किसानों के बोनस पर नहीं होगा केंद्र का दखल, निर्मला सीतारमण ने कहा- राज्यों का अधिकार बरकरार

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार ने राज्यों को किसानों को दिए जाने वाले बोनस पर पुनर्विचार करने को कहा है. साथ ही केंद्र की ओर से ऐसा पत्र भेजा गया है, जिससे किसानों को मिलने वाली अतिरिक्त सहायता पर असर पड़ सकता है. इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया और किसानों के बीच भी चिंता बढ़ने लगी.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 14 Apr, 2026 | 09:26 AM

Farm bonus statement: देश में कृषि नीति और किसानों को मिलने वाले बोनस को लेकर हाल ही में एक राजनीतिक बहस तेज हो गई थी. इस बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार राज्यों से किसानों को दिए जाने वाले बोनस का अधिकार नहीं छीन रही है. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर जो भी भ्रम फैलाया जा रहा है, वह पूरी तरह गलत और भ्रामक है.

क्या है पूरा मामला

दरअसल, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार ने राज्यों को किसानों को दिए जाने वाले अतिरिक्त प्रोत्साहन (बोनस) पर पुनर्विचार करने को कहा है. उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र की ओर से ऐसा पत्र भेजा गया है, जिससे किसानों को मिलने वाली अतिरिक्त सहायता पर असर पड़ सकता है. इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया और किसानों के बीच भी चिंता बढ़ने लगी.

वित्त मंत्री ने किया साफ इनकार

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ शब्दों में कहा कि केंद्र सरकार ने राज्यों की शक्तियों में कोई दखल नहीं दिया है. उन्होंने कहा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के ऊपर बोनस देना राज्यों का अधिकार है और यह अधिकार पहले भी था और आगे भी बना रहेगा. उन्होंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के आरोपों को “तथ्यों से परे और राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताया.

केंद्र का पत्र क्या कहता है

विवाद जिस पत्र को लेकर हुआ, वह दरअसल वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग द्वारा राज्यों को भेजा गया एक सलाहकारी पत्र था. इस पत्र में राज्यों से कहा गया था कि वे अपनी बोनस नीति को देश की प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाएं. खास तौर पर दलहन, तिलहन और मोटे अनाज (मिलेट्स) की खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया था. सरकार ने साफ किया कि यह कोई आदेश नहीं था, बल्कि सिर्फ एक सलाह थी, जिसे मानना या न मानना राज्यों पर निर्भर है.

क्यों दिया गया यह सुझाव

केंद्र सरकार का मानना है कि देश में अभी भी कई जरूरी फसलों जैसे दलहन और तिलहन की घरेलू उत्पादन क्षमता पर्याप्त नहीं है. इन फसलों की कमी के कारण भारत को बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है. ऐसे में सरकार चाहती है कि किसान ज्यादा से ज्यादा इन फसलों की खेती करें, ताकि देश आत्मनिर्भर बन सके और किसानों को भी बेहतर दाम मिल सकें.

फसल विविधीकरण पर जोर

सरकार लंबे समय से फसल विविधीकरण यानी एक ही फसल पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रही है. इसके तहत MSP में भी दलहन और तिलहन फसलों के लिए बेहतर बढ़ोतरी की गई है, ताकि किसान इनकी खेती की ओर आकर्षित हों.

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत में खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता 2015-16 में 63.2 प्रतिशत थी, जो घटकर 2023-24 में 56.25 प्रतिशत रह गई है. इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों में तिलहन उत्पादन क्षेत्र में 18 प्रतिशत की वृद्धि, उत्पादन में करीब 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी और उत्पादकता में लगभग 31 प्रतिशत का इजाफा हुआ है.

किसानों को कैसे होगा फायदा

सरकार का कहना है कि अगर किसान दलहन, तिलहन और अन्य जरूरी फसलों की खेती बढ़ाते हैं, तो उन्हें बेहतर बाजार मिलेगा और उनकी आय में भी वृद्धि होगी. इसके लिए सरकार केवल MSP ही नहीं, बल्कि बेहतर बीज, अनुसंधान, प्रोसेसिंग सुविधाएं और बाजार तक पहुंच जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध करा रही है. इससे किसानों को लंबे समय में स्थिर और बेहतर आय मिल सकेगी.

राज्यों की भूमिका बनी रहेगी अहम

केंद्र ने यह भी साफ किया है कि कृषि राज्य का विषय है और राज्यों की भूमिका इसमें बेहद महत्वपूर्ण है. राज्य अपनी परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार किसानों को बोनस और अन्य सहायता दे सकते हैं. केंद्र केवल दिशा दिखाने और सहयोग करने की भूमिका निभा रहा है.

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