ICAR CIFT nanofibre technology: भारत में मछली उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या भी जुड़ी है-मछली से निकलने वाला भारी मात्रा में कचरा. आमतौर पर यह कचरा बदबूदार और बेकार समझकर फेंक दिया जाता था या कम कीमत वाले उपयोग में लाया जाता था. लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसी “कचरे” को एक अनमोल संसाधन में बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. केरल के कोच्चि स्थित ICAR-CIFT के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो मछली के स्केल (छिलकों) को मेडिकल उपयोग के लिए बेहद कीमती सामग्री में बदल देती है.
मछली का कचरा अब बनेगा इलाज का साधन
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, यह नई तकनीक मछली के छिलकों से नैनोफाइबर आधारित ग्राफ्ट तैयार करती है, जो हड्डियों और दांतों के घाव को तेजी से भरने में मदद करता है. पहले जो चीज बेकार समझी जाती थी, अब वही आधुनिक चिकित्सा में उपयोगी बन गई है.
इस शोध का नेतृत्व वैज्ञानिक बिंसी पीके की टीम ने किया है, जिसमें अलग-अलग संस्थानों के विशेषज्ञ भी शामिल हैं. यह तकनीक पेटेंट की जा चुकी है, यानी इसे एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि माना जा रहा है.
भारत में मछली उत्पादन और कचरे की सच्चाई
भारत में हर साल 19 मिलियन टन से ज्यादा मछली का उत्पादन होता है. इसके साथ ही लगभग 4 से 6 मिलियन टन तक मछली का कचरा भी निकलता है. अब तक इस कचरे का इस्तेमाल या तो फिश मील बनाने में होता था या इसे फेंक दिया जाता था. लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इस कचरे में ऐसे कई जैविक तत्व होते हैं, जो बहुत कीमती हो सकते हैं.
मछली के छिलकों में छुपा ‘खजाना’
मछली के छिलकों में हाइड्रॉक्सीएपेटाइट नाम का एक खास मिनरल पाया जाता है, जो इंसान की हड्डियों और दांतों से काफी मिलता-जुलता होता है. वैज्ञानिकों ने इस तत्व को निकालकर एक खास प्रक्रिया, जिसे इलेक्ट्रो-स्पिनिंग कहा जाता है, के जरिए बहुत पतले नैनोफाइबर में बदल दिया. ये नैनोफाइबर शरीर में जाकर हड्डियों के नए ऊतक बनने में मदद करते हैं.
कैसे काम करती है यह तकनीक?
आमतौर पर जब शरीर में हड्डी या दांत का नुकसान होता है, तो डॉक्टर ग्राफ्ट का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन पारंपरिक ग्राफ्ट सिर्फ खाली जगह को भरते हैं.
नई तकनीक से बने नैनोफाइबर इससे आगे जाकर काम करते हैं. ये शरीर की कोशिकाओं को जोड़ने और बढ़ने में मदद करते हैं, जिससे घाव जल्दी भरता है. इसके साथ ही इनमें दवाइयों को धीरे-धीरे छोड़ने की क्षमता भी होती है, जिससे संक्रमण का खतरा कम हो जाता है.
पर्यावरण के लिए भी बड़ा फायदा
यह तकनीक सिर्फ चिकित्सा के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है. मछली का कचरा अक्सर प्रदूषण का कारण बनता है. अगर इसी कचरे का सही उपयोग किया जाए, तो न केवल पर्यावरण साफ रहेगा, बल्कि इससे आर्थिक लाभ भी होगा. यह एक तरह से “वेस्ट से वेल्थ” का शानदार उदाहरण है.
भारत में क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि यह तकनीक काफी उपयोगी है, लेकिन भारत में इसे बड़े स्तर पर लागू करने में कुछ चुनौतियां हैं. यहां मछली उद्योग की सप्लाई चेन अभी भी बिखरी हुई है और कचरे को अलग-अलग तरीके से इकट्ठा करने और प्रोसेस करने की व्यवस्था मजबूत नहीं है. इसके विपरीत जापान और नॉर्वे जैसे देशों ने मछली के कचरे को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में बदलने की दिशा में काफी प्रगति कर ली है.
नई अर्थव्यवस्था की ओर कदम
यह तकनीक एक नई “सर्कुलर बायो-इकोनॉमी” की ओर संकेत करती है, जहां कचरे को दोबारा उपयोग में लाकर नई चीजें बनाई जाती हैं. अगर भारत इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में नए विकल्प खुलेंगे, बल्कि तटीय क्षेत्रों में रोजगार और व्यापार के नए अवसर भी पैदा होंगे.
वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मछली के कचरे का थोड़ा सा हिस्सा भी इस तरह के मेडिकल उत्पादों में बदला जाए, तो इससे बड़ी आर्थिक कमाई हो सकती है. इसके साथ ही यह तकनीक रिसर्च, स्टार्टअप और नई इंडस्ट्री के लिए भी रास्ते खोल सकती है.