Tip Of The Day: बाजार में 20 रुपये ज्यादा दाम… एक्सपर्ट से जानें क्यों काली गाजर बन रही किसानों की पहली पसंद
Black Carrot Farming: काली गाजर की खेती किसानों के लिए तेजी से मुनाफे का नया जरिया बन रही है. औषधीय गुणों से भरपूर और बाजार में कम उपलब्ध होने के कारण इसकी मांग लगातार बढ़ रही है. बाजार में सामान्य गाजर से 10-20 रुपये प्रति किलो ज्यादा कीमत मिलने से यह फसल कम लागत में ज्यादा फायदा देने वाला विकल्प साबित हो रही है.
Kali Gajar Ki Kheti: आज के समय में किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ ऐसी खेती की तलाश में हैं, जो कम लागत में ज्यादा मुनाफा दे सके. ऐसे में कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार बताते हैं कि, काली गाजर की खेती किसानों के बीच इस समय तेजी से लोकप्रिय हो रही है. यह फसल लाल या नारंगी गाजर की तुलना में बाजार में कम उपलब्ध होती है, जिसके कारण इसकी मांग और कीमत दोनों बेहतर मिलती हैं. पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण लोगों के बीच इसकी पहचान लगातार बढ़ रही है.
क्या खास है काली गाजर में?
गाजर कई रंगों में पाई जाती है, लाल, नारंगी, पीली, बैंगनी और काली. काली गाजर में एंथोसाइनिन नाम का पिगमेंट ज्यादा मात्रा में होता है, जो इसे गहरा बैंगनी या काला रंग देता है. यही तत्व इसे शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट गुण से भरपूर बनाता है. इसमें विटामिन-ए प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो आंखों की सेहत के लिए लाभकारी माना जाता है. इसके अलावा, यह खून की कमी दूर करने, शरीर को डिटॉक्स करने और ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में सहायक मानी जाती है.
सेहत के लिए फायदेमंद होने के कारण बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है. कम उपलब्धता के चलते सामान्य गाजर की तुलना में किसानों को प्रति किलो 10 से 20 रुपये तक अधिक दाम मिल सकता है.
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खेती की तकनीक और उपयुक्त मिट्टी
डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया काली गाजर की खेती की प्रक्रिया लगभग सामान्य गाजर जैसी ही होती है. अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है. खेत की अच्छी तरह जुताई कर भुरभुरी मिट्टी तैयार करना जरूरी है. बीज की मात्रा की बात करें तो प्रति हेक्टेयर लगभग 1 से 1.5 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है. यदि सीधी बुवाई की जाए तो यह मात्रा 2 किलोग्राम तक रखी जा सकती है. बीज छोटे और बारीक होने के कारण कई किसान पहले नर्सरी तैयार करते हैं और बाद में पौध रोपाई करते हैं.
हालांकि, इसमें सिंचाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक पानी से फसल प्रभावित हो सकती है. जैविक खाद या गोबर की खाद का उपयोग करने से जड़ों की क्वालिटी बेहतर होती है और उत्पादन में बढ़ोतरी होती है.
पैदावार और संभावित लाभ
काली गाजर की औसत पैदावार लगभग 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है, जो सामान्य गाजर के बराबर है. हालांकि इसका आकार थोड़ा छोटा हो सकता है, लेकिन गुणवत्ता और बाजार मूल्य अधिक होने से किसानों को कुल आय ज्यादा मिलती है.
यदि किसान ग्रेडिंग और सॉर्टिंग के बाद फसल को बाजार में उतारें, तो उन्हें और बेहतर कीमत मिल सकती है. कम लागत और अधिक मूल्य के कारण यह खेती लाभ का अच्छा जरिया बन सकती है.
प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में बढ़ती मांग
काली गाजर का उपयोग जूस, हलवा, सब्जी और अन्य प्रोसेस्ड उत्पादों में किया जाता है. प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, क्योंकि इसे औषधीय गुणों वाली फसल माना जाता है. खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां भी इसे बड़े पैमाने पर खरीद रही हैं. बढ़ती बाजार मांग, बेहतर कीमत और आसान खेती तकनीक के कारण काली गाजर किसानों के लिए एक उभरता हुआ लाभकारी विकल्प बन रही है. यदि सही तरीके से इसकी खेती की जाए, तो यह फसल पारंपरिक खेती से ज्यादा मुनाफा दिला सकती है.