केरल के पारंपरिक मसालों की वापसी, फिर बाजार में लौटेगी कोचीन अदरक और अलप्पी हल्दी की खुशबू

कोचीन जिंजर और अलप्पी फिंगर हल्दी कोई नई किस्में नहीं हैं. इनका नाम 19वीं सदी के व्यापारिक रिकॉर्ड में भी मिलता है. उस दौर में इन मसालों की गुणवत्ता, रंग, खुशबू और औषधीय गुणों के कारण यूरोप, अमेरिका और मध्य पूर्व तक इनकी मांग थी.

नई दिल्ली | Published: 11 Feb, 2026 | 02:39 PM

Kerala spices revival: भारत की पहचान सिर्फ उसकी संस्कृति से नहीं, बल्कि उसके खेतों और मसालों से भी रही है. खासकर केरल की मिट्टी से उगने वाले मसालों की खुशबू ने सदियों तक दुनिया को अपनी ओर खींचा है. कोचीन की अदरक और अलप्पी की हल्दी कभी विदेशी बाजारों में भारत का नाम थीं. लेकिन समय के साथ ये पारंपरिक किस्में धीरे-धीरे खेतों और बाजारों से गायब होती चली गईं. अब एक बार फिर उम्मीद की किरण जगी है. केरल कृषि विश्वविद्यालय (KAU) ने इन दोनों ऐतिहासिक मसालों को दोबारा पहचान दिलाने की पहल शुरू की है.

सदियों पुरानी पहचान, जो लगभग खो गई थी

कोचीन जिंजर और अलप्पी फिंगर हल्दी कोई नई किस्में नहीं हैं. इनका नाम 19वीं सदी के व्यापारिक रिकॉर्ड में भी मिलता है. उस दौर में इन मसालों की गुणवत्ता, रंग, खुशबू और औषधीय गुणों के कारण यूरोप, अमेरिका और मध्य पूर्व तक इनकी मांग थी.

लेकिन बीते कुछ वर्षों में इनका उत्पादन तेजी से घट गया. कारण साफ है किसानों ने ऐसी नई किस्में अपनानी शुरू कर दीं जो आकार में बड़ी थीं और ज्यादा पैदावार देती थीं. घरेलू बाजार को वही किस्में पसंद आने लगीं, जिससे पारंपरिक मसाले पीछे छूट गए.

जब ज्यादा पैदावार ने बिगाड़ दी पहचान

सेमिनार में विशेषज्ञों ने बताया कि बिना सोचे-समझे खेती और अलग-अलग किस्मों के आपस में मिल जाने से इन पारंपरिक मसालों की असली पहचान ही कमजोर हो गई. नतीजा यह हुआ कि निर्यात के लिए जो खास गुणवत्ता चाहिए थी, वह धीरे-धीरे खत्म होने लगी. यानी मसाले तो उगते रहे, लेकिन वह खुशबू, वह स्वाद और वह पहचान नहीं बची, जिसके लिए दुनिया इन्हें जानती थी.

अब वैज्ञानिक तरीके से हो रही वापसी

केरल कृषि विश्वविद्यालय ने इस समस्या को गंभीरता से लिया और एक खास परियोजना के तहत इन मसालों को दोबारा जीवित करने का फैसला किया. यह काम MIDH परियोजना के अंतर्गत किया जा रहा है, जो 2022 से 2026 तक चलेगी.

इस परियोजना के तहत वैज्ञानिकों ने शुद्ध किस्मों की पहचान की, उन्हें अलग किया और अब बड़े पैमाने पर दोबारा खेती के लिए तैयार किया जा रहा है.

किसानों के लिए खुलेंगे नए मौके

बिदनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना के प्रमुख वैज्ञानिक सुनील अप्पुकुट्टन नायर कहते हैं कि यह सिर्फ मसालों को बचाने की कोशिश नहीं है, बल्कि किसानों की आमदनी बढ़ाने का भी रास्ता है.उन्होंने बताया कि मध्य पूर्व, यूरोप और अमेरिका में इन मसालों की मांग लगातार बढ़ रही है. अगर किसान सही किस्म और सही तरीके से खेती करें, तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छे दाम मिल सकते हैं.

इसके लिए किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और निर्यातकों को जोड़ा जाएगा. शुरुआत में किसानों को बीज किट भी दी जाएंगी, ताकि वे बिना जोखिम के खेती शुरू कर सकें.

मांग बहुत, लेकिन माल कम

वर्ल्ड स्पाइस ऑर्गेनाइजेशन के चेयरमैन रामकुमार मेनन ने साफ कहा कि बाजार में मांग की कोई कमी नहीं है. हर साल करीब 20 हजार टन सूखे कोचीन अदरक और 50 हजार टन उच्च गुणवत्ता वाली हल्दी की जरूरत है.

समस्या यह है कि इस स्तर की गुणवत्ता वाला माल अभी बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है. खासकर दवा और न्यूट्रास्यूटिकल कंपनियां इन मसालों को इम्युनिटी बढ़ाने वाले गुणों के कारण ज्यादा मांग रही हैं.

निर्यात से घरेलू खेती को मिलेगा फायदा

ऑल इंडिया स्पाइसेस एक्सपोर्टर्स फोरम और वर्ल्ड स्पाइस ऑर्गेनाइजेशन ने सरकार के सामने यह मुद्दा उठाया, जिसके बाद यह विशेष योजना बनाई गई. अब लक्ष्य है कि पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर निर्यात के लिए विशेष खेती करना. इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलेगी, बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी और भारत की पारंपरिक मसाला पहचान फिर मजबूत होगी.

परंपरा और आधुनिकता का सही मेल

केरल कृषि विश्वविद्यालय की यह पहल यह दिखाती है कि अगर परंपरा को विज्ञान से जोड़ा जाए, तो पुराने खजाने फिर से चमक सकते हैं. कोचीन जिंजर और अलप्पी फिंगर हल्दी की वापसी सिर्फ मसालों की वापसी नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे की वापसी है कि किसानों की मेहनत और भारत की विरासत आज भी दुनिया में अपनी जगह बना सकती है.

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