Animal husbandry: जलवायु परिवर्तन का असर अब भारतीय डेयरी उद्योग पर भी साफ दिखने लगा है. बढ़ती गर्मी और बदलते मौसम के कारण पशुओं में ‘हीट स्ट्रेस’ बढ़ रहा है, जिससे उनकी सेहत और दूध उत्पादन दोनों प्रभावित हो रहे हैं. ऐसे हालात में डेयरी किसानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. दरअसल, ज्यादा तापमान में उनकी भूख कम हो जाती है, जिससे दूध उत्पादन घट जाता है. साथ ही उनकी प्रजनन क्षमता भी प्रभावित होती है और उन्हें ठीक होने में ज्यादा समय लगता है.
पहले डेयरी शेड सामान्य मौसम को ध्यान में रखकर बनाए जाते थे, लेकिन अब बदलती जलवायु और लू के कारण गाय-भैंसों को ज्यादा परेशानी हो रही है, जिसका असर किसानों पर भी पड़ रहा है. इसलिए अब पशुओं को ठंडक देने और बेहतर कूलिंग की व्यवस्था करना जरूरी हो गया है. हीट स्ट्रेस का असर शुरुआत में कम दिखता है, लेकिन धीरे-धीरे यह बढ़कर भविष्य में दूध की कमी जैसी बड़ी समस्या बन सकता है.
चारा जुटाना भी बड़ी समस्या
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, अब पशुओं के लिए चारा जुटाना भी बड़ी समस्या बनता जा रहा है. जलवायु परिवर्तन के कारण कभी ज्यादा बारिश होती है तो कभी सूखा पड़ जाता है, जिससे चारे की फसल सही से नहीं हो पाती. इसका असर सीधे पशुओं की सेहत पर पड़ता है और दूध उत्पादन कम हो जाता है. खराब चारा मिलने से पशु जल्दी बीमार भी पड़ सकते हैं. इससे बचने के लिए जरूरी है कि चारे की पहले से योजना बनाई जाए. जैसे साइलेज (संरक्षित चारा) बनाना, चारे को सही तरीके से स्टोर करना और अलग-अलग फसलें उगाना. इससे मौसम पर निर्भरता कम होगी और पशुओं को सालभर अच्छा आहार मिल सकेगा.
दूध की लॉजिस्टिक्स को प्रभावित कर सकती हैं
असामान्य मौसम की घटनाएं डेयरी सप्लाई और दूध की लॉजिस्टिक्स को अचानक प्रभावित कर सकती हैं. बाढ़ जैसी स्थिति में सड़कें और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क खराब हो सकते हैं, जिससे दूध की कलेक्शन और सप्लाई बाधित हो जाती है. क्योंकि दूध जल्दी खराब होने वाला उत्पाद है, इसलिए लॉजिस्टिक्स में थोड़ी सी रुकावट भी बड़ा असर डाल सकती है. ऐसे जोखिमों से बचने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों से दूध खरीदने की रणनीति अपनाना जरूरी है, ताकि किसी एक इलाके में मौसम खराब होने पर भी सप्लाई प्रभावित न हो. साथ ही कोल्ड चेन सिस्टम को मजबूत करना भी जरूरी है, जिससे दूध की गुणवत्ता बनी रहे.
सप्लाई चेन बनाना बहुत जरूरी
आज के समय में मजबूत और लचीली सप्लाई चेन बनाना बहुत जरूरी हो गया है. अब सिर्फ दक्षता ही काफी नहीं है, बल्कि बदलते मौसम और जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखकर व्यवस्था तैयार करनी होगी. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अब तकनीक और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की भूमिका काफी बढ़ गई है. निगरानी करने वाली तकनीकें, जैसे पशुओं की सेहत और पर्यावरण की स्थिति पर नजर रखने वाले सिस्टम, शुरुआती खतरे को पहचानने में मदद करते हैं. मौसम के बदलाव के अनुसार उपकरणों और काम की योजना बनाना भी काफी जरूरी हो गया है.
साथ ही बुनियादी ढांचे में निवेश भी बहुत महत्वपूर्ण है. पानी बचाने की व्यवस्था, नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग और पशुओं के लिए सुरक्षित व आरामदायक शेड बनाना जरूरी कदम हैं. अब तैयारी का मतलब सिर्फ इंतजार करना नहीं, बल्कि पहले से अनुमान लगाकर योजना बनाना है. इससे जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली रुकावटों से बचा जा सकता है.
प्रोसेसिंग यूनिट और कंपनियां मिलकर काम करें
जलवायु परिवर्तन अब कुछ समय की नहीं, बल्कि लंबे समय की समस्या बन गया है. आने वाले समय में दूध उत्पादन इस बात पर निर्भर करेगा कि डेयरी उद्योग इन बदलते हालात के लिए कितना तैयार है. इसके लिए जरूरी है कि किसान, प्रोसेसिंग यूनिट और सप्लाई से जुड़ी कंपनियां मिलकर काम करें और ऐसा सिस्टम बनाएं जो हर तरह के मौसम को झेल सके. सही योजना और लगातार प्रयास से ही दूध उत्पादन स्थिर रह पाएगा. भविष्य में डेयरी सेक्टर की सफलता उसकी मजबूती और बदलते हालात के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता पर ही टिकी होगी.