Report: उर्वरक नीति में सुधार नहीं हुआ तो मिट्टी और पोषण दोनों पर पड़ेगा गहरा असर, जानें कैसे
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में लंबे समय से उर्वरकों का असंतुलित इस्तेमाल हो रहा है. कुछ उर्वरक बहुत सस्ते हैं, इसलिए किसान उनका जरूरत से ज्यादा उपयोग कर लेते हैं, जबकि दूसरे जरूरी पोषक तत्वों की अनदेखी हो जाती है. इसका सीधा असर मिट्टी की ताकत पर पड़ता है.
soil health India: भारत ने खेती और खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी तरक्की की है. आज देश न सिर्फ अपनी जरूरत का अनाज पैदा करता है, बल्कि दुनिया के कई देशों को भी अनाज भेजता है. इसके बावजूद एक गंभीर समस्या लगातार बनी हुई है—मिट्टी की सेहत का बिगड़ना. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मिट्टी कमजोर होगी, तो फसल भी कमजोर होगी और इसका असर लोगों की सेहत पर भी पड़ेगा. इसी मुद्दे पर हाल ही में एक अहम नीति पत्र सामने आया है, जिसमें उर्वरक की कीमतों और उनके इस्तेमाल में सुधार की जरूरत बताई गई है.
यह नीति पत्र ICRIER से जुड़े कृषि अर्थशास्त्रियों ने तैयार किया है. इस रिपोर्ट को अशोक गुलाटी, सच्चिदा नंद, रितिका जुनेजा और बिश्वबरा साहू ने मिलकर लिखा है. इन विशेषज्ञों का मानना है कि अब खेती को सिर्फ पैदावार बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि पोषण और मिट्टी की गुणवत्ता पर भी उतना ही ध्यान देना होगा.
सिर्फ फसल नहीं, मिट्टी भी बीमार हो रही है
बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के अनुसार, रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में लंबे समय से उर्वरकों का असंतुलित इस्तेमाल हो रहा है. कुछ उर्वरक बहुत सस्ते हैं, इसलिए किसान उनका जरूरत से ज्यादा उपयोग कर लेते हैं, जबकि दूसरे जरूरी पोषक तत्वों की अनदेखी हो जाती है. इसका सीधा असर मिट्टी की ताकत पर पड़ता है. धीरे-धीरे मिट्टी में जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व कम हो जाते हैं और जमीन की उर्वरता घटने लगती है.
अनाज भरपूर, फिर भी कुपोषण क्यों?
भारत आज दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी का पेट भरता है, जबकि उसके पास दुनिया की कुल जमीन का बहुत छोटा हिस्सा है. 1960 के दशक में जहां देश का खाद्यान्न उत्पादन करीब 82 मिलियन टन था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 357 मिलियन टन तक पहुंच गया है. देश दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक भी बन चुका है. सरकार करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज भी उपलब्ध करा रही है.
इसके बावजूद बच्चों में कुपोषण की समस्या खत्म नहीं हुई है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, आज भी बड़ी संख्या में बच्चे लंबाई और वजन दोनों में पीछे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मतलब यह है कि अब समस्या सिर्फ पेट भरने की नहीं, बल्कि पोषण की गुणवत्ता की है.
मिट्टी और पोषण का गहरा संबंध
रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर मिट्टी में जरूरी पोषक तत्व नहीं होंगे, तो फसल भी पोषक नहीं होगी. ऐसे अनाज से पेट तो भर सकता है, लेकिन शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता. इसे विशेषज्ञ “खामोश कुपोषण” कहते हैं.
जिंक की कमी इसका साफ उदाहरण है. अगर मिट्टी में जिंक कम है, तो गेहूं और चावल जैसे अनाजों में भी जिंक की मात्रा कम हो जाती है. इसका असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है और लंबी उम्र तक नुकसान पहुंचा सकता है.
उर्वरक नीति में बदलाव की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि उर्वरकों की कीमतों को तर्कसंगत बनाना बहुत जरूरी है. साथ ही किसानों को दी जाने वाली सहायता को भी सही तरीके से लक्षित करना होगा. अगर कीमतों में संतुलन होगा, तो किसान जरूरत के मुताबिक उर्वरकों का इस्तेमाल करेंगे और मिट्टी की सेहत सुधर सकेगी.
रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि हर क्षेत्र और हर फसल के हिसाब से अलग-अलग उर्वरक समाधान तैयार किए जाएं. इसके लिए मिट्टी की जांच, वैज्ञानिक शोध और फसल की जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी होगा.
खेती से जुड़ा है देश की सेहत का सवाल
नीति पत्र में साफ कहा गया है कि जब तक मिट्टी को पूरा पोषण नहीं मिलेगा, तब तक वह ऐसी फसल नहीं दे पाएगी जो लोगों को स्वस्थ रख सके. इसलिए मिट्टी की सेहत सिर्फ खेती का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश की सार्वजनिक सेहत से जुड़ा सवाल है.