1.5 करोड़ का LPG घोटाला! फूड अफसर और डीलरों ने मिलकर उड़ाई गैस, वजन जांच में खुला राज

छत्तीसगढ़ के महासमुंद में एलपीजी (LPG) गैस चोरी और ब्लैक मार्केटिंग का बड़ा मामला सामने आया है. पुलिस जांच में करोड़ों रुपये की गैस गायब होने का खुलासा हुआ है. GPS डेटा, वजन जांच और रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिलने के बाद कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया. मामले में गैस एजेंसियों और अधिकारियों की भूमिका जांच के घेरे में है.

Saurabh Sharma
नोएडा | Published: 12 May, 2026 | 07:30 PM

LPG Scam: छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में एलपीजी गैस चोरी और ब्लैक मार्केटिंग का बड़ा मामला सामने आया है. मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस जांच के मुताबिक 6 एलपीजी टैंकरों से करीब 90 मीट्रिक टन गैस निकालकर काले बाजार में बेची गई. इस गैस की कीमत करीब 1.5 करोड़ रुपये बताई जा रही है. मामले में फूड विभाग के अधिकारीयों और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के मालिक का नाम सामने आया है. पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. जांच में GPS डेटा, खरीद-बिक्री रिकॉर्ड और वजन जांच ने पूरे रैकेट की पोल खोल दी.

जंगल में खड़े टैंकरों से शुरू हुआ शक

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ये पूरा मामला दिसंबर 2025 में सामने आया था, जब महासमुंद के सिंगोरा इलाके के जंगल में 6 संदिग्ध एलपीजी टैंकर खड़े  मिले थे. पुलिस को शक हुआ कि इन टैंकरों का इस्तेमाल गैस चोरी के लिए किया जा रहा है. इसके बाद सभी टैंकर जब्त कर लिए गए और मामला दर्ज किया गया. कई महीनों तक टैंकर पुलिस कस्टडी में रहे. बाद में मार्च 2026 में गर्मी बढ़ने और सुरक्षा कारणों का हवाला देकर पुलिस ने जिला प्रशासन से टैंकरों को फूड विभाग को सौंपने की अनुमति मांगी. आरोप है कि बिना सही वजन जांच किए ही टैंकर रायपुर की एक गैस वितरण कंपनी के हवाले कर दिए गए. यहीं से पूरे घोटाले का सबसे बड़ा सुराग मिला और जांच आगे बढ़ी.

मार्च-अप्रैल में निकाली गई करोड़ों की गैस

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार , पुलिस जांच में सामने आया कि 30 मार्च से 5 अप्रैल 2026 के बीच टैंकरों से बड़ी मात्रा में एलपीजी गैस निकाली गई. इसके बाद 6 और 8 अप्रैल को टैंकरों को दोबारा वजन जांच के लिए महासमुंद फूड ऑफिसर कार्यालय लाया गया. जब मूल ट्रांसपोर्टर टैंकर लेने पहुंचे तो गैस की भारी कमी सामने आई. इसके बाद शिकायत दर्ज कराई गई और पुलिस ने तकनीकी  जांच शुरू की. जांच में पता चला कि करीब 90 मीट्रिक टन गैस गायब थी, जिसकी बाजार कीमत लगभग 1.5 करोड़ रुपये थी. पुलिस का कहना है कि गैस को योजनाबद्ध तरीके से निकालकर अलग-अलग एजेंसियों को बेचा गया.

GPS और रिकॉर्ड से खुली बड़ी साजिश

पुलिस ने जांच में टैंकरों के GPS डेटा और एजेंसियों के रिकॉर्ड की जांच की. GPS से पता चला कि सभी टैंकर आरोपी कंपनी के प्लांट परिसर में ले जाए गए थे. वहीं बिक्री और खरीद रिकॉर्ड में भी बड़ा अंतर मिला. पुलिस के मुताबिक अप्रैल महीने में एजेंसी ने केवल 47 टन गैस खरीदी दिखाई, जबकि रिकॉर्ड में 107 टन गैस बेचने की जानकारी मिली. यही अंतर पुलिस के लिए सबसे बड़ा सबूत बना. जांच एजेंसियों का कहना है कि चोरी की गैस को छोटे डिस्ट्रीब्यूटरों और एजेंसियों तक पहुंचाया गया. पुलिस अब रायपुर की कम से कम 8 गैस एजेंसियों की जांच कर रही है, जिन पर चोरी की गैस खरीदने का शक है.

फूड अफसर समेत कई आरोपी गिरफ्तार

मामले में फूड विभाग अधिकारीयों और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के मालिक को आरोपी बनाया गया है. पुलिस ने सबको को गिरफ्तार कर लिया है. वहीं अन्य संदिग्धों से पूछताछ जारी है. आरोपियों ने शुरुआत में दावा किया था कि गैस लीकेज के कारण कम हुई है, लेकिन पुलिस की तकनीकी टीम और विशेषज्ञों ने इस दावे को गलत बताया. जांच में किसी तरह के लीकेज के सबूत नहीं मिले.मीडिया रिपोर्ट के अनुसार,  महासमुंद एसपी प्रभात कुमार ने कहा कि यह संगठित गैस चोरी और ब्लैक मार्केटिंग का मामला है. पुलिस पूरे नेटवर्क की जांच कर रही है और आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं. फिलहाल पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि इस रैकेट का नेटवर्क दूसरे जिलों तक फैला हुआ था या नहीं. मामले ने प्रशासन और गैस वितरण व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

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Published: 12 May, 2026 | 07:30 PM
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