हरियाणा की सरकारी गोदामों में रखा हजारों मीट्रिक टन गेहूं सड़कर खराब हो गया है. यानी अब यह गेहूं खाने लायक नहीं रहा. कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) का कहना है कि हरियाणा की खरीद एजेंसियां गेहूं के स्टॉक की देखभाल अच्छी तरह से नहीं की. इसके कारण 2017 से 2021 के बीच 79,967 मीट्रिक टन गेहूं खराब हो गया और राज्य को 174.58 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.
CAG के अनुसार, जब तक गेहूं FCI को नहीं पहुंच जाता, तब तक गेहूं के स्टॉक की सेहत बनाए रखना हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड (HAFED), हरियाणा राज्य वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन (HSWC) और खाद्य और आपूर्ति विभाग (FSD) की जिम्मेदारी है. वहीं, FCI ने कहा है कि अपर्याप्त और गलत भंडारण स्थिति, खराब संरक्षण तकनीक, सरकारी लापरवाही और गलत रखवाली के चलते गेहूं खराब हुआ है. CAG ने यह भी कहा है कि FSD में खराब हुए गेहूं की बड़ी मात्रा 66,722 मीट्रिक टन थी.
FSD के पास 43,000 मीट्रिक टन से ज्यादा खराब गेहूं
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, FSD के पास 43,000 मीट्रिक टन से ज्यादा खराब गेहूं पड़ा हुआ था, जिसके लिए 2022 में एक विभागीय समिति बनाई गई. टेंडर नोटिस में यह शर्त रखी गई थी कि बोली लगाने वाली कंपनियों का औसत वार्षिक कारोबार पिछले तीन वर्षों में कम से कम 15 करोड़ रुपये होना चाहिए. इस शर्त के कारण केवल चार कंपनियां, जिनमें से तीन कंसोर्टियम कंपनियां थीं, जो मुर्गी या पशु आहार बनाने में शामिल नहीं थीं, तकनीकी रूप से योग्य हो सकीं.
9.30 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ
CAG ने कहा कि FCI की जुलाई 2014 की गाइडलाइंस के अनुसार, खराब अनाज को केवल प्रमाणित और वैध पशु आहार निर्माता या उपभोक्ताओं को नीलामी या बोली के जरिए बेचना चाहिए, और यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए थी. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि FSD को HSWC के न्यूनतम निपटान दरों के मुकाबले 14.18 करोड़ रुपये कम राजस्व हुआ और HAFED के न्यूनतम निपटान दरों के मुकाबले 9.30 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, खासकर 2018-19 और 2019-20 में खराब गेहूं के निपटान के दौरान.
64,000 किसानों को भुगतान किया गया
खाद्य और आपूर्ति विभाग को 222.24 करोड़ रुपये का अतिरिक्त ब्याज का बोझ उठाना पड़ा, क्योंकि उन्होंने उच्च ब्याज दरों पर कैश क्रेडिट लिमिट और राज्य बजट से फंड लिया, जबकि वे प्रतिस्पर्धी दरों पर लोन लेने का विकल्प नहीं तलाश पाए. साथ ही 54.90 करोड़ का जुर्माना, जो परिवहनकर्ताओं पर स्टॉक उठाने में देरी के लिए लगाया जाना था, वह लागू नहीं किया गया. इसके अलावा 9.91 करोड़ रुपये ब्याज के रूप में देय था, क्योंकि तीन दिनों के बाद निकासी गेट पास जारी करने पर भुगतान में देरी हुई थी, इसमें 2.28 लाख किसान शामिल थे. हालांकि, सिर्फ 1.02 करोड़ रुपये ही 64,000 किसानों को भुगतान किया गया.