Tip Of The Day: सूखे इलाकों वाले किसानों के लिए सोने से कम नहीं ये फसलें, कम पानी में देती है बंपर आमदनी!

Drought Resilient Crops: सूखे इलाकों में खेती अब किसानों के लिए आसान और फायदेमंद हो सकती है. कम पानी में उगने वाले कुछ खास अनाज न सिर्फ किसान की आमदनी बढ़ा सकते हैं, बल्कि सेहत और पोषण में भी बड़ा बदलाव ला रहे हैं. ऐसे में जानिए कौन से अनाज दे रहे हैं चौंकाने वाले फायदे और कैसे ये साधारण फसलों से बेहतर साबित हो रहे हैं.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 26 Feb, 2026 | 11:08 AM

Millets Farming: किसानों के लिए सूखे और कम बारिश वाले इलाकों में खेती करना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है. ऐसे इलाकों में पानी की कमी और बढ़ती लागत किसानों के लिए बड़ी समस्या बन जाती है. कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार बताते हैं कि इस स्थिति में मोटे अनाज (Millets) जैसे मडुआ, रागी, बाजरा, ज्वार, सावां, कोदो, कुटकी और चीना बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं. ये धान और गेहूं की तुलना में लगभग 20% कम पानी और कम लागत में उगाए जा सकते हैं.

कम पानी में उगाई जाने वाली फसलें

विशेष रूप से सूखे इलाकों में, जैसे दक्षिण बिहार का गया क्षेत्र, इन अनाजों की खेती ज्यादा लाभदायक होती है. मोटे अनाज न केवल कम पानी में उगते हैं बल्कि पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं. यह खेती किसानों के लिए आर्थिक रूप से भी फायदेमंद साबित होती है.

मडुआ: स्वास्थ्य और पशु दोनों के लिए

डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार मडुआ का उपयोग कई रूपों में किया जाता है. इसे मुर्गी और अन्य पशुओं के लिए हरा चारा, सुखा चारा और साइलेज के रूप में खिलाया जा सकता है. इंसानों के लिए यह रोटी और चावल के रूप में उपयोगी है.

इसके अलावा केक, पुडिंग और मिठाइयों में भी मडुआ इस्तेमाल होता है. इसके साथ ही सेहत के लिहाजा मडुआ कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने में, हड्डियों को मजबूत बनाने में और मधुमेह रोगियों के लिए उत्तम आहार माना जाता है.

सावां और बाजरा: पौष्टिक और बहुपयोगी

सावां भी मडुआ की तरह पोषक और औषधीय गुणों से भरपूर है. इसे चावल और पशु चारे दोनों के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

बाजरा का महत्व केवल चारे में ही नहीं, बल्कि आटे के रूप में रोटी बनाने में भी है. इसमें लौह और कॉपर की अच्छी मात्रा होती है, जो रक्त संचरण और एनीमिया से लड़ने में सहायक है. बाजरा के दाने प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होते हैं और यह सूखे क्षेत्रों के लिए आदर्श फसल है.

कोदो और चीना: मधुमेह रोगियों के लिए वरदान

कोदो और चीना दोनों पोषक तत्वों और रेशा से भरपूर हैं. इनका उपयोग चावल, केक, पुडिंग और मिठाइयों में किया जाता है. कोदो में प्रोटीन 8.5%, कार्बोहाइड्रेट 65%, वसा 1.5% और खनिज लवण 3% पाए जाते हैं.

चीना में प्रोटीन 12%, कार्बोहाइड्रेट 68%, वसा 1.1% और कैल्शियम व लोहा प्रचुर मात्रा में होते हैं. ये दोनों अनाज मधुमेह रोगियों के लिए भी उत्तम आहार हैं.

कांगनी: पोषण और पशु चारा में उपयोगी

कांगनी भी सूखे क्षेत्रों के लिए आदर्श है. इसका उपयोग चावल बनाने के अलावा मुर्गी और पशु चारे में भी किया जा सकता है. इसके दानों में प्रोटीन 12.5%, कार्बोहाइड्रेट 60%, वसा 4.5% और खनिज लवण 3% पाया जाता है. यह फसल भी मधुमेह रोगियों के लिए सुरक्षित और पोषक तत्वों से भरपूर है.

सूखे इलाकों में खेती करने वाले किसानों के लिए मोटे अनाज एक सस्ता, पौष्टिक और लाभदायक विकल्प हैं. ये कम पानी में उगते हैं, पशु और मानव दोनों के लिए उपयोगी हैं, और स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करते हैं.

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