हीटवेव से पशुओं का दूध घटने लगा.. मुर्गी-बत्तख की प्रजनन क्षमता पर असर, मुनाफे की बजाय खर्च बढ़ा

Heatwave Impact Animal & Poultry Farming : CLFMA के चेयरमैन दिव्या कुमार गुलाटी ने 'किसान इंडिया' को बताया कि बढ़ता तापमान और हीटवेव पशुधन की उत्पादकता और किसानों की आय पर बुरा असर डाल रहे हैं. जब जानवरों को लंबे समय तक तेज गर्मी का सामना करना पड़ता है, तो वे कम खाना खाते हैं और बीमार होने का खतरा बढ़ जाता है.

रिजवान नूर खान
नोएडा | Published: 24 May, 2026 | 07:35 PM

देशभर में हीटवेव की स्थितियों के चलते पशुओं पर विपरीत प्रभाव देखा जा रहा है. पशुपालक शिकायत कर रहे हैं कि उनकी दुधारू गायें और भैंसों ने दूध उत्पादन कम कर दिया है. भारतीय मिश्रित पशु आहार निर्माता संघ (CLFMA) ने कहा है कि बढ़ते तापमान से दुधारू पशुओं की उत्पादन क्षमता तेजी से घटती देखी जा रही है. जबकि, छोटे जानवरों जैसे मुर्गी और बत्तख के मरने की घटनाएं भी बढ़ी हैं. पशुपालन विभाग ने हीटवेव के असर से पशुओं को बचाने के लिए खास उपाय बताए हैं.

भारतीय मिश्रित पशु आहार निर्माता संघ (CLFMA) के चेयरमैन दिव्या कुमार गुलाटी ने ‘किसान इंडिया’ को बताया कि बढ़ता तापमान और हीटवेव पशुधन की उत्पादकता और किसानों की आय पर बुरा असर डाल रहे हैं.  उन्होंने कहा कि बढ़ता तापमान और बार-बार आने वाली लू का पशुधन की उत्पादकता और किसानों की आय पर सीधा और बुरा असर पड़ रहा है. इसका मुख्य कारण शारीरिक तनाव, काम करने की क्षमता में कमी और लागत में बढ़ोतरी है. जब जानवरों को लंबे समय तक तेज गर्मी का सामना करना पड़ता है, तो वे कम खाना खाते हैं.

हीटवेव से मुर्गियों-बत्तखों की प्रजनन क्षमता प्रभावित

चेयरमैन दिव्या कुमार गुलाटी ने कहा कि छोटे पक्षियों में मुर्गियों और बत्तख और तीतर के गर्मी में बढ़ने की गति धीमी हो जाती है. हीटवेव का असर इनकी प्रजनन क्षमता पर भी पड़ता है. बहुत ज्यादा गर्मी में प्रजनन दर कम हो जाती है और मृत्यु दर बढ़ जाती है. वहीं, अंडों का उत्पादन तेजी से घट जाता है. ये पक्षी ज्यादात तापमान बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं. इसके चलते गर्मियों में नुकसान से बचने के लिए पशुपालकों को इनका खास खयाल रखना पड़ता है, जो किसान की लागत को बढ़ा देता है.

पशुपालकों के लिए गर्मी में मुनाफा घटा और खर्च बढ़ा

किसानों को पशुओं और पोल्ट्री को गर्मी के तनाव से निपटने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ता है. इसमें कूलिंग सिस्टम, हवादार व्यवस्था, पानी की आपूर्ति और बिजली के इस्तेमाल पर होने वाला निवेश शामिल है. मुर्गी पालन और डेयरी जैसे क्षेत्रों में उत्पादकता में थोड़ी सी भी गिरावट मुनाफे पर बहुत बुरा असर डालती है, क्योंकि इन क्षेत्रों में लागत का ढांचा पहले से ही बहुत कसा हुआ होता है. इसके अलावा लू का असर चारे और दाने की गुणवत्ता और उपलब्धता पर भी पड़ता है. फसलों की पैदावार कम होने या ऊपर-नीचे होने से चारे की कीमतें बढ़ जाती हैं. इससे पूरी उत्पादन श्रृंखला (value chain) में मुनाफा और भी कम हो जाता है.

जलवायु अनुकूल पद्धति अपनाना जरूरी

कुल मिलाकर बढ़ता तापमान पशुपालन को जलवायु के प्रति ज्यादा संवेदनशील और ज्यादा खर्चीला बना रहा है. इससे यह बात साफ हो जाती है कि हमें ऐसी जलवायु-अनुकूल पद्धतियों को अपनाने की जरूरत है, जो उत्पादकता और किसानों की आजीविका की रक्षा कर सकें. इन पद्धतियों में जानवरों के रहने की बेहतर व्यवस्था, गर्मी सहने वाली नस्लों का चुनाव, बेहतर पोषण और समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियों का इस्तेमाल शामिल है.

पशु बाड़ों में फॉगर और कूलर लगा रहे पशुपालक

देश के कई हिस्सों में भीषण गर्मी का असर मवेशियों पर पड़ रहा है, और बढ़ते तापमान के कारण दूध का उत्पादन घट गया है. पशुपालन विभाग का कहना है कि यह एक प्राकृतिक घटना है, और उसने पशुपालकों को सलाह दी है कि वे अपने जानवरों को गर्मी की इन कठोर परिस्थितियों से बचाने के लिए जरूरी उपाय करें. डेयरी किसानों ने बताया है कि उनके पशुओं का दूध घट गया है. पशुपालक अपने गौशालाओं में फॉगर और कूलर लगाने जैसे उपाय अपना रहे हैं.

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