महाराष्ट्र में बंद पड़ी सहकारी चीनी मिलों को राहत, निजी निवेश से फिर शुरू होंगे प्रोजेक्ट

महाराष्ट्र सरकार ने सहकारी चीनी मिलों में निजी निवेश को अनुमति देते हुए BOT और BOOT मॉडल को मंजूरी दी है. इस मॉडल के तहत निजी कंपनियां प्रोजेक्ट में निवेश करेंगी, उसे तैयार करेंगी और कुछ वर्षों तक उसका संचालन भी करेंगी. इसके बाद तय समय पूरा होने पर यह प्रोजेक्ट फिर से संबंधित चीनी मिल को सौंप दिया जाएगा.

नई दिल्ली | Published: 5 Mar, 2026 | 09:52 AM

Sugar mills policy: महाराष्ट्र देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में से एक है और यहां की सहकारी चीनी मिलें लंबे समय से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कई सहकारी चीनी मिलें आर्थिक संकट से जूझ रही हैं. बढ़ते कर्ज, कम उत्पादन और वित्तीय समस्याओं के कारण कई मिलों की हालत खराब हो गई है.

अब राज्य सरकार ने इन मिलों को दोबारा खड़ा करने के लिए एक नई नीति लागू की है. इस नीति के तहत निजी निवेशकों की मदद से गन्ने से बनने वाले उप-उत्पादों के प्रोजेक्ट शुरू किए जाएंगे. सरकार को उम्मीद है कि इससे बिना नया कर्ज लिए मिलों की आय बढ़ेगी और बंद या घाटे में चल रही मिलों को राहत मिलेगी.

BOT और BOOT मॉडल से लगाए जाएंगे नए प्रोजेक्ट

बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार ने सहकारी चीनी मिलों में निजी निवेश को अनुमति देते हुए BOT (Build-Operate-Transfer) और BOOT (Build-Own-Operate-Transfer) मॉडल को मंजूरी दी है. इस मॉडल के तहत निजी कंपनियां प्रोजेक्ट में निवेश करेंगी, उसे तैयार करेंगी और कुछ वर्षों तक उसका संचालन भी करेंगी. इसके बाद तय समय पूरा होने पर यह प्रोजेक्ट फिर से संबंधित चीनी मिल को सौंप दिया जाएगा. सरकार के आदेश के अनुसार यह अवधि आमतौर पर 5 से 10 साल तक हो सकती है और अधिकतम 15 साल तक बढ़ाई जा सकती है.

गन्ने के उप-उत्पादों से बनेगा नया कारोबार

नई नीति के तहत चीनी मिलों में गन्ने से निकलने वाले उप-उत्पादों का उपयोग कर कई प्रकार के उद्योग लगाए जा सकते हैं. इनमें बगास, मोलासेस (शीरा) और प्रेसमड जैसे उत्पाद शामिल हैं.

इन उप-उत्पादों से कई तरह के प्रोजेक्ट लगाए जा सकते हैं, जैसे को-जनरेशन पावर प्लांट, डिस्टिलरी, एथेनॉल यूनिट, बायोगैस प्लांट, कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) परियोजनाएं, हाइड्रोजन उत्पादन, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) इकाइयां, कार्बन डाइऑक्साइड रिकवरी प्लांट, बायोप्लास्टिक और ऑर्गेनिक केमिकल उद्योग. सरकार का मानना है कि इन प्रोजेक्ट्स से चीनी मिलों को अतिरिक्त आय के नए स्रोत मिलेंगे और उनका आर्थिक संतुलन बेहतर होगा.

सहकारिता विभाग ने जारी किया आदेश

महाराष्ट्र के सहकारिता, विपणन और वस्त्र विभाग ने 26 फरवरी को इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी किया है. इसमें निजी निवेश के जरिए विकसित होने वाले प्रोजेक्ट्स के लिए पात्रता, मंजूरी प्रक्रिया और सुरक्षा उपायों का पूरा विवरण दिया गया है. इस नीति का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि चीनी मिलों पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ न पड़े और निजी निवेश के जरिए विकास किया जा सके.

किन मिलों को मिलेगा इस योजना का लाभ

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि किन सहकारी चीनी मिलों को वित्तीय रूप से संकटग्रस्त माना जाएगा. अगर किसी मिल को लगातार तीन साल तक नुकसान हुआ है, उसकी नेट वर्थ नकारात्मक हो गई है, कर्ज लेने की क्षमता खत्म हो गई है या फिर तीन साल तक उसका ऑडिट ग्रेड C या D रहा है, तो उसे संकटग्रस्त मिल माना जाएगा.

इसके अलावा अगर किसी मिल की उत्पादन क्षमता का उपयोग लगातार तीन सीजन तक 50 प्रतिशत से कम रहा है या सरकार का बकाया है, तब भी वह इस योजना के तहत पात्र होगी. हालांकि आर्थिक रूप से मजबूत मिलें भी चाहें तो इसी ढांचे के तहत निजी निवेश लेकर प्रोजेक्ट शुरू कर सकती हैं.

प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए जरूरी प्रक्रियाएं

किसी भी प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले संबंधित चीनी मिल के बोर्ड को प्रस्ताव पारित करना होगा. इसके बाद महाराष्ट्र सहकारी समितियां अधिनियम, 1960 की धारा 20(A) के तहत मंजूरी लेनी होगी.

इसके अलावा सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एजेंसी से डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार कराई जाएगी. इस रिपोर्ट में प्रोजेक्ट की लागत, संचालन खर्च, निवेश की वापसी की अवधि और संभावित लाभ का पूरा विवरण शामिल होगा.

अगर प्रोजेक्ट की लागत 5 करोड़ रुपये तक है तो इसकी मंजूरी चीनी आयुक्त दे सकते हैं, लेकिन इससे अधिक लागत वाले प्रोजेक्ट को राज्य सरकार से मंजूरी लेनी होगी.

पारदर्शी प्रक्रिया से होगा निवेशकों का चयन

निजी निवेशकों का चयन पूरी तरह पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा. इसके लिए ई-टेंडरिंग प्रणाली अपनाई जाएगी. चयनित कंपनी को एक साल के लीज किराए के बराबर ब्याज मुक्त सुरक्षा जमा देना होगा. मिल की जमीन का किराया सरकार द्वारा तय रेडी रेकनर रेट या अधिकृत वैल्यूअर द्वारा निर्धारित मूल्य के आधार पर तय किया जाएगा.

जिम्मेदारियां और नियम भी तय

नई नीति में यह भी तय किया गया है कि प्रोजेक्ट से जुड़े सभी कानूनी और प्रशासनिक कामों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से निजी डेवलपर की होगी. पर्यावरण मंजूरी, बीमा, श्रम कानूनों का पालन, कर्मचारियों के वेतन और करों से जुड़ी सभी जिम्मेदारियां डेवलपर की होंगी.

जब प्रोजेक्ट का संचालन काल पूरा हो जाएगा और उसे चीनी मिल को वापस सौंपा जाएगा, तब यह सुनिश्चित करना होगा कि उस पर कोई बैंक कर्ज, बकाया वेतन या सरकारी देनदारी न हो.

विवाद होने पर समाधान की व्यवस्था

अगर प्रोजेक्ट के दौरान किसी तरह का विवाद होता है तो पहले आपसी बातचीत और मध्यस्थता के जरिए समाधान की कोशिश की जाएगी. जरूरत पड़ने पर आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) और अदालत का सहारा भी लिया जा सकता है.

यदि कोई डेवलपर प्रोजेक्ट बीच में छोड़ देता है या अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसकी सुरक्षा राशि जब्त की जा सकती है और उसे ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा

सरकार का मानना है कि इस नीति से सहकारी चीनी मिलों को नई ऊर्जा मिलेगी. इससे मिलों की आय बढ़ेगी, किसानों को गन्ने का भुगतान समय पर मिल सकेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.

इसके साथ ही निजी निवेश और नई तकनीक के जरिए जैव ऊर्जा और वैल्यू-एडेड उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा. विशेषज्ञों के मुताबिक यह कदम महाराष्ट्र के चीनी उद्योग को फिर से मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है.

Topics: