर भी धान नहीं छोड़ रहे किसान… आखिर क्यों दालों को हुआ नुकसान

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा नुकसान दालों को हुआ. आर्थिक समीक्षा बताती है कि दालों का रकबा लगभग 276.2 लाख हेक्टेयर पर ही अटका रहा. उत्पादन में भी खास बढ़ोतरी नहीं हुई. असल में किसान वही फसल चुनता है, जिसमें उसे कम जोखिम और पक्की कमाई दिखती है. मक्का और धान दोनों में सरकारी नीतियों और बाजार का भरोसा ज्यादा है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 30 Jan, 2026 | 10:35 AM

सरकार ने जब पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की योजना को तेज किया था, तब इसके पीछे दो बड़े मकसद थे. पहला, देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना और दूसरा, किसानों को नई फसलों की ओर प्रेरित करना. खासतौर पर मक्का से बनने वाले एथेनॉल को बढ़ावा दिया गया ताकि किसान पानी ज्यादा खपत करने वाली धान की खेती छोड़कर मक्का अपनाएं. लेकिन आर्थिक समीक्षा 2025-26 बताती है कि तस्वीर वैसी नहीं बदली, जैसी उम्मीद की गई थी.

दरअसल, बीते कुछ सालों में मक्का आधारित एथेनॉल के दाम तेजी से बढ़े, फिर भी धान की खेती का रकबा कम नहीं हुआ. उल्टा, दालों जैसी जरूरी फसलें इस बदलाव में पीछे छूटती चली गईं.

मक्का-एथेनॉल के दाम तेजी से बढ़े

आर्थिक समीक्षा के मुताबिक वित्त वर्ष 2022 से 2025 के बीच मक्का से बनने वाले एथेनॉल की सरकारी कीमतों में हर साल औसतन 11.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. यह बढ़ोतरी चावल या शीरे से बनने वाले एथेनॉल की तुलना में कहीं ज्यादा थी. इससे साफ संकेत मिला कि सरकार मक्का को एथेनॉल के लिए एक मजबूत विकल्प के तौर पर आगे बढ़ाना चाहती है.

तेल कंपनियों की तरफ से एथेनॉल की खरीद भी तय कीमत पर की जाती है, जिससे बाजार में मक्का की मांग मजबूत बनी रही. सरकार की सोच यह थी कि इस मजबूत मांग के कारण किसान धान से हटकर मक्का की खेती करने लगेंगे.

धान की खेती क्यों नहीं घटी

फसल वर्ष 2024-25 में देश में धान की खेती का रकबा 7.5 प्रतिशत बढ़कर 514.2 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया. भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक बन गया, जबकि पहले से ही चावल का भंडार जरूरत से ज्यादा था.

मक्का की खेती में भी बढ़ोतरी जरूर हुई. इसी साल मक्का का रकबा करीब 6.9 प्रतिशत बढ़कर 120.2 लाख हेक्टेयर हो गया. यानी किसान मक्का की ओर आए, लेकिन उन्होंने धान छोड़ा नहीं. दोनों फसलें साथ-साथ बढ़ती रहीं.

दालों की खेती को हुआ नुकसान

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा नुकसान दालों को हुआ. आर्थिक समीक्षा बताती है कि दालों का रकबा लगभग 276.2 लाख हेक्टेयर पर ही अटका रहा. उत्पादन में भी खास बढ़ोतरी नहीं हुई.

असल में किसान वही फसल चुनता है, जिसमें उसे कम जोखिम और पक्की कमाई दिखती है. मक्का और धान दोनों में सरकारी नीतियों और बाजार का भरोसा ज्यादा है, जबकि दालों में कीमतों का उतार-चढ़ाव और उत्पादन का जोखिम बना रहता है. इसी वजह से किसान दालों से दूरी बनाते जा रहे हैं.

मक्का की पैदावार में बड़ा सुधार

आर्थिक समीक्षा में यह भी बताया गया है कि मक्का की पैदावार में जबरदस्त सुधार हुआ है. वित्त वर्ष 2016 में जहां मक्का की औसत पैदावार 2.56 टन प्रति हेक्टेयर थी, वहीं 2025 तक यह बढ़कर 3.78 टन प्रति हेक्टेयर हो गई.

बेहतर बीज, तकनीक और एथेनॉल उद्योग की मांग ने मक्का को किसानों के लिए आकर्षक बना दिया है. अब मक्का ऐसी फसल बन गई है, जिसे किसान बिना किसी बड़े सरकारी दबाव के भी अपनाने को तैयार हैं.

दूसरी फसलों की स्थिति कमजोर

हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू चिंताजनक है. सोयाबीन, सूरजमुखी, सरसों, मूंगफली और मोटे अनाज जैसी कई फसलों की पैदावार या तो स्थिर रही या घट गई. इससे साफ है कि खेती में संतुलन बिगड़ रहा है और फसल विविधता को नुकसान हो रहा है.

ऊर्जा सुरक्षा में एथेनॉल की अहम भूमिका

आर्थिक समीक्षा यह भी मानती है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी बन चुका है. इससे कच्चे तेल का आयात घटा है, विदेशी मुद्रा की बचत हुई है और प्रदूषण भी कम हुआ है. साथ ही एथेनॉल उद्योग के जरिए किसानों को समय पर भुगतान मिला है.

इसेक साथ ही रिपोर्ट से साफ है कि सिर्फ कीमतें बढ़ाने से खेती की तस्वीर नहीं बदलती. अगर सरकार चाहती है कि किसान धान से हटकर दूसरी फसलों की ओर जाएं, तो पानी की उपलब्धता, फसल बीमा, खरीद की गारंटी और स्थिर आय जैसे मुद्दों पर भी बराबर ध्यान देना होगा.

मक्का-एथेनॉल नीति ने ऊर्जा क्षेत्र में अच्छा काम किया है, लेकिन खेती में संतुलन बनाए रखने के लिए अब दालों और दूसरी फसलों को भी उतना ही मजबूत सहारा देना जरूरी हो गया है. तभी किसान की कमाई भी बढ़ेगी और देश की खेती भी टिकाऊ बन पाएगी.

 

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