ICAR की सरकार से अपील, किसान करें ‘करण फ्राइज’ गाय का पालन.. 6000 लीटर तक देती है दूध

करण फ्राइज गाय की नस्ल को साल 1982 में विकसित किया गया था. इसे दुनिया की ज्यादा दूध देने वाली होल्स्टीन फ्राइजियन नस्ल और देशी थारपारकर गाय  को क्रॉसब्रीड करके तैयार किया गया है. इस पर काम 1971 से शुरू हुआ था और कई पीढ़ियों तक वैज्ञानिक तरीके से ब्रीडिंग करने के बाद अब यह नस्ल पूरी तरह स्थिर हो चुकी है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 13 Mar, 2026 | 02:05 PM

Animal Husbandry: हरियाणा में उन्नत नस्ल की गायों को बढ़ावा दिया जाएगा. करनाल स्थित ICAR-नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (NDRI) के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने हरियाणा सरकार से किसानों के बीच नई पंजीकृत करण फ्राइज (Karan Fries) गाय की नस्ल को बढ़ावा देने की अपील की है. यह नस्ल एनडीआरआई के वैज्ञानिकों ने करीब 40 साल के शोध के बाद विकसित की है और हाल ही में केंद्र सरकार ने इसे आधिकारिक मान्यता दी है. डॉ. सिंह का कहना है कि अगर इसे राज्य की ब्रीडिंग पॉलिसी में शामिल किया जाए तो किसानों के मौजूदा क्रॉसब्रीड पशुओं को बेहतर बनाया जा सकता है. साथ ही यह नस्ल इलाके के मौसम और खेती की परिस्थितियों के अनुकूल है, इसलिए यह किसानों के लिए ज्यादा उपयोगी साबित हो सकती है. खास बात यह है कि इस नस्ल की गाय अच्छी तरह से देखरेख करने पर एक साल में 6000 लीटर तक दूध दे सकती है.

औसतन एक करण फ्राइज गाय एक दुग्धकाल (लैक्टेशन) में करीब 3,550 लीटर दूध देती है, जो देश की कई देसी गायों की तुलना में दो गुना से भी ज्यादा है. ऐसे इस नस्ल की कुछ बेहतर प्रदर्शन करने वाली गायों ने 305 दिनों के दुग्धकाल में 4,000 से 6,000 लीटर तक दूध दिया है. वहीं एक दिन में अधिकतम 46.5 लीटर दूध तक उत्पादन दर्ज किया गया है. इससे पता चलता है कि भारतीय परिस्थितियों में भी इस नस्ल की आनुवंशिक क्षमता काफी मजबूत है. डॉ. धीर सिंह के मुताबिक, करण फ्राइज नस्ल  का फ्रोजन सीमेन (जमा हुआ वीर्य) आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के सेल काउंटर पर कम कीमत में उपलब्ध है. किसान इसे आसानी से खरीदकर अपने पशुओं की नस्ल सुधार और दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस नस्ल को साल 1982 में विकसित किया गया था

करण फ्राइज गाय की नस्ल को साल 1982 में विकसित किया गया था. इसे दुनिया की ज्यादा दूध देने वाली होल्स्टीन फ्राइजियन नस्ल और देशी थारपारकर गाय  को क्रॉसब्रीड करके तैयार किया गया है. इस पर काम 1971 से शुरू हुआ था और कई पीढ़ियों तक वैज्ञानिक तरीके से ब्रीडिंग करने के बाद अब यह नस्ल पूरी तरह स्थिर हो चुकी है. हाल ही में केंद्र सरकार ने भी इसे आधिकारिक तौर पर मान्यता दे दी है.

डॉ. धीर सिंह ने द ट्रिब्यून से कहा कि हरियाणा सरकार के पशुपालन विभाग के महानिदेशक को पत्र लिखकर इस नस्ल को राज्य की ब्रीडिंग पॉलिसी में शामिल करने की अपील की है, ताकि इसे किसानों तक पहुंचाया जा सके. उन्होंने सरकार को इस नस्ल का एलीट जर्मप्लाज्म उपलब्ध कराने की भी पेशकश की है, जिससे दूध उत्पादन बढ़ाने और डेयरी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिल सकती है.

यह नस्ल भारत की जलवायु के लिए उपयुक्त

डॉ. सिंह के मुताबिक, करण फ्राइज नस्ल संस्थान में चार दशकों से ज्यादा समय तक चले शोध और वैज्ञानिक नवाचार का परिणाम है. कई पीढ़ियों तक चयनात्मक ब्रीडिंग के बाद अब इस नस्ल की आबादी पूरी तरह स्थिर हो गई है. करण फ्राइज नस्ल में विदेशी होल्स्टीन फ्राइजयन गाय की ज्यादा दूध देने की क्षमता और देशी थारपारकर नस्ल की सहनशीलता व अनुकूलन क्षमता दोनों शामिल हैं. यही वजह है कि यह नस्ल भारत की जलवायु और खेती  की परिस्थितियों के लिए काफी उपयुक्त मानी जाती है.

गर्म मौसम को आसानी से सहन कर लेती है

डॉ. धीर सिंह का कहना है कि यह नस्ल संस्थान की एक बड़ी ब्रीडिंग उपलब्धि है. यह गर्म मौसम को आसानी से सहन कर लेती है, इसलिए उन क्षेत्रों में डेयरी फार्मिंग के लिए ज्यादा उपयुक्त है जहां अत्यधिक गर्मी के कारण विदेशी नस्ल की गायों का प्रदर्शन प्रभावित होता है. वहीं, ICAR-नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (NDRI)  के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस नस्ल की दूध उत्पादन क्षमता भी काफी अच्छी है.

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Published: 13 Mar, 2026 | 02:00 PM
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