El Nino Alert: देश में संभावित अल नीनो (El Nino) और कमजोर मॉनसून की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार दालों की उपलब्धता और कीमतों को लेकर सतर्क हो गई है. सरकार नहीं चाहती कि, आने वाले महीनों में मौसम की मार के कारण दालों की कमी हो या कीमतें अचानक बढ़ जाएं. इसी वजह से अब दालों का पर्याप्त भंडार सुरक्षित रखने की रणनीति पर काम शुरू हो गया है. उपभोक्ता मामलों के विभाग ने कृषि मंत्रालय से दालों के सरकारी स्टॉक को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का अनुरोध किया है, ताकि जरूरत पड़ने पर बाजार में दालों की आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों को नियंत्रित किया जा सके.
सरकार क्यों बढ़ा रही है दालों का भंडार?
उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने कृषि सचिव अतीश चन्द्रा को पत्र लिखकर सुझाव दिया है कि, मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत खरीदी गई दालों को नौ महीने के भीतर निकालने के नियम में फिलहाल छूट दी जाए. सरकार चाहती है कि खरीफ 2025-26 की अरहर (तूर) और रबी 2026 के चने को नौ महीने से अधिक समय तक सुरक्षित रखा जाए. इससे भविष्य में अगर उत्पादन प्रभावित होता है तो सरकारी एजेंसियों के पास पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहेगा.
NAFED और NCCF के पास रहेगा पर्याप्त स्टॉक
अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो NAFED और NCCF जैसी सरकारी एजेंसियों के पास दालों का बड़ा भंडार रहेगा. जरूरत पड़ने पर यही स्टॉक बाजार में उतारा जाएगा, जिससे दालों की उपलब्धता बनी रहेगी और आम लोगों को राहत मिल सकेगी. सरकार का उद्देश्य यह भी है कि मौसम की खराब स्थिति में बाजार में अचानक दालों की कमी न हो और कीमतों में तेज उछाल से बचा जा सके.
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बफर स्टॉक बढ़ाने की तैयारी
मौसम की अनिश्चितता और दालों की संभावित कमी को देखते हुए उपभोक्ता मामलों के विभाग ने पहले से तैयारी शुरू कर दी है. विभाग ने 3 लाख टन अरहर (तूर), 5 लाख टन चना और 50 हजार टन उड़द को प्राइस सपोर्ट स्कीम (PSS) से निकालकर प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड (PSF) के बफर स्टॉक में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इन दालों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) करीब 5,882.50 करोड़ रुपये है. सरकार का मकसद जरूरत पड़ने पर इन दालों का इस्तेमाल कर बाजार में आपूर्ति बनाए रखना और कीमतों को ज्यादा बढ़ने से रोकना है.
अल नीनो से क्यों बढ़ी चिंता?
सरकार लगातार खरीफ सीजन की बुवाई और मौसम पर नजर बनाए हुए है. शुरुआती आकलन बताते हैं कि, अल नीनो के कारण कई इलाकों में बारिश सामान्य से कम हो सकती है. इसका असर दालों की बुवाई और उत्पादन पर पड़ने की आशंका है. हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि कुल उत्पादन कितना प्रभावित होगा, लेकिन सरकार पहले से तैयारी करके जोखिम कम करना चाहती है.
दालों की बुवाई में आई गिरावट
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 17 जुलाई 2026 तक देश में दलहन की बुवाई पिछले साल की तुलना में करीब 15 प्रतिशत कम रही है. इस अवधि तक केवल 69.2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दलहन की बुवाई हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी समय तक यह आंकड़ा 81.52 लाख हेक्टेयर था. विशेषज्ञों का कहना है कि जून में कम बारिश होने से कई राज्यों में खरीफ की बुवाई प्रभावित हुई. अगर सितंबर में अल नीनो और मजबूत होता है, तो इसका असर खरीफ के साथ-साथ रबी फसलों पर भी पड़ सकता है.
कीमतें बढ़ें तो भी भविष्य सुरक्षित रखना चाहती है सरकार
सरकार का मानना है कि, अगर इस समय पूरा सरकारी स्टॉक बाजार में बेच दिया गया और अगले साल उत्पादन कमजोर रहा, तो देश को दालों की बड़ी कमी का सामना करना पड़ सकता है. इसी वजह से सरकार फिलहाल कुछ हद तक कीमतों में बढ़ोतरी का जोखिम उठाने के लिए तैयार दिखाई दे रही है, ताकि अगले वर्ष जरूरत पड़ने पर पर्याप्त दालें उपलब्ध कराई जा सकें.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि, अल नीनो का सबसे बड़ा असर अक्सर अगले वर्ष देखने को मिलता है. ऐसे में अभी से मजबूत बफर स्टॉक तैयार करना भविष्य की खाद्य सुरक्षा और कीमतों को स्थिर रखने के लिए जरूरी कदम माना जा रहा है.