बरसात में बढ़ा गाय-भैंस की बीमारियों का खतरा! ये उपाय बचाएंगे लाखों का नुकसान

बरसात का मौसम गाय-भैंसों में गलघोंटू, खुरपका-मुंहपका, सर्रा और किलनी जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ा देता है. पशु चिकित्सकों के अनुसार समय पर टीकाकरण, साफ पशुशाला, कृमिनाशक दवा और संतुलित आहार अपनाकर पशुपालक अपने पशुओं को स्वस्थ रख सकते हैं.

नोएडा | Updated On: 24 Jul, 2026 | 08:37 PM

मॉनसून का मौसम खेती के लिए जितना फायदेमंद माना जाता है, उतना ही यह पशुपालकों के लिए कई चुनौतियां भी लेकर आता है. जुलाई से सितंबर के बीच बढ़ी हुई नमी, उमस और तापमान में बदलाव का सीधा असर गाय-भैंसों के स्वास्थ्य पर पड़ता है. इस दौरान पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे वे संक्रामक बीमारियों और परजीवियों की चपेट में जल्दी आ सकते हैं. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (कृषि विज्ञान केंद्र, नोएडा) के अनुसार, यदि समय पर टीकाकरण, नियमित सफाई और संतुलित आहार पर ध्यान दिया जाए, तो अधिकांश बीमारियों से आसानी से बचाव किया जा सकता है.

गलघोंटू और खुरपका-मुंहपका से बचाव के लिए टीकाकरण जरूरी

पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, बरसात में गलघोंटू  (Hemorrhagic Septicemia) का खतरा सबसे अधिक रहता है. यह गंभीर संक्रामक बीमारी है, जिसमें समय पर इलाज न मिलने पर पशु की जान भी जा सकती है. इसके लक्षणों में तेज बुखार, गले में सूजन, सांस लेने में परेशानी, मुंह और नाक से पानी आना तथा पशु का चारा छोड़ देना शामिल है. इसके अलावा खुरपका-मुंहपका (FMD) भी मानसून में तेजी से फैलने वाली बीमारी है. इससे पशु के मुंह में छाले, खुरों में घाव और दूध उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बारिश के मौसम में इन दोनों बीमारियों से बचाव के लिए सरकारी पशु चिकित्सालय में उपलब्ध टीके समय पर जरूर लगवाएं.

सर्रा रोग, किलनी और जूं से भी रखें पशुओं को सुरक्षित

विशेषज्ञ बताते हैं कि मानसून में मक्खियों, किलनी, जूं और चिचड़ों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है. इन्हीं के कारण सर्रा रोग  जैसी बीमारियां फैलने का खतरा रहता है. ये परजीवी पशुओं का खून चूसकर उन्हें कमजोर बना देते हैं और कई अन्य संक्रमणों का कारण भी बनते हैं. इससे बचने के लिए पशुशाला की नियमित सफाई करें, आसपास पानी जमा न होने दें और जरूरत पड़ने पर पशु चिकित्सक की सलाह से कीटनाशकों का छिड़काव करें. यदि पशु के शरीर पर किलनी या जूं दिखाई दें, तो डॉक्टर द्वारा बताई गई दवा का ही प्रयोग करें और दवा लगाने के बाद कम से कम 24 घंटे तक पशु को न नहलाएं.

पेट के कीड़ों की दवा और संतुलित आहार का रखें ध्यान

बरसात के मौसम में पशुओं में पेट के कीड़ों  की समस्या भी बढ़ जाती है. इसका असर छोटे बछड़ों से लेकर दुधारू पशुओं तक पर पड़ता है. इससे पशुओं की बढ़वार रुक सकती है और दूध उत्पादन भी कम हो सकता है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, नवजात बछड़ों को जन्म के 15 दिन के भीतर पहली कृमिनाशक दवा देनी चाहिए. इसके बाद बड़े पशुओं को हर चार महीने में डॉक्टर की सलाह के अनुसार कृमिनाशक दवा देना लाभकारी रहता है.

साफ पशुशाला और पौष्टिक आहार से रहें बीमारियों से दूर

विशेषज्ञों का कहना है कि मॉनसून में पशुशाला  को हमेशा साफ और सूखा रखना चाहिए. गीला फर्श और जमा हुआ पानी संक्रमण फैलाने का सबसे बड़ा कारण बन सकता है. पशुओं को हमेशा साफ और सूखा चारा, पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी तथा संतुलित पोषण दें. यदि किसी पशु में बुखार, सुस्ती, भूख कम लगना या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो बिना देरी किए पशु चिकित्सक से संपर्क करें. समय पर टीकाकरण, नियमित सफाई, परजीवी नियंत्रण और संतुलित आहार अपनाकर पशुपालक बरसात के मौसम में अपने पशुओं को स्वस्थ रख सकते हैं और दूध उत्पादन के साथ अपनी आय को भी सुरक्षित बना सकते हैं.

Published: 24 Jul, 2026 | 10:22 PM

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