बुंदेलखंड में महुआ के लाटा और लड्डू का स्वाद सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा हैं और यह ग्रामीण परिवेश से अपनी खास पहचान के साथ आवभगत का प्रमुख देसी मिठाई भी है. लेकिन, इस सदियों पुरानी स्वाद परंपरा का अंत नजदीक है, क्योंकि बुंदेलखंड में महुआ के पेड़ विलुप्त होने की कगार पर हैं. जो पेड़ बचे भी हैं वह 10 साल के अंतराल में फूलते और फलते हैं. ऐसे में महुआ के संरक्षण के साथ ही जल्दी फूल-फल देने वाली नई प्रजातियों के विकास की मांग तेज हो गई है. इसे स्थानीय ग्रामीणों के साथ ही रानी झांसी केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के एक्सपर्ट भी मानते हैं और इस दिशा में पहल शुरू की गई है, जो उम्मीद बंधाती है कि महुआ के पेड़ों को विलुप्त होने से बचा लिया जाएगा. हालांकि, यह शुरुआत आसान नहीं होने वाली है.
रानी झांसी केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक शिक्षा प्रोफेसर अनिल कुमार ने बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों के संकलन ‘बुंदेली कलेवा समुंदी’ में महुआ से बने उत्पाद समेत अन्य पारंपरिक उत्पादों का जिक्र किया है. इसके साथ ही उन्होंने महुआ को लेकर चिंता जताई है. बुंदेलखंड क्षेत्र में एक वक्त था जब महुआ प्रचुर मात्रा में पाया जाता था लेकिन इनके पेड़ धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं. बुंदेलखंड के जंगलों में मार्च-अप्रैल महीने में महुआ के फूल हल्के पीले रंग में पूरे वातावरण महकाते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी गुणवत्तायुक्त प्रजातियों के विकास की जरूरत है, जो 4–6 वर्षों में उत्पादन देना शुरू करें, जबकि पारंपरिक पेड़ 10–15 वर्षों में फूल देते हैं. महुआ के मीठे फूलों की प्रजाति जो कम समय में उत्पादन देना शुरू कर दे. साथ ही इनके फूलों, फलों, बीजों, छाल एवं पत्तों का मूल्य संवर्धन कर वैज्ञानिक ढंग से बनाये गये स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों का की मार्केटिंग करने की जरूरत है. रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक महुआ की जैव विविधता के मूल्यांकन, उन्नत प्रजातियों के विकास और गुणवत्ता निर्धारण पर कार्य कर रहे हैं
जन्म से मरण तक परंपरागत व्यवस्था का हिस्सा है महुआ वृक्ष
मध्य भारत विशेषकर बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदायों में महुआ को ‘दैवीय वृक्ष’ और बहुत पवित्र माना जाता है. इस वृक्ष के लगभग सभी भाग मनुष्य के लिये उपयोगी होते हैं एवं औषधीय गुणों के साथ अन्य व्यवसायिक उत्पादों जैसे बीज एवं पत्तों से उर्वरक के साथ हरे पत्तों को पर्यावरणीय दृष्टि से अनुकूल ग्रीन प्लेट बनाने एवं टसर सिल्क का रेशा बनाने वाले कीटों एवं पशुओं को खिलाने, बीजों से निर्मित तेल, खाद्य तेल, ईंधन एवं साबुन बनाने आदि में इस्तेमाल में लाया जाता है. इसके फूलों से पारंपरिक व्यंजन, औषधीय उपयोग और पेय पदार्थ बनाए जाते हैं. महुआ में प्रचुर मात्रा में विटामिन-सी, आयरन, कैल्शियम, फास्फोरस, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट पाए जाते हैं, जो एनीमिया और कुपोषण दूर करने में सहायक माने जाते हैं. फूलों से बने पारंपरिक व्यंजनों का सेवन एनीमिया और कुपोषण को दूर करने में सहायक है. इसीलिये महुआ बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़ के सुदूर आदिवासी जनजाति संस्कृति में ‘‘दैवीय वृक्ष‘‘ और आजीविका, पोषण, स्वास्थ्य, चिकित्सा सहित जीवन से मृत्यु तक एक परम्परागत व्यवस्था का अंग है.
व्यंजन और औषधीय गुणों से भरपूर महुआ
महुआ का फूल व्यंजन सामग्री और औषधीय वनस्पति के रूप में घरेलू नुस्खों में भी इस्तेमाल होता है. इसके साथ महुआ के फूलों के साथ गुड़ मिलाकर फर्मेंटेशन विधि से देशी मदिरा जो आदिवासी जनजातियों की संस्कृति का भाग है. इसके फूलों में मनुष्य और पशु जाति में स्तनपान करने वाली माताओं को ज्यादा दूध उत्पन्न करने में सहायक गेलक्टोगोग का गुण पाया जाता है. महुआ के फूल खाने से अल्सर के अलावा ब्राकांइटिस (दमा, सांस), बुखार इसकी छाल के रस से त्वचा रोग, डायबिटीज, हाईब्लड प्रेशर, महुआ के तेल की मालिश करने से, आर्थोराइटिस, गठिया एवं इसके फूलों के सेवन से महिलाओं में एनीमिया, इसकी छाल से आँखों में जलन, दांत दर्द, मिर्गी आदि रोग को दूर करने के गुणों से लैस है.
महुआ के पारंपरिक व्यंजनों में मीठीपूड़ी, गुलगुला (गुड़, गेहुं, मक्का का आटा और गुली तेल से निर्मित) महुआ की घुघरी (दही, चना, गुड़ से निर्मित), महुआ की चाय (सोंठ, पत्ते, तुलसी, इलायची, गुड़ चायपत्ती के साथ), महुआ का लाटा (महुआ, गुड़ केक), महुआ अलसी के लड्डू आदि में बलवर्धक, वीर्यवर्धक और एनीमिया नाशक गुणों के साथ पौष्टिकता से महिला-पुरुष दोनों ही शारीरिक रूप से सशक्त होते हैं.
किसान उत्पादक संघ ने महुआ उत्पादों की मार्केटिंग की बीड़ा उठाया
इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों को नई पीढ़ी एक वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने के लिए झांसी की तहसील, गरौठा के सुदूर गांवों सिमरधा, पुरा गांवों के किसानों की ओर से स्थापित ऋषि विश्वामित्र कृषक उत्पादक संघ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रहलाद राजपूत ने बीड़ा उठाया है कि कैसे इन स्वादिष्ट एवं स्वास्थ्यवर्धक पारंपरिक व्यंजनों की मार्केटिंग करें और जिला प्रशासन, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के साथ कृषक उत्पादक संघ कार्य करने के लिये तत्पर है. उन्होंने कहा कि गरौठा तहसील के विभिन्न ग्रामों के किसानों के साथ कृषि की उन्नत तकनीकों को विश्वविद्यालय से लेकर कृषि आजीविका एवं आय के साधनों को बढ़ाना ही संघ का उद्दश्यों है. ग्रामों की महिलाओं का विश्वविद्यालय प्रशिक्षण देकर, महुआ के परम्परागत व्यंजनों एवं वैकल्पिक उपयोग के साथ हम आगे बढ़ रहे हैं.
प्रहलाद राजपूत ने कहा कि इस संघ से बुजुर्ग महिलायें कलावती पत्नी दयाशंकर ग्राम सिमरधा और परसोना वती पति रामसेवक ग्राम पुरा तहसील गरौठा और अन्य महिलाओं द्वारा महुआ एवं श्रीअन्न के बने पारंपरिक व्यंजनों का प्रदर्शन रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के किसान मेला में करके सभी अतिथियों ने प्रशंसा हासिल की. इनके प्रयासों का विश्वविद्यालय ने समर्थन किया और सभी के संयुक्त प्रयासों से महुआ के मूल्यवर्धित उत्पादों एवं व्यंजनों की मांग, मार्केटिंग और वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने के लिए टीम वर्क की जरूरत है. इससे इसे सुपर फूड के रूप में पोषक और स्वास्थ्य सुरक्षा में अपनी अनूठी पहचान को बनाये रखें.

रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति एके सिंह (बाएं) और निदेशक शिक्षा अनिल कुमार (दाएं). महुआ के लड्डू (नीचे).
ग्राफ्टिंग के जरिए नई किस्मों के विकास पर काम कर रहा कृषि विश्वविद्यालय
केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापक डॉ. स्वाती सगड़े ने कहा कि महुआ में पाई जाने वाली जैव विविधता का मूल्यांकन और इसकी प्रजातियों के संवर्धन और उच्च गुणवत्ता युक्त प्रजाति के विकास में विश्वविद्यालय कार्य कर रहा है. पारंपरिक खेती के तौर-तरीके में बदलाव किया जा सकता है. चुने गए उत्कृष्ट (एलीट) वृक्षों का कलम (ग्राफ्टिंग) के जरिए इनकी नई किस्मों को विकसित करने की प्रक्रिया चल रही है. इससे महुआ की बड़े पैमाने पर खेती और प्रसार को बढ़ावा मिलता है. सह-प्राध्यापक डॉ. हर्ष हेगड़े ने कहा कि विश्वविद्यालय महुआ के फूलों और बीजों के संग्रह के साथ बीजों को तोड़कर इनकी गिरी निकालने के यंत्रों और अन्य प्रॉसेस्ड सिस्टम पर कार्यरत हैं. महुआ के परम्परागत व्यंजनों के साथ इसके वैकल्पिक उपयोग जैसे- कुकीज, सीरप, इनर्जी बूस्टर और अन्य मूल्यवर्धन उत्पादों पर काम कर रहा है. महुआ के लिए वैल्यू चेन का निर्माण समय की जरूरत है और किसान संघों को तकनीकी पहुंचाई जा सकती है.
विलुप्त होते महुआ के संरक्षण और विकास पर काम कर रहे वैज्ञानिक- कुलपति
रानी झांसी केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अशोक कुमार सिंह ने बताया कि बुंदेलखंड विशिष्ट कृषि उत्पादों में फसल सुधार, मूल्यवर्धन एवं विपणन हेतु केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय की शोध प्राथमिकताओं में प्रमुख है. बुंदेलखंड में महुआ जैसे महत्वपूर्ण एवं विलुप्त हो रहे पेड़ों का पुर्नजीवन का माध्यम केवल राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मांग एवं आपूर्ति से ही किया जा सकता है. इस ओर वैज्ञानिकों का प्रयास जारी है.
रानी झांसी केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक शिक्षा प्रो. अनिल कुमार ने कहा कि महुआ को सुपरफुड के रूप में स्थापित करने के लिये ज्ञान आधारित तकनीकों के जरिए किसानों के समूहों को समृद्ध कर इसकी वैल्यू चेन बनाने की जरूरत है. परम्परागत ज्ञान और वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियों के संयोजन से महुआ के उत्पादों को विश्व पटल पर ले जाने की काफी संभावनाएं हैं.