लौंग की खेती में छिपा है तगड़ा मुनाफा, सही तरीके से करें शुरुआत तो बदल सकती है किस्मत

लौंग एक सदाबहार पेड़ होता है, जो लंबे समय तक उत्पादन देता है. इसका उपयोग मसाले के रूप में तो होता ही है, साथ ही आयुर्वेदिक दवाइयों, तेल, दंत चिकित्सा और सुगंधित उत्पादों में भी लौंग की अच्छी खपत है. यही कारण है कि बाजार में इसकी कीमत स्थिर बनी रहती है और किसानों को नुकसान की आशंका कम रहती है.

नई दिल्ली | Updated On: 23 Jan, 2026 | 12:04 PM

खेती आज सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं रही, बल्कि अगर सही फसल और सही तरीका चुन लिया जाए तो यह अच्छी कमाई का मजबूत साधन भी बन सकती है. ऐसी ही एक मसाले वाली फसल है लौंग, जिसकी मांग देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हमेशा बनी रहती है. कम मात्रा में इस्तेमाल होने के बावजूद इसकी कीमत ज्यादा होती है, यही वजह है कि लौंग की खेती को लाभकारी माना जाता है. खास बात यह है कि लौंग की खेती बड़े खेतों के साथ-साथ आंगन या बड़े गमलों में भी की जा सकती है.

लौंग का पौधा और इसकी खासियत

लौंग एक सदाबहार पेड़ होता है, जो लंबे समय तक उत्पादन देता है. इसका वैज्ञानिक नाम Syzygium aromaticum है. इसका उपयोग मसाले के रूप में तो होता ही है, साथ ही आयुर्वेदिक दवाइयों, तेल, दंत चिकित्सा और सुगंधित उत्पादों में भी लौंग की अच्छी खपत है. यही कारण है कि बाजार में इसकी कीमत स्थिर बनी रहती है और किसानों को नुकसान की आशंका कम रहती है.

जलवायु और स्थान का सही चुनाव

लौंग की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है. जहां तापमान ज्यादा ठंडा न हो और हवा में नमी बनी रहे, वहां लौंग का पौधा अच्छी तरह बढ़ता है. समुद्र तल से 600 से 1000 मीटर की ऊंचाई तक इसके अच्छे परिणाम देखने को मिलते हैं. जिन इलाकों में सालाना 1500 से 2000 मिलीमीटर तक बारिश होती है, वहां लौंग की खेती ज्यादा सफल रहती है.

मिट्टी की तैयारी से तय होती है सफलता

लौंग के पौधे को ऐसी मिट्टी पसंद होती है जिसमें पानी जमा न हो. अच्छी जल निकासी वाली, उपजाऊ और हल्की अम्लीय से तटस्थ मिट्टी इसके लिए सही रहती है. खेत या गमले की मिट्टी को भुरभुरा बनाना जरूरी होता है. अगर संभव हो तो मिट्टी की जांच करवा लेना बेहतर रहता है, ताकि पोषक तत्वों की कमी पहले ही पूरी की जा सके.

बीज और पौध तैयार करने की प्रक्रिया

लौंग के पौधे आमतौर पर बीज से तैयार किए जाते हैं. इसके लिए पूरी तरह पके हुए फलों से बीज निकालकर तुरंत बोना चाहिए, क्योंकि ताजे बीज जल्दी अंकुरित होते हैं. बीज बोने के बाद करीब पांच से छह सप्ताह में अंकुर निकल आते हैं. शुरुआती समय में पौधों को सीधी धूप और ज्यादा पानी से बचाना जरूरी होता है.

रोपाई और पौधों की दूरी

करीब दो साल पुराने स्वस्थ पौधों को खेत में या स्थायी स्थान पर लगाया जाता है. पौधों के लिए गड्ढे तैयार करते समय उसमें अच्छी मात्रा में जैविक खाद मिलानी चाहिए. पौधों के बीच करीब छह मीटर की दूरी रखना जरूरी होता है, ताकि पेड़ बड़े होने पर आपस में न टकराएं और उन्हें भरपूर हवा व धूप मिल सके.

सिंचाई में संतुलन है जरूरी

लौंग के पौधों को नियमित सिंचाई की जरूरत होती है, खासकर गर्मी के मौसम में. लेकिन जरूरत से ज्यादा पानी देना नुकसानदायक हो सकता है. ज्यादा नमी से जड़ सड़न की समस्या हो जाती है, जिससे पौधा कमजोर पड़ सकता है. बारिश के मौसम में जल निकासी का खास ध्यान रखना चाहिए.

पोषण और देखभाल से बढ़ता है उत्पादन

लौंग के पौधों को समय-समय पर जैविक खाद और आवश्यक पोषक तत्व देना जरूरी होता है. गोबर की खाद, कंपोस्ट और नीम खली जैसे प्राकृतिक साधन पौधों की सेहत के लिए अच्छे माने जाते हैं. साथ ही पौधों की नियमित निगरानी करने से कीट और रोग की पहचान जल्दी हो जाती है.

रोग और कीट से कैसे बचाएं पौधे

लौंग के पौधों में कुछ फंगल रोग और कीट लग सकते हैं. शुरुआती अवस्था में जैविक उपाय अपनाकर इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है. साफ-सफाई, सही दूरी और संतुलित सिंचाई से रोगों का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है.

कटाई और सुखाने की प्रक्रिया

लौंग के फूल पूरी तरह खिलने से पहले तोड़े जाते हैं. इसी अवस्था में इनमें सबसे ज्यादा सुगंध और तेल होता है. तोड़े गए फूलों को छांटकर धूप में सुखाया जाता है. अच्छी तरह सूखने के बाद ही इन्हें बाजार में बेचा जाता है.

कम लागत, लंबा फायदा

लौंग की खेती में शुरुआत में थोड़ा धैर्य जरूरी होता है, क्योंकि पौधे से उत्पादन आने में कुछ साल लगते हैं. लेकिन एक बार पेड़ फल देने लगे तो कई वर्षों तक लगातार आमदनी होती रहती है. यही वजह है कि लौंग की खेती को भविष्य की मजबूत और लाभदायक खेती माना जाता है. सही तकनीक और देखभाल के साथ यह खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है.

Published: 24 Jan, 2026 | 01:00 PM

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