बैसाखी पर गेहूं की कटाई से लेकर बिहू में पशुओं की पूजा तक.. किसानों ने धूमधाम के साथ मनाया कृषि पर्व, देखें

Baisakhi-Bohag Bihu Celebration: भारत के पंजाब और असम में किसानों ने बैसाखी और बोहाग बिहू का जश्न मनाया. अमृतसर में गेहूं की कटाई के साथ बैसाखी मनाई गई, जो पंजाबी नववर्ष और समृद्धि का प्रतीक है. वहीं असम में गोरु बिहू के तहत किसानों ने अपने पशुओं की पूजा, सफाई और देखभाल की. ये दोनों त्योहार कृषि, प्रकृति और पशुधन के प्रति आभार और खुशहाली का संदेश देते हैं.

Isha Gupta
नोएडा | Updated On: 14 Apr, 2026 | 12:16 PM

Baisakhi: पंजाब के अमृतसर में इस बार भी बैसाखी का पर्व बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया गया. खेतों में सुनहरी गेहूं की लहलहाती बालियां इस बात का संकेत दे रही थीं कि सालभर की मेहनत अब रंग ला चुकी है. किसानों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ फसल की कटाई शुरू की और इस सफलता का जश्न पूरे जोश के साथ मनाया. बैसाखी केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह पंजाबी नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है.

इस अवसर पर गांवों में ढोल-नगाड़ों की गूंज, भांगड़ा और गिद्धा जैसे पारंपरिक नृत्य ने माहौल को और भी रंगीन बना दिया. लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते नजर आए और घरों में पारंपरिक व्यंजन भी बनाए गए.

असम में बोहाग बिहू की शुरुआत और गोरु बिहू का महत्व

असम में बोहाग बिहू के पहले दिन गोरु बिहू मनाया जाता है, जो कृषि संस्कृति का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है. लखीमपुर और गोलाघाट जैसे इलाकों में लोग अपने पशुओं की पूजा और देखभाल करते हुए इस दिन को खास बनाते नजर आए. इस अवसर पर किसान अपने बैलों और गायों को नदी या तालाब में ले जाकर नहलाते हैं, उन्हें साफ करते हैं और अच्छे भोजन के साथ उनका सम्मान करते हैं. यह परंपरा पशुओं के स्वास्थ्य, समृद्धि और कृषि कार्यों में उनकी भूमिका के प्रति आभार प्रकट करने का तरीका है.

पशुधन के प्रति सम्मान की अनोखी परंपरा

गोरु बिहू के दिन विशेष रूप से हल चलाने वाले बैलों और दूध देने वाली गायों की पूजा की जाती है. ग्रामीण मानते हैं कि ये पशु उनकी आजीविका का आधार हैं, इसलिए उनका सम्मान करना बेहद जरूरी है. कई जगहों पर ‘खिराती’ गायों को भी विशेष रूप से सजाया और संवारा जाता है. यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ संतुलन बनाए रखने का संदेश भी देती है. किसान इस दिन अपने पशुओं को नई रस्सी, चारा और साफ-सफाई देकर उनके प्रति अपना आभार जताते हैं.

कृषि संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव

बैसाखी और बोहाग बिहू जैसे त्योहार भारत की कृषि संस्कृति को जीवंत रखते हैं. ये पर्व न केवल फसल की खुशी का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि किसान और प्रकृति के बीच का रिश्ता कितना गहरा है. फसल कटाई की खुशी, पशुओं के प्रति सम्मान और सामूहिक उत्सव ये सभी मिलकर ग्रामीण भारत की असली तस्वीर पेश करते हैं.

देश के अलग-अलग हिस्सों में मनाए जाने वाले ये कृषि पर्व हमें यह संदेश देते हैं कि खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का आधार है. बैसाखी और बोहाग बिहू जैसे त्योहार किसानों की मेहनत, आस्था और प्रकृति के प्रति उनके गहरे जुड़ाव को सम्मानित करते हैं.

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Published: 14 Apr, 2026 | 12:15 PM
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