भारतीय किसान यूनियन (सर छोटू राम) ने सरकार से मांग की है कि धान की खरीद 15 सितंबर से शुरू की जाए, ताकि किसानों को आर्थिक नुकसान से बचाया जा सके. यूनियन के प्रवक्ता बहादुर मेहला बल्दी ने कहा है कि कई किस्मों की धान जल्दी पक रही है, इसलिए समय पर खरीद बहुत जरूरी है. अगर सरकार समय पर नहीं खरीदेगी, तो किसान मजबूरी में प्राइवेट व्यापारियों को एमएसपी से कम रेट पर फसल बेचने को मजबूर हो जाएंगे.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, किसान नेता जगदीप औलख ने कहा कि किसानों को उनकी फसल का उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिलना चाहिए ताकि वे घाटे में न बेचें. साथ ही किसानों ने मांग की है कि फर्टिलाइजर वितरण के लिए पोर्टल की अनिवार्यता हटाई जाए. इसके अलावा ‘ड्वार्फ वायरस’ से खराब हुई धान की फसल का गिर्दावरी के जरिए मुआवजा तय किया जाए. साथ ही नहरों और ड्रेनों की सफाई की जाए, ताकि सिंचाई की सुविधा बेहतर हो.
स्मार्ट मीटर को वापस लिया जाए
किसानों ने सरकार से मांग करते हुए कहा है कि ट्यूबवेल कनेक्शन की प्रक्रिया को भी सरल की जाए और बिजली के बढ़े हुए बिल और स्मार्ट मीटर को वापस लिया जाए. इसके अलावा किसानों ने मांग की है कि एमएसपी की गारंटी के साथ समय पर फसल की खरीद की जाए और नकली बीज व कीटनाशकों पर सख्ती हो और इनकी सप्लाई में पारदर्शिता लाई जाए.
मुख्यमंत्री आवास के बाहर होगा प्रदर्शन
खास बात यह है कि भारतीय किसान यूनियन ने घोषणा की है कि 1 सितंबर को कुरुक्षेत्र स्थित मुख्यमंत्री आवास के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया जाएगा. बहादुर मेहला ने कहा है कि हम सरकार की किसान विरोधी नीतियों को उजागर कर रहे हैं और किसानों से अपील कर रहे हैं कि वे इस विरोध मार्च में शामिल हों. उन्होंने कहा है कि हमें किसानों से अच्छा समर्थन मिल रहा है. इस प्रदर्शन के जरिए यूनियन अपनी मांगों को दोहराएगी.
वायरस से धान की फसल को नुकसान
बता दें कि इस साल हरियाणा में करीब 40 लाख एकड़ में धान की रोपाई हुई है. लेकिन SRBSDV वायरस के चलते धान की फसल को लगभग 5 से 10 फीसदी तक नुकसान हुआ है. सरकार का कहना है कि धान की फसल में से लगभग 92,000 एकड़ क्षेत्र इस वायरस से प्रभावित पाया गया है. हालांकि, इस दावे को किसान यूनियनों ने खारिज कर दिया है. भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के प्रदेश अध्यक्ष रत्तन मान ने कहा कि किसानों का नुकसान इससे कहीं ज्यादा है. उन्होंने कहा कि किसानों को पहले तो वायरस से खराब हुई फसल को नष्ट करना पड़ा, जिससे खर्च बढ़ा. फिर दोबारा फसल की रोपाई करनी पड़ी, जो और महंगी साबित हुई. जब सरकार खुद मान रही है कि नुकसान हुआ है, तो उसे जमीनी स्तर पर गिर्दावरी (फसल सर्वे) करानी चाहिए और किसानों को मुआवजा मिले.