Report: FY26 में कृषि सेक्टर सुस्त, लेकिन GDP में हिस्सेदारी बढ़कर 18 प्रतिशत तक पहुंची
नई श्रृंखला के अनुसार कुल GVA में कृषि की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत तक पहुंच गई है. इसका मतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था में खेती की भूमिका अभी भी अहम बनी हुई है. कृषि और संबद्ध गतिविधियों में डेयरी, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं.
देश की अर्थव्यवस्था के ताजा आंकड़ों ने खेती को लेकर एक मिली-जुली तस्वीर सामने रखी है. एक ओर कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों की विकास दर धीमी पड़ती दिख रही है, वहीं दूसरी ओर देश की कुल अर्थव्यवस्था में खेती की हिस्सेदारी बढ़कर 18 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यानी रफ्तार भले कम हुई हो, लेकिन अर्थव्यवस्था में खेती का वजन अभी भी मजबूत है.
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी नई GDP श्रृंखला के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में कृषि और संबद्ध गतिविधियों की सकल मूल्य वर्धन (GVA) वृद्धि दर 2.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है. यह पिछले वित्त वर्ष के 4.9 प्रतिशत के मुकाबले काफी कम है. पुराने आधार वर्ष (2011-12) के अनुसार जो अनुमान 3.1 प्रतिशत था, वह भी अब नए आधार वर्ष 2022-23 पर घटकर 2.4 प्रतिशत रह गया है.
नया आधार वर्ष और बदली तस्वीर
सरकार ने GDP की गणना के लिए नया आधार वर्ष 2022-23 तय किया है. पहले यह 2011-12 था. आधार वर्ष बदलने से अलग-अलग क्षेत्रों के योगदान और विकास दर का आकलन नए सिरे से होता है. इसी बदलाव के बाद कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर में गिरावट दिखी है.
हालांकि दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा कीमतों (करंट प्राइस) पर देश की कुल GVA में कृषि की हिस्सेदारी 17 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत हो गई है. तुलना करें तो विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी नई श्रृंखला में 15 प्रतिशत के आसपास है, जबकि पुरानी श्रृंखला में यह 14 प्रतिशत थी. इसका मतलब है कि खेती अब भी देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा स्तंभ बनी हुई है.
नाममात्र वृद्धि में भारी गिरावट
अगर मौजूदा कीमतों यानी नाममात्र (Nominal) आधार पर देखें तो तस्वीर और साफ हो जाती है. वित्त वर्ष 2025-26 में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की नाममात्र GVA वृद्धि केवल 0.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है. पिछले वित्त वर्ष में यही वृद्धि 9.2 प्रतिशत थी.
यह गिरावट मुख्य रूप से महंगाई दर में आई कमी के कारण मानी जा रही है. जब फसलों की कीमतें नहीं बढ़तीं या गिरती हैं, तो किसानों की आय पर सीधा असर पड़ता है. इस साल उत्पादन अच्छा रहा, लेकिन कीमतों में तेज उछाल नहीं दिखा. इसका असर नाममात्र वृद्धि पर पड़ा.
तिमाही आंकड़ों में दिखी सुस्ती
बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के अनुसार, तिमाही आधार पर देखें तो भी रफ्तार धीमी होती नजर आती है. पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में स्थिर कीमतों पर कृषि क्षेत्र की वृद्धि 4.2 प्रतिशत रही. दूसरी तिमाही में यह घटकर 2.3 प्रतिशत रह गई. तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में यह और गिरकर 1.4 प्रतिशत पर आ गई.
नाममात्र आधार पर स्थिति और चुनौतीपूर्ण रही. पहली तिमाही में 4.5 प्रतिशत की सकारात्मक वृद्धि दर्ज हुई, लेकिन दूसरी तिमाही में यह –0.6 प्रतिशत हो गई. तीसरी तिमाही में तो नाममात्र वृद्धि –1.9 प्रतिशत तक पहुंच गई. यानी कीमतों में गिरावट का असर सीधे किसानों की कमाई पर दिखाई दिया.
पुरानी श्रृंखला के अनुसार पहली तिमाही में नाममात्र वृद्धि 3.2 प्रतिशत थी, जिसे नई श्रृंखला में 4.5 प्रतिशत दिखाया गया. दूसरी तिमाही में पुरानी श्रृंखला में 1.8 प्रतिशत अनुमान था, जिसे संशोधित कर 0.6 प्रतिशत कर दिया गया.
उत्पादन अच्छा, लेकिन आय पर दबाव
इस साल खरीफ और रबी दोनों सीजन में पैदावार अच्छी रही. कई राज्यों में गेहूं, धान और अन्य फसलों का उत्पादन मजबूत रहा. लेकिन उत्पादन बढ़ने का मतलब हमेशा ज्यादा आय नहीं होता.
जब बाजार में कीमतें स्थिर रहती हैं या घटती हैं, तो किसानों की कुल आमदनी प्रभावित होती है. यही वजह है कि उत्पादन मजबूत रहने के बावजूद GVA वृद्धि दर धीमी पड़ी है.
विशेषज्ञों का कहना है कि नाममात्र GVA की सिर्फ 0.3 प्रतिशत वृद्धि यह दिखाती है कि महंगाई कम होने का असर कृषि क्षेत्र पर ज्यादा पड़ा है. अगर कीमतें बढ़तीं तो वृद्धि दर भी बेहतर दिखती.
हिस्सेदारी क्यों बढ़ी?
अब सवाल यह उठता है कि जब विकास दर कम हुई है तो हिस्सेदारी कैसे बढ़ गई? इसका कारण यह है कि अन्य क्षेत्रों की तुलना में कृषि का योगदान अपेक्षाकृत स्थिर रहा.
नई श्रृंखला के अनुसार कुल GVA में कृषि की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत तक पहुंच गई है. इसका मतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था में खेती की भूमिका अभी भी अहम बनी हुई है. कृषि और संबद्ध गतिविधियों में डेयरी, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं.