चंबल के बीहड़ में बाढ़ के खतरे को दावत दे रहे हैं किसान, प्रकृति से खिलवाड़ कहीं सदा के लिए खत्म न कर दे खेती

दुर्दांत ’बागियों’ ने भी चंबल के बीहड़ को अपना रैन बसेरा जरूर बनाया, लेकिन इसकी प्राकृतिक संपदा को लूटने की बेवकूफी कभी नहीं की. मगर अब, अत्याधुनिक तकनीक के अहंकार में डूबे आधुनिक समाज ने विकास के नाम पर चंबल का स्वरूप बदलने की सनक पाल ली है, जो आने वाले समय में चंबल की बाढ़ की चपेट में आने का खतरा बढ़ता जा रहा है.

निर्मल यादव
नोएडा | Published: 30 Jan, 2026 | 07:35 PM
चंबल नदी पौराणिक काल से ही मध्य प्रदेश और राजस्थान के लिए जीवन रेखा मानी गई है. इस नदी का उद्गम एमपी के महू जिले में विंध्य पर्वतमाला की जनापाव पहाड़ी से होता है. मन को छू लेने वाले नैसर्गिक सौंदर्य से आप्लावित चंबल नदी उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और धार होते हुए राजस्थान में चित्तौड़गढ़, कोटा एवं धौलपुर से पुन: एमपी पहुंच कर मुरैना तथा भिंड के रास्ते यूपी में प्रवेश करती है. इस बारहमासी सदानीरा का लगभग 1000 किमी का सफर इटावा के मुरादगंज में यमुना नदी में मिलने के साथ ही पूरा होता है.
इस प्रकार चंबल अपने आगोश में समाने वाले इलाके में अनंत काल से जमीन और जीव जगत की जल संबंधी जरूरतों को पूरा कर रही है. चंबल के आस पास आज भी मौजूद मिट्टी के ऊंचे टीले इस नदी के लाखों साल के तेज प्रवाह के साक्षी हैं. इन टीलों की खास बनावट ही चंबल क्षेत्र को दुर्गम भी बनाती है. इसीलिए इसे स्थानीय भाषा में बीहड़ कहा जाता है.

चंबल का स्वरूप बदलने की सनक बड़े खतरे को दावत

हजारों साल के मानव विकास क्रम में कभी भी चंबल के बीहड़ का स्वरूप बदलने का फितूर किसी के दिमाग में नहीं आया. धौलपुर में चंबल के ऊंचे मिट्टी के टीलों पर स्थित एक प्राचीन किले के खंडहर, हमारे पूर्वजों की उस दूरदर्शी सोच के गवाह हैं, जो पिछली पीढ़ियों को चंबल के पर्यावास के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ न करने के लिए आगाह करते आए हैं. यहां तक कि दुर्दांत ’बागियों’ ने भी चंबल के बीहड़ को अपना रैन बसेरा जरूर बनाया, लेकिन इसकी प्राकृतिक संपदा को लूटने की बेवकूफी कभी नहीं की. मगर अब, अत्याधुनिक तकनीक के अहंकार में डूबे आधुनिक समाज ने विकास के नाम पर चंबल का स्वरूप बदलने की सनक पाल ली है. हालांकि, विकास के नाम पर नदी, पहाड़ और जंगलों को मैदान करके कंक्रीट के जंगल उगाने की सनक पूरे देश में देखी जा रही है, लेकिन चंबल के बीहड़ को प्रकृति के नैसर्गिक संरक्षकों यानी धरती पुत्र किसानों से खतरा पैदा हो गया है.

यह बात दीगर है कि विकास के नाम पर चंबल के क्षेत्राधिकार में हो रहे दखल और किसानों के द्वारा खेती के लिए बीहड़ में मिट्टी के टीलों को समतल करने में बुनियादी फर्क मंशा का है. चंबल इलाके में हो रहे विकास कार्यों के पीछे मुट्ठी भर लोगों को आर्थिक लाभ पहुंचाने की मंशा स्पष्ट रूप से झलकती है. वहीं, किसानों के लगातार बढ़ते परिवारों के पास रोजगार के संकट से उपज रही गरीबी ही वह मजबूरी है, जिसने खेती का रकबा बढ़ाने के लिए किसानों को चंबल के बीहड़ को समतल करने पर विवश कर दिया है.
विकास की सनक हो या खेती की मजबूरी, इन दोनों के कारण कुदरत को ही नुकसान हो रहा है. ऐसे में सनद रहे कि कुदरत जब इंसाफ करती है, तब उसकी अदालत में न तो सनकी विकास के लिए कोई मुरौव्वत की जाती है और ना ही खेती की मजबूरी को नजरअंदाज किया जाता है. इतना तो तय है कि इन दोनों ही वजहों से प्रकृति को भारी नुकसान हो रहा है. अब प्रकृति स्वयं ही यह तय करेगी कि इस नुकसान की भरपाई कब और कैसे होगी. ऐसे में फिलहाल यह समझना जरूरी है कि विकास और आजीविका के नाम पर चंबल के पर्यावास को कितने बड़े पैमाने पर नुकसान हो रहा है.

हजारों साल की प्रक्रिया ने चंबल के आसपास पीली मिट्टी के ऊंचे टीले बन गए

इस क्रम में सबसे पहले पर्यावरण के लिहाज से चंबल के बीहड़ की संवेदनशीलता को जानना वाजिब है. यह सर्वविदित है कि मध्य प्रदेश में सतपुड़ा और विंध्य पर्वत मालाओं के वन क्षेत्र से निकलने वाली चार प्रमुख नदियां सोन, चंबल, बेतवा और केन का बहाव, दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर है. इनमें से सोन, बेतवा और केन अपने बहाव के साथ पहाड़ों से कंकड़ पत्थर को पानी के साथ बहाकर लाने के क्रम में हम इंसानों को बालू के रूप में प्रमुख खनिज की आपूर्ति करती हैं. वहीं, चंबल नदी के बहाव क्षेत्र में पीली भुरभुरी मिट्टी की उपलब्धता वाला राजस्थान का इलाका भी आता है. इसलिए यह नदी मध्य प्रदेश के पथरीले इलाकों से बालू को लाकर राजस्थान में छोड देती है और आगे बढते हुए राजस्थान की पीली मिट्टी को अपने बहाव के साथ ले जाकर धौलपुर और मध्य प्रदेश में मुरैना जिले के मध्यवर्ती इलाके में छोड देती है. हजारों साल से चल रही इस प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप ही धौलपुर से मुरैना के बीच में चंबल के आसपास पीली मिट्टी के ऊंचे टीले बन गए हैं.

सहस्त्राब्दियों से निर्जन और वीरान पड़े इन टीलों की मिट्टी में प्रकृति ने सिर्फ बबूल को ही पनपने की इजाजत दी है. हमारे पूर्वज इस इलाके की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को महज इस एक संकेत मात्र से ही समझने में सक्षम थे कि आखिर इस बीहड़ में बबूल के अलावा दूसरा कोई दरख़्त, अगर पनप नहीं पा रहा है तो इसके पीछे कुदरत का स्पष्ट संदेश है कि इस इलाके में कोई दखल न दिया जाए. इसीलिए प्रकृति के इस मौन संदेश की अवमानना अब तक की पीढ़ियों ने नहीं की. मगर अब विनाश की ओर ले जा रही विकास की अंधी दौड़ ने शहरी लोगों के साथ ग्रामीणों की जरूरतों को भी अंतहीन बना दिया है. इसके कारण किसान भी अब अपनी गरीबी का रोना रोते हुए खेती के नाम पर चंबल के टीलों को समतल करके खेत बनाने में जुट गए है.

चंबल की जलधारा से सटे खेत भविष्य के लिए मुसीबत का सबब बनेंगे

धौलपुर से लेकर मुरैना के बीच में पिछली पीढ़ी के किसानों ने नदी के बहाव क्षेत्र से 5-10 किमी दूर अपने खेतों को सीमित रखा था. यानी नदी काे जल भराव के लिए इस इलाके में 5 से 10 किमी तक का क्षेत्र पूरी तरह से मिल रहा था. अब हालत यह है कि चंबल नदी की जलधारा से सटे हुए खेत आसानी से देखने को मिल जाते हैं. मुरैना जिले में चंबल नदी के आसपास भानपुर, राजघाट और मुरादपुर सहित दर्जन भर गांव के किसान सहज भाव से स्वीकार करते हैं कि उनके परिवार का आकार लगातार बढ रहा है. खेती पर निर्भर इन गांव के किसानों के पास रोजगार को कोई अन्य साधन नहीं है. इस कारण ये किसान मजबूरी में बीहड़ पट्टी का अतिक्रमण करके अपनी खेती का रकबा बढ़ा रहे हैं.

तेजी से समतल हो रहे चंबल के बीहड़ों पर दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रीजनल डेवलपमेंट के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेस में प्रोफेसर पद्मिनी पाणी पिछले 3 दशक से अध्ययन कर रहीं हैं. प्रो पाणी ने अपनी एक रिपोर्ट में किसानों द्वारा चंबल के इलाके को समतल करने के जोखिम का जिक्र करते हुए कहा है कि इससे उत्पन्न खतरे का खामियाजा भविष्य में किसानों को ही प्रकृति के प्रकोप के रूप में भुगतना पडेगा. उनकी दलील है कि चंबल की बीहड़ पट्टी में मौजूद मिट्टी के ऊंचे टीले सदियों से बाढ की आपदा को रोकने का काम करते रहे हैं. इस लिहाज से चंबल की जलधारा के आसपास मिट्टी के टीलों को समतल करके खेती करने से अल्प अवधि में आजीविका का लाभ जरूर मिल सकता है, लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव मिट्टी के भारी कटाव के रूप में भूस्खलन और बाढ़ के खतरे को दावत देने के रूप में अब दिखने लगा है.

मुरैना का अटार गांव कटान की विभीषिका झेल रहा

इसका ताजा उदाहरण चंबल नदी के नजदीक बसा मुरैना का अटार गांव है. इस गांव के पास बीहड़ों में पिछले कुछ सालों की तेज बारिश के कारण मिट्टी का भारी कटाव देखने को मिल रहा है. इस कटाव को रोकने के लिए स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित इलाके में कुछ चेक डैम भी बनाए लेकिन चंबल की भुरभुरी मिट्टी पानी के वेग को सहन करके टिकने योग्य नहीं है, इसलिए चेक डैम बनाने के प्रयोग भी असफल साबित हो रहे हैं. आलम यह है कि किसानों ने कर्ज लेकर बीहड़ को समतल करने में लाखों रुपये खर्च कर दिए, अब उनकी मेहनत की कमाई उसी मिट्टी में मिलने को अभिशप्त है, जिसे काट कर खेत बनाए गए थे. बारिश के पानी से हो रहे मिट्टी के भारी कटाव के कारण समतल किए गए खेत फिर से बीहड़ बनने लगे हैं. साथ ही बाढ़ की जद में आ रहे तटीय गांव, जानमाल के खतरे से भी घिर गए हैं. किसानों काे हाे रहे नुकसान और प्राकृतिक खतरे से इतर उन जीव जंतुओं को भी चंबल के इलाके में इंसानी दखल की भारी कीमत चुकानी पड रही है, जिनके वजूद के लिए कुदरत ने इस पर्यावास को खास तौर पर चंबल के मार्फत बनाया है.

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