दूध ही सब कुछ नहीं… क्यों आज भी गोबर और खेतों की ताकत पर भरोसा करते हैं देश के पशुपालक

गांव में गोबर को कभी बेकार नहीं समझा जाता. यही बात इस अध्ययन में भी सामने आई. करीब 74 प्रतिशत पशुपालक गोबर को बहुत अहम मानते हैं. कहीं इससे खेतों में खाद बनती है, कहीं चूल्हे जलते हैं और कहीं गोबर बेचकर थोड़ी अतिरिक्त आमदनी हो जाती है.

नई दिल्ली | Published: 21 Jan, 2026 | 08:37 AM

जब भी पशुपालन की बात होती है, तो ज्यादातर लोग सीधे दूध, डेयरी और बिक्री की तरफ सोचने लगते हैं. ऐसा लगता है मानो गाय-भैंस पालने का मतलब सिर्फ दूध निकालना और उसे बाजार में बेचना ही हो. लेकिन गांवों की असली तस्वीर इससे काफी अलग है. हकीकत यह है कि देश के लाखों पशुपालकों के लिए पशु आज भी सिर्फ दूध देने का जरिया नहीं, बल्कि खेती, घर और जीवन का सहारा हैं.

हाल ही में ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) की एक बड़ी स्टडी ने इसी सच्चाई को सामने रखा है. इस अध्ययन में देश के 15 राज्यों के 7,300 से ज्यादा पशुपालक परिवारों से बातचीत की गई. नतीजे चौंकाने वाले हैं, लेकिन गांवों को समझने वालों के लिए बिल्कुल सच्चे.

कई परिवार दूध बेचते ही नहीं

रिपोर्ट बताती है कि भारत में एक तिहाई से ज्यादा पशुपालक ऐसे हैं जो दूध बेचने को अपनी प्राथमिकता नहीं मानते. इनमें से कई परिवार तो बिल्कुल भी दूध बाजार में नहीं ले जाते. उनके लिए गाय-बैल पालने का मतलब है खेतों के लिए गोबर, जुताई के लिए ताकत और घर की जरूरतों को पूरा करना.

कुछ राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में तो ऐसे पशुपालकों की संख्या और भी ज्यादा है. यहां कई लोग पशु सिर्फ इसलिए रखते हैं ताकि खेती चलती रहे और खर्च कम हो.

गोबर: जो पैसे से ज्यादा की चीज है

गांव में गोबर को कभी बेकार नहीं समझा जाता. यही बात इस अध्ययन में भी सामने आई. करीब 74 प्रतिशत पशुपालक गोबर को बहुत अहम मानते हैं. कहीं इससे खेतों में खाद बनती है, कहीं चूल्हे जलते हैं और कहीं गोबर बेचकर थोड़ी अतिरिक्त आमदनी हो जाती है.

आज जब जैविक खेती की बात हो रही है, तब गोबर की कीमत और भी बढ़ गई है. कई किसान रासायनिक खाद छोड़कर फिर से देसी तरीकों की तरफ लौट रहे हैं, और इसमें पशुओं की भूमिका सबसे बड़ी है.

देसी पशु आज भी क्यों जरूरी हैं

झारखंड, हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आधे से ज्यादा पशुपालक दूध बेचने से पहले अपने घर और खेत की जरूरतों को देखते हैं. यहां देसी नस्ल की गायें ज्यादा पाली जाती हैं, क्योंकि वे कम खर्च में पल जाती हैं और मौसम की मार भी बेहतर झेल लेती हैं.

हालांकि कुछ लोग ज्यादा दूध की उम्मीद में संकर नस्ल की तरफ बढ़ रहे हैं, लेकिन बदलते मौसम में ये पशु जल्दी बीमार भी पड़ते हैं.

छोटे पशुपालक, बड़ी जद्दोजहद

देश के गांवों में करीब आधे पशुपालकों के पास सिर्फ एक या दो पशु हैं. ऐसे परिवार ज्यादातर पहाड़ी, पूर्वी और मध्य भारत में रहते हैं. ये लोग दूध से ज्यादा खेती और घरेलू जरूरतों पर ध्यान देते हैं.

इसके उलट गुजरात, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बड़े पशुपालक ज्यादा हैं, जिनके पास कई पशु होते हैं और वही बाजार में बिकने वाला ज्यादातर दूध देते हैं. यही वजह है कि हर राज्य और हर पशुपालक के लिए एक जैसी योजना काम नहीं करती.

चारे की कमी सबसे बड़ी परेशानी

आज लगभग हर पशुपालक एक ही बात कहता है चारा मिलना मुश्किल हो गया है. जमीन कम हो रही है, चरागाह घट रहे हैं और बाजार से चारा खरीदना महंगा पड़ता है. हैरानी की बात यह है कि सरकार की कई योजनाओं के बारे में ज्यादातर पशुपालकों को जानकारी ही नहीं है.

मौसम भी बन रहा है दुश्मन

गर्मी बढ़ने, बारिश के पैटर्न बदलने और बीमारियों के कारण पशुपालन पहले से ज्यादा कठिन हो गया है. भैंस और संकर नस्ल के पशु इस बदलाव से ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, जबकि देसी पशु अभी भी कुछ हद तक टिके हुए हैं.

अब सोच बदलने की जरूरत

यह अध्ययन साफ बताता है कि पशुपालन सिर्फ दूध का धंधा नहीं है. यह खेती, पर्यावरण, ऊर्जा और गांव की जिंदगी से जुड़ा पूरा तंत्र है. अगर नीतियां सिर्फ दूध पर केंद्रित रहीं, तो गांवों की असली जरूरतें छूट जाएंगी.

जरूरत है ऐसी योजनाओं की जो गोबर, चारा, देसी पशु और जलवायु को ध्यान में रखकर बनाई जाएं. तभी पशुपालन सच में गांवों की रीढ़ बना रह पाएगा.

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