Monsoon Animal Care: मॉनसून का मौसम जहां पशुओं के लिए राहत लेकर आता है, वहीं यह कई संक्रामक और परजीवी जनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है. बारिश के दौरान बढ़ी नमी, गंदगी और दूषित चारा पशुओं के स्वास्थ्य पर सीधा असर डालते हैं. इसका परिणाम दूध उत्पादन में गिरावट और पशुपालकों को आर्थिक नुकसान के रूप में सामने आता है. पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम (कृषि विज्ञान केंद्र, नोएडा) के अनुसार, यदि मानसून में कुछ जरूरी सावधानियां अपनाई जाएं तो गायों को कई गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है.
साफ और सूखा पशुशाला रखना सबसे जरूरी
पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, बारिश के मौसम में सबसे पहले पशुशाला की साफ-सफाई और सूखापन सुनिश्चित करना चाहिए. पशुओं के आसपास पानी जमा होने से बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों के पनपने का खतरा बढ़ जाता है. यदि गायों के बैठने की जगह गीली रहती है तो उनके थन लगातार नमी के संपर्क में आते हैं, जिससे थनैला (मास्टाइटिस) रोग होने की संभावना बढ़ जाती है. इससे बचने के लिए फर्श पर सूखी रेत, भूसा या साफ बिछावन का उपयोग करें और उसे नियमित रूप से बदलते रहें. मक्खियों और मच्छरों से बचाव के लिए प्राकृतिक उपाय भी अपनाए जा सकते हैं.
चारे और पानी की गुणवत्ता पर रखें विशेष ध्यान
विशेषज्ञ बताते हैं कि मानसून में हवा में अधिक नमी होने से सूखे चारे में फफूंद लगने का खतरा रहता है. ऐसा चारा पशुओं को खिलाने से उनका पाचन तंत्र प्रभावित हो सकता है और दूध उत्पादन भी कम हो सकता है. इसलिए चारा खिलाने से पहले उसकी अच्छी तरह जांच करें. हरे चारे को सूखे चारे के साथ संतुलित मात्रा में खिलाना बेहतर माना जाता है. इसके अलावा पशुओं को हमेशा साफ और ताजा पानी उपलब्ध कराएं. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए प्रतिदिन लगभग 50 ग्राम गुणवत्तापूर्ण मिनरल मिक्सचर भी देना लाभदायक हो सकता है.
मॉनसून में बढ़ जाता है इन बीमारियों का खतरा
पशु चिकित्सक कुंवर घनश्याम के अनुसार, इस मौसम में गलाघोटू, खुरपका-मुंहपका (FMD) और थनैला जैसी बीमारियों का खतरा अधिक रहता है. गलाघोटू में तेज बुखार और गले में सूजन आती है, जबकि FMD में मुंह और खुरों में छाले पड़ने से पशु खाने-पीने और चलने में परेशानी महसूस करते हैं. थनैला से बचाव के लिए दूध दुहने से पहले और बाद में थनों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें. समय पर टीकाकरण कराना और किसी भी लक्षण के दिखाई देने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना जरूरी है.
बछड़ों की देखभाल और डीवर्मिंग भी है जरूरी
मॉनसून में वयस्क पशुओं के साथ बछड़ों की देखभाल भी बेहद महत्वपूर्ण होती है क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. उन्हें बारिश और ठंडी हवाओं से बचाकर सूखी जगह पर रखें. नवजात बछड़ों को जन्म के तुरंत बाद मां का पहला गाढ़ा दूध (कोलोस्ट्रम) जरूर पिलाएं, क्योंकि यह प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करता है. वहीं बारिश के दौरान गंदे पानी के संपर्क से परजीवी संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे पशुओं का वजन और दूध उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं. इसलिए पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार समय-समय पर डीवर्मिंग कराना और नियमित स्वास्थ्य जांच करवाना पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है.