कभी बैंगनी थी गाजर, फिर कैसे बनी लाल-नारंगी? जानिए रंग बदलने की दिलचस्प वजह

बैंगनी गाजर में एंथोसाइनिन नामक पिगमेंट होता है, जो इसे गहरा रंग देता है. यही पिगमेंट ब्लूबेरी और जामुन जैसे फलों में भी पाया जाता है. इसमें एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अच्छी होती है, जो शरीर के लिए फायदेमंद मानी जाती है. लेकिन पकाने पर बैंगनी गाजर का रंग फीका पड़ सकता है या डिश का रंग बदल सकता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 23 Feb, 2026 | 10:06 AM

Purple carrots history: आज अगर आप बाजार से गाजर खरीदने जाएं, तो आपको ज्यादातर चमकदार लाल-नारंगी गाजर ही दिखाई देंगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि गाजर हमेशा से नारंगी नहीं थी? एक समय ऐसा था जब गाजर का रंग बैंगनी, पीला और सफेद हुआ करता था.

आज जो लाल-नारंगी गाजर हमें आम लगती है, वह दरअसल कई सौ साल पहले की गई खेती और चयन प्रक्रिया का नतीजा है. गाजर के रंग में बदलाव की कहानी इतिहास, विज्ञान और खेती की समझ से जुड़ी हुई है.

गाजर की शुरुआत कहां से हुई

इतिहासकारों के अनुसार गाजर की खेती लगभग 4 से 5 हजार साल पहले मध्य एशिया में शुरू हुई थी. वर्तमान अफगानिस्तान और उसके आसपास के इलाकों में इसकी शुरुआती खेती के प्रमाण मिलते हैं. उस समय उगाई जाने वाली गाजर ज्यादातर बैंगनी या पीले रंग की होती थी.

पुरानी गाजर आज की तरह मोटी और मीठी नहीं होती थी. वे पतली, लंबी और स्वाद में थोड़ी कड़वी भी हो सकती थीं. धीरे-धीरे यह फसल मध्य पूर्व और यूरोप तक पहुंची और अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी अलग किस्में विकसित होने लगीं.

बैंगनी गाजर क्यों थी खास

बैंगनी गाजर में एंथोसाइनिन नामक पिगमेंट होता है, जो इसे गहरा रंग देता है. यही पिगमेंट ब्लूबेरी और जामुन जैसे फलों में भी पाया जाता है. इसमें एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अच्छी होती है, जो शरीर के लिए फायदेमंद मानी जाती है.

लेकिन पकाने पर बैंगनी गाजर का रंग फीका पड़ सकता है या डिश का रंग बदल सकता है. कई बार सूप या सब्जी का रंग गहरा या धुंधला हो जाता था, जिससे उसकी प्रस्तुति प्रभावित होती थी.

नारंगी गाजर कैसे आई सामने

गाजर के रंग में बड़ा बदलाव 16वीं और 17वीं सदी में नीदरलैंड में देखने को मिला. उस समय डच किसानों ने गाजर की अलग-अलग किस्मों पर प्रयोग शुरू किए. उन्होंने पीली और सफेद किस्मों को चुन-चुनकर आपस में क्रॉस किया और उन पौधों को आगे बढ़ाया जिनमें ज्यादा बीटा कैरोटीन पाया गया.

बीटा कैरोटीन वही तत्व है जो गाजर को नारंगी रंग देता है. यह शरीर में जाकर विटामिन A में बदल जाता है, जो आंखों की रोशनी और इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी है.

धीरे-धीरे किसानों ने ऐसी गाजर विकसित की जो न सिर्फ रंग में आकर्षक थी, बल्कि स्वाद में भी ज्यादा मीठी और बनावट में बेहतर थी. इस नई किस्म ने यूरोप में तेजी से लोकप्रियता हासिल की और बैंगनी गाजर पीछे छूटती चली गई.

क्या इसमें राजनीति भी जुड़ी थी?

एक लोकप्रिय कहानी यह भी बताती है कि डच किसानों ने अपने राष्ट्रीय नायक विलियम ऑफ ऑरेंज के सम्मान में नारंगी गाजर को बढ़ावा दिया. उस समय “ऑरेंज” रंग नीदरलैंड की पहचान बन चुका था. हालांकि इतिहासकार इसे पूरी तरह साबित नहीं मानते, लेकिन यह जरूर सच है कि नारंगी गाजर उसी दौर में ज्यादा लोकप्रिय हुई.

पोषण के लिहाज से क्या फर्क है

आज की लाल-नारंगी गाजर में बीटा कैरोटीन की मात्रा अधिक होती है. यही कारण है कि इसे आंखों के लिए अच्छा माना जाता है. नियमित रूप से गाजर खाने से त्वचा, प्रतिरक्षा क्षमता और शरीर की सामान्य सेहत को फायदा मिलता है.

बैंगनी गाजर में एंथोसाइनिन अधिक होते हैं, जो एंटीऑक्सीडेंट के रूप में काम करते हैं. इसलिए पोषण के स्तर पर दोनों ही किस्मों की अपनी-अपनी खूबियां हैं.

आज फिर लौट रही है बैंगनी गाजर

दिलचस्प बात यह है कि आज फिर से बैंगनी गाजर की खेती कुछ इलाकों में बढ़ रही है. लोग अब पारंपरिक और देसी किस्मों में रुचि दिखा रहे हैं. बाजार में भी रंग-बिरंगी गाजर देखने को मिलती हैं, जो दिखने में आकर्षक और पोषण से भरपूर होती हैं.

रंग बदला, पहचान नहीं

गाजर के रंग में बदलाव खेती की समझ, वैज्ञानिक चयन और समय के साथ बदली पसंद का परिणाम है. बैंगनी से नारंगी बनने की यह यात्रा बताती है कि हमारी थाली में आने वाली चीजें भी इतिहास और विज्ञान की कहानी कहती हैं.

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