भारत ने रचा नया इतिहास, 2024-25 में कृषि उत्पादन 357 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा
दालों और तिलहनों की खरीद में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है. 2013-14 के मुकाबले दालों की सरकारी खरीद में 7,350 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, जबकि तिलहनों की खरीद 1,500 प्रतिशत तक बढ़ी है. इससे किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलने लगा है और उनकी आय में सुधार हुआ है.
भारत का कृषि क्षेत्र लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है. बदलते मौसम, बढ़ती आबादी और वैश्विक चुनौतियों के बावजूद देश ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. साल 2024-25 में भारत का कुल कृषि उत्पादन 357 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 25 मिलियन टन ज्यादा है. यह उपलब्धि किसानों की मेहनत, वैज्ञानिकों के शोध और सरकार की योजनाओं के बेहतर तालमेल का नतीजा है.
इस बारे में जम्मू में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने यह भी बताया कि भारत आज जलवायु परिवर्तन जैसी बड़ी चुनौती से निपटने में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है.
रिकॉर्ड उत्पादन के पीछे क्या है कारण
पिछले कुछ सालों में कृषि क्षेत्र में कई सकारात्मक बदलाव हुए हैं. नई तकनीकों का इस्तेमाल, बेहतर बीज, सिंचाई सुविधाओं में सुधार और किसानों को मिल रही सरकारी मदद ने उत्पादन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है. उपराज्यपाल ने बताया कि बागवानी क्षेत्र में भी अच्छी प्रगति हुई है. देश का बागवानी उत्पादन 362 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जिसमें फल, सब्जियां और अन्य नकदी फसलें शामिल हैं.
जलवायु परिवर्तन बन रहा बड़ी चुनौती
हालांकि उत्पादन बढ़ा है, लेकिन खेती के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं. जलवायु परिवर्तन का असर अब साफ दिखने लगा है. कई राज्यों में पिछले साल असामान्य बारिश, सूखा और तापमान में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला. मनोज सिन्हा ने कहा कि अब समय आ गया है कि खेती को जलवायु के अनुकूल बनाया जाए, ताकि किसान आने वाले समय में भी सुरक्षित रह सकें.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लैब में होने वाला शोध तभी सफल माना जाएगा, जब उसका फायदा सीधे खेत तक पहुंचे. वैज्ञानिकों और किसानों को मिलकर ऐसे समाधान तैयार करने होंगे, जो जमीन पर काम करें और किसानों की असली जरूरतों को पूरा करें.
सरकार की योजनाओं से मिला सहारा
कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए सरकार ने कई अहम कदम उठाए हैं. देशभर में 25 करोड़ से ज्यादा सॉयल हेल्थ कार्ड बांटे गए हैं, जिससे किसानों को अपनी जमीन की स्थिति समझने में मदद मिलती है.
किसानों की कर्ज सीमा भी बढ़ाकर 3 लाख से 5 लाख रुपये कर दी गई है, जिससे वे आसानी से खेती में निवेश कर सकें.इसके अलावा, बेहतर बीजों के विकास के लिए 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिससे उत्पादन और बढ़ने की संभावना है.
MSP और खरीद में बड़ा बदलाव
दालों और तिलहनों की खरीद में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है. 2013-14 के मुकाबले दालों की सरकारी खरीद में 7,350 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, जबकि तिलहनों की खरीद 1,500 प्रतिशत तक बढ़ी है. इससे किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलने लगा है और उनकी आय में सुधार हुआ है.
छोटे किसानों पर खास ध्यान जरूरी
मनोज सिन्हा ने यह भी कहा कि छोटे और सीमांत किसान जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. ऐसे में जरूरी है कि सरकार और संस्थाएं मिलकर ऐसे कदम उठाएं, जिससे इन किसानों को ज्यादा सुरक्षा और सहायता मिल सके. उन्होंने प्रिसिजन फार्मिंग, जल प्रबंधन, फसल विविधीकरण और नई तकनीकों के इस्तेमाल पर जोर दिया. उनका मानना है कि खेती को आधुनिक बनाकर ही भविष्य की चुनौतियों से निपटा जा सकता है.
खेती सिर्फ रोजगार नहीं, देश की ताकत
उन्होंने कहा कि खेती सिर्फ रोजगार का साधन नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था और संस्कृति की मजबूत नींव है. हर किसान देश की खाद्य सुरक्षा का रक्षक है, इसलिए उसकी सुरक्षा और सम्मान सबसे जरूरी है.