काले मक्के ने खोले कमाई के नए रास्ते, बाजार में 200 रुपये तक बिक रहा भुट्टा- जानें खेती का सही तरीका
काले मक्के की पहचान इसके गहरे काले, बैंगनी या कत्थई रंग से होती है. पहली नजर में कई बार लोग इसे जला हुआ मक्का समझ लेते हैं, लेकिन असल में यही इसका सबसे बड़ा आकर्षण है. काला मक्का एक खास किस्म का मक्का है, जिसे वैज्ञानिक तरीके से विकसित किया गया है.
Black corn farming: बदलते समय के साथ किसान भी अब पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर ऐसी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिनकी बाजार में मांग ज्यादा हो और मुनाफा भी बेहतर मिले. ऐसी ही एक खास फसल है काला मक्का, जो आजकल किसानों के बीच तेजी से चर्चा में है. देखने में भले ही यह आम मक्के से बिल्कुल अलग लगे, लेकिन इसके फायदे और कीमत जानकर कोई भी किसान इसकी खेती करने के बारे में जरूर सोचेगा.
क्या है काला मक्का और क्यों है इतना खास
काले मक्के की पहचान इसके गहरे काले, बैंगनी या कत्थई रंग से होती है. पहली नजर में कई बार लोग इसे जला हुआ मक्का समझ लेते हैं, लेकिन असल में यही इसका सबसे बड़ा आकर्षण है. काला मक्का एक खास किस्म का मक्का है, जिसे वैज्ञानिक तरीके से विकसित किया गया है. इसमें सामान्य मक्के की तुलना में पोषक तत्व कहीं ज्यादा पाए जाते हैं. इसमें मौजूद एंथोसायनिन नामक प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट इसे गहरा रंग देता है और यही तत्व इसे सेहत के लिहाज से बेहद फायदेमंद बनाता है.
काला मक्का आयरन, जिंक, कॉपर और फाइबर से भरपूर होता है. यही वजह है कि इसे आज “सुपरफूड” की श्रेणी में रखा जा रहा है. डायबिटीज, दिल की बीमारी और इम्युनिटी बढ़ाने वाले उत्पादों में इसकी मांग तेजी से बढ़ी है.
बाजार में बढ़ती मांग और जबरदस्त कीमत
काले मक्के की सबसे बड़ी ताकत इसकी बाजार कीमत है. जहां सामान्य मक्का बाजार में सीमित दामों पर बिकता है, वहीं काले मक्के की कीमत काफी ज्यादा मिलती है. खासकर शहरी इलाकों, हेल्थ फूड स्टोर्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इसकी भारी मांग है. आज की तारीख में एक काला भुट्टा 150 से 200 रुपये तक में बिक रहा है. यही वजह है कि कम क्षेत्र में खेती करने वाले किसान भी इससे अच्छी कमाई कर पा रहे हैं. कम उत्पादन और ज्यादा मांग होने के कारण इसके दाम स्थिर रहते हैं और किसानों को फसल बेचने में परेशानी नहीं होती.
काले मक्के की खेती के लिए कैसी हो जमीन और मौसम
काले मक्के की खेती के लिए वही परिस्थितियां उपयुक्त मानी जाती हैं, जो सामान्य मक्के के लिए होती हैं. गर्म और हल्की नमी वाली जलवायु इसके लिए सबसे बेहतर रहती है. अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी में यह फसल अच्छी बढ़वार करती है. मिट्टी का पीएच स्तर अगर 5.5 से 7.5 के बीच हो तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बेहतर मिलते हैं.
बुवाई का सही समय और तैयारी
काले मक्के की खेती साल में तीन मौसमों में की जा सकती है. खरीफ में जून से जुलाई, रबी में अक्टूबर से नवंबर और वसंत में फरवरी से मार्च का समय उपयुक्त माना जाता है. बुवाई से पहले खेत की अच्छी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए. इससे जड़ों को फैलने में आसानी होती है और पौधा मजबूत बनता है. बीज की गुणवत्ता इस खेती में बहुत अहम भूमिका निभाती है. अच्छी किस्म का प्रमाणित बीज लेने से फसल में रोग कम लगते हैं और उत्पादन बेहतर होता है.
सिंचाई और पोषण का सही संतुलन
काला मक्का ज्यादा पानी मांगने वाली फसल नहीं है, लेकिन समय पर सिंचाई जरूरी होती है. बुवाई के 15–20 दिन बाद पहली सिंचाई करनी चाहिए. इसके बाद फूल आने और दाने बनने की अवस्था में नमी बनाए रखना बेहद जरूरी है. कटाई से करीब दो हफ्ते पहले सिंचाई बंद कर देना चाहिए, ताकि दाने अच्छी तरह पक सकें.
पोषण के लिए गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खाद का इस्तेमाल बहुत फायदेमंद होता है. इसके साथ संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश देने से फसल की बढ़वार तेज होती है.
फसल सुरक्षा और देखभाल
काले मक्के की फसल में कीट और रोगों से बचाव के लिए रासायनिक दवाओं की जगह जैविक उपाय ज्यादा कारगर साबित होते हैं. नीम तेल का छिड़काव और जैविक फफूंदनाशकों का इस्तेमाल फसल को सुरक्षित रखता है. समय-समय पर खेत का निरीक्षण करते रहने से किसी भी समस्या को शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है.
कटाई, उत्पादन और मुनाफा
काला मक्का करीब 100 से 120 दिनों में तैयार हो जाता है. जब पौधे की पत्तियां सूखने लगें और भुट्टे के दाने सख्त हो जाएं, तब कटाई का सही समय होता है. सही देखभाल के साथ प्रति एकड़ 20 से 25 क्विंटल तक उत्पादन संभव है.
अगर किसान भुट्टे के रूप में इसे सीधे बाजार या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचते हैं, तो मुनाफा और भी ज्यादा हो सकता है. यही वजह है कि काले मक्के की खेती आज किसानों के लिए कम लागत में ज्यादा कमाई का बेहतरीन विकल्प बनती जा रही है.