डिजिटल तकनीक अपनाने से छोटे मछुआरे की बढ़ी कमाई, साथ ही 40 फीसदी तक समय की भी बचत
चेन्नई में एमएस स्वामिनाथन सेंचुरी फिशरीज फेयर में मछुआरों, वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने भाग लिया. डिजिटल तकनीक और FFMA ऐप से मछुआरों की आमदनी बढ़ रही है. सोलर फिश ड्रायिंग और Ornamental Aquaculture जैसी पहलें नई संभावनाएं लाईं. मेले में समुद्री पारिस्थितिकी, चुनौतियां और समुदाय आधारित समाधान चर्चा में रहे.
MS Swaminathan Century Fisheries Fair: मछली पालन के प्रति लोगों की रुचि बढ़ती जा रही है. वहीं, मछली पालकों की कमाई बढ़ाने के लिए सरकार भी पूरी कोशिश कर रही है. साथ ही साथ वैज्ञानिक भी मछली पालन को आसान बनाने के लिए नई-नई तकनीकों का आविष्कार कर रहे हैं. इससे मछली पालको को काफी फायदा हुआ है. खास कर मछली पालकों को जागरूक करने के लिए समय-समय पर सेमिनार भी आयोजित किए जा रहे हैं. इसी कड़ी में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में एमएस स्वामिनाथन सेंचुरी फिशरीज फेयर का आयोजिन किया गया. इस कार्यक्रम में पूरे देश वैज्ञानिक, एक्सपर्ट और सफल मछुआरों ने हिस्सा लिया. इस दौरान मछली पालकों को नई-नई जानकारियां दी गईं.
MSSRF में GIS और रिमोट सेंसिंग के प्रमुख डॉ. आर. नागराजन ने बताया कि डिजिटल तकनीकें छोटे मछुआरों की आमदनी बढ़ा रही हैं. FFMA मोबाइल ऐप मछली पकड़ने के संभावित क्षेत्रों की जानकारी देता है. इससे 40 फीसदी समय बचाता है, ईंधन खर्च घटाता है और करीब तीन लाख मछुआरों को फायदा पहुंचाता है. साथ ही, भविष्यवाणी तकनीक समुद्र के मौसम की जानकारी देती है.
ऐसे इस मेले का उद्देश्य मछली पालन क्षेत्र की चुनौतियों जैसे जलवायु परिवर्तन और आजीविका असुरक्षा पर ध्यान देना है. साथ ही विज्ञान, तकनीक और समुदाय की भागीदारी से समाधान ढूंढना है. कार्यक्रम के पहले दिन MSSRF की चेयरपर्सन डॉ. सौम्या स्वामिनाथन ने कहा कि इसे ‘मेला’ इसलिए कहा गया है ताकि यह सिर्फ वर्कशॉप या सेमिनार न बने, बल्कि संवाद का मंच बने. उन्होंने कहा कि लगभग 40 साल पहले प्रो. एमएस स्वामिनाथन ने पहचाना था कि तटीय समुदाय जलवायु बदलाव के प्रति बहुत संवेदनशील हैं. इसलिए उन्होंने MSSRF से इनकी क्षमता बढ़ाने का काम करने को कहा.
फिशर फ्रेंडली मोबाइल एप्लिकेशन के बारे में जानकारी
चेन्नई में आयोजित एमएस स्वामिनाथन सेंचुरी फिशरीज फेयर के उद्घाटन सत्र में डॉ. सौम्या स्वामिनाथन ने MSSRF के शोध-आधारित और भागीदारी वाले समाधानों पर जोर दिया. उन्होंने फिशर फ्रेंडली मोबाइल एप्लिकेशन (FFMA) और महिला कनेक्ट ऐप का परिचय कराया, जो मछुआरों को लाइव सलाह और आजीविका सेवाएं प्रदान करते हैं. उद्घाटन सत्र में कड्डालोर की मछली विक्रेता मिस कलाईचेल्वी और केरल के मैंग्रोव संरक्षण विशेषज्ञ मुरुकेसन, जिन्हें ‘मैंग्रोव मैन’ के नाम से जाना जाता है, ने अपनी वास्तविक जिंदगी की चुनौतियां साझा कीं.
भारत में करीब 3,250 मछली प्रजातियां पाई जाती हैं
ICAR-NBFGR के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. टीटी अजीत कुमार ने कहा कि भारत में करीब 3,250 मछली प्रजातियां पाई जाती हैं और अरब सागर में नई मछली और केकड़ा प्रजातियां मिली हैं. उन्होंने पिचावरम में शुरू की गई पर्यावरण‑अनुकूल और महिलाओं के अनुकूल सजावटी मत्स्य पालन का भी जिक्र किया. हालांकि, उन्होंने अधिक मछली पकड़ने को गंभीर चुनौती बताया. वहीं, मिस कलाईचेल्वी ने बताया कि मछली की घटती उपलब्धता के कारण मछुआरों को अब छोटी और कम कीमत वाली मछलियों पर निर्भर होना पड़ रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि MSSRF की सोलर फिश ड्रायिंग तकनीक ने सार्वजनिक दृष्टिकोण बदल दिया है, जिससे स्वच्छ और कम नमक वाली सूखी मछली आसानी से सुपरमार्केट तक पहुंच रही है और उनके जैसे महिलाओं के लिए नए बाजार अवसर पैदा हुए हैं.
सर्विस के लिए विज्ञान का सिद्धांत जरूरी है
कार्यक्रम के पहले दिन ‘परिवर्तन की लहरें’ लॉन्च किया गया, जिसमें मछुआरों की सफलता की कहानियां शामिल हैं. साथ ही Fish for All रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर की 16वीं वार्षिक रिपोर्ट जारी की गई और समुदाय के नायक ‘जैव-खुशी के प्रबंधक’ के रूप में सम्मानित किए गए. इस दौरान तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और पुड्डुचेरी की सामुदायिक उद्यमों की प्रदर्शनी का भी उद्घाटन हुआ. INCOIS के ग्रुप डायरेक्टर डॉ. सुधीर जोसेफ ने कहा कि ‘सर्विस के लिए विज्ञान’ का सिद्धांत जरूरी है और वैज्ञानिक शोध में सीधे समुदाय की समझ शामिल होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि संस्थान और तटीय समुदायों का मजबूत सहयोग लचीलापन बढ़ाने में अहम है.