Soil Fertility Management: देश में खेती का खर्च लगातार बढ़ रहा है और खाद की कीमतें भी किसानों की चिंता बढ़ा रही हैं. इसी को देखते हुए केंद्र सरकार ने खाद के सही और संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने तथा मिट्टी की क्वालिटी सुधारने के लिए एक महीने का ‘खेत बचाओ अभियान’ शुरू किया है. वहीं, दूसरी तरफ वैश्विक बाजार में बढ़ते दबाव और पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण सरकार पर खाद सब्सिडी का बोझ बढ़ने की आशंका है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां लंबे समय तक ऐसी ही बनी रहीं, तो सरकार को खाद सब्सिडी के लिए अतिरिक्त धन की व्यवस्था करनी पड़ सकती है.
संतुलित खाद उपयोग को बढ़ावा देगा ‘खेत बचाओ अभियान’
केंद्र सरकार का यह नया अभियान किसानों को खाद का सही और संतुलित इस्तेमाल करने के बारे में जागरूक करने के लिए शुरू किया गया है. इसका मकसद सिर्फ फसल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि लंबे समय तक मिट्टी की सेहत और उर्वरता को भी बनाए रखना है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, कई इलाकों में रासायनिक खाद के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी की क्वालिटी पर असर पड़ रहा है. ऐसे में यह अभियान किसानों को सही मात्रा में खाद का उपयोग करने और बेहतर व टिकाऊ खेती के तरीकों की जानकारी देगा.
दो महीनों में ही खर्च हो गया 20 प्रतिशत बजट
उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस. शर्मा के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए तय की गई खाद सब्सिडी का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा पहले दो महीनों में ही खर्च हो चुका है. इससे पता चलता है कि उर्वरकों पर सरकार का खर्च अपेक्षा से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. उन्होंने कहा कि अगर जरूरत पड़ी, तो उर्वरक विभाग अतिरिक्त धनराशि के लिए वित्त मंत्रालय से अनुरोध करेगा. सरकार का कहना है कि किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता है और इसके लिए जरूरी संसाधनों की व्यवस्था की जाएगी.
खाद सब्सिडी के लिए कितना है बजट?
केंद्रीय बजट 2026-27 में खाद सब्सिडी के लिए कुल 1.70 लाख करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया है.
इसमें:
- यूरिया सब्सिडी के लिए 1.16 लाख करोड़ रुपये से अधिक
- फास्फोरस और पोटाश आधारित उर्वरकों के लिए लगभग 54 हजार करोड़ रुपये
आवंटित किए गए हैं.
हालांकि, पिछले वित्त वर्ष की तुलना में सब्सिडी का अनुमान कम रखा गया था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों ने सरकार की चिंताओं को बढ़ा दिया है.
वैश्विक संकट का असर भारतीय कृषि पर
पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और युद्ध जैसे हालात का असर सिर्फ तेल और ऊर्जा बाजार पर ही नहीं, बल्कि उर्वरक उद्योग पर भी पड़ रहा है. भारत बड़ी मात्रा में उर्वरक और उसके कच्चे माल का आयात करता है. ऐसे में जब वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो उर्वरकों की लागत भी बढ़ जाती है. इसका सीधा असर सरकार की सब्सिडी पर पड़ता है, क्योंकि किसानों के लिए कीमतें स्थिर रखने के लिए सरकार को ज्यादा सब्सिडी देनी पड़ती है.
3.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है खर्च
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, अगर पश्चिम एशिया का संकट खरीफ सीजन के अंत तक जारी रहता है, तो उर्वरक सब्सिडी पर कुल खर्च 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है. अगर वैश्विक आपूर्ति में दिक्कत बनी रहती है और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम व्यापारिक रास्तों पर दबाव बना रहता है, तो यह खर्च बढ़कर 3.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. यह रकम सरकार के मौजूदा बजट प्रावधान से काफी अधिक होगी.
किसानों पर क्या होगा असर?
फिलहाल सरकार किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी की व्यवस्था जारी रखे हुए है, इसलिए किसानों को खाद की कीमतों में अभी कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखेगा. लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगाई लंबे समय तक बनी रहती है, तो सरकार पर खर्च का दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में ‘खेत बचाओ अभियान’ और खाद के संतुलित इस्तेमाल की रणनीति आगे चलकर उर्वरकों की खपत कम करने और खेती की लागत को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है.