दूध देने वाली गायों पर मौत बनकर टूट रही ये बीमारी, पशुपालकों के लिए जारी हुई बड़ी चेतावनी

गायों में फैल रही थेलेरियोसिस बीमारी ने पशुपालकों की चिंता बढ़ा दी है. किलनी और चमकोन के जरिए फैलने वाली यह बीमारी दूध उत्पादन और पशुओं की सेहत पर गंभीर असर डाल सकती है. विशेषज्ञों ने समय रहते सावधानी, साफ-सफाई और नियमित जांच कराने की सलाह दी है ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 29 May, 2026 | 10:55 AM

Theileriosis Disease: गायों में थेलेरियोसिस नाम की बीमारी तेजी से फैल रही है, जिसे पशुपालकों के लिए गंभीर खतरा माना जा रहा है. यह बीमारी मुख्य रूप से किलनी और चमकोन जैसे परजीवियों के कारण फैलती है. संक्रमित पशु के खून से ये परजीवी दूसरे स्वस्थ पशुओं तक संक्रमण पहुंचा देते हैं. अगर समय रहते सावधानी न बरती जाए तो यह बीमारी पूरे गौशाला में फैल सकती है और कई पशु इसकी चपेट में आ सकते हैं. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (KVK Noida) के अनुसार, यह एक परजीवी जनित बीमारी है, जो गायों के शरीर की रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करती है. इससे पशु धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है और दूध उत्पादन पर भी बड़ा असर पड़ता है.

तेज बुखार और कमजोरी हैं मुख्य लक्षण

पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के मुताबिक थेलेरियोसिस बीमारी के लक्षण आसानी से पहचाने जा सकते हैं. संक्रमित गायों में तेज बुखार देखा जाता है, जो 104 से 107 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. इसके अलावा पशु सुस्त रहने लगता है और खाने-पीने में रुचि  कम हो जाती है. बीमारी बढ़ने पर आंखों और कानों में सूजन दिखाई देने लगती है. कई मामलों में पशुओं का वजन तेजी से घटने लगता है और दूध उत्पादन अचानक कम हो जाता है. गंभीर स्थिति में खूनी दस्त और सांस लेने में परेशानी जैसी दिक्कतें भी सामने आ सकती हैं. पशु चिकित्सकों का कहना है कि शुरुआती लक्षण दिखते ही तुरंत इलाज शुरू कर देना चाहिए, क्योंकि देरी होने पर पशु की हालत ज्यादा खराब हो सकती है.

साफ-सफाई और दवाओं से किया जा सकता है बचाव

पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, इस बीमारी से बचने के लिए गौशाला की साफ-सफाई सबसे जरूरी उपाय है. गौशाला में गंदगी और नमी अधिक होने पर किलनी और चमकोन तेजी से बढ़ते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा  बढ़ जाता है. पशुओं के शरीर पर नियमित रूप से किलनी नियंत्रण दवाओं का छिड़काव करना चाहिए. साथ ही गौशाला की दीवारों और फर्श पर भी समय-समय पर दवा का इस्तेमाल करना जरूरी है. पशुओं को नियमित रूप से नहलाने और साफ रखने से भी संक्रमण का खतरा कम होता है. विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमित पशु को तुरंत अलग रखना चाहिए ताकि बीमारी अन्य पशुओं तक न फैले. पशुओं के खाने और पानी की व्यवस्था भी साफ-सुथरी होनी चाहिए.

समय पर जांच और टीकाकरण है जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार, हर महीने पशुओं की स्वास्थ्य जांच  करानी चाहिए ताकि किसी भी बीमारी का समय रहते पता लगाया जा सके. नियमित जांच से थेलेरियोसिस जैसी बीमारियों को शुरुआती चरण में ही नियंत्रित किया जा सकता है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम ने बताया कि समय पर टीकाकरण करवाने से इस बीमारी का खतरा काफी कम किया जा सकता है. इसके अलावा पशुओं को पौष्टिक आहार देने और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रखने पर भी ध्यान देना चाहिए. उन्होंने पशुपालकों को सलाह दी है कि अगर किसी पशु में तेज बुखार, कमजोरी या दूध उत्पादन में अचानक कमी दिखाई दे तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें. सही समय पर इलाज और सावधानी अपनाकर पशुओं को इस जानलेवा बीमारी से सुरक्षित रखा जा सकता है.

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