पोषण से भरपूर बुंदेली व्यंजनों का स्वाद दुनिया तक पहुंचाने की जरूरत, नए फूड स्टार्टअप्स के लिए अपार संभावनाएं

झांसी स्थित केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार ने कहा कि बुंदेली व्यंजनों की पोषकता के साथ ही उनके स्वाद को दुनिया के पटल पर ले जाने की जरूरत है. यहां के पारंपरिक व्यंजनों में कई तरह के रोगों की रोकथाम करने की क्षमता भी है. उन्होंने कहा कि फूड बेस्ड स्टार्टअप्स के लिए संभावनाएं मजबूत हैं.

नोएडा | Updated On: 18 Mar, 2026 | 03:54 PM

भारत विविधताओं से भरा देश है और खानपान, बोली, संस्कृति में विविधताएं भरी पड़ी हैं. बुंदेली व्यंजन बेहद लोकप्रिय है और इसकी ऐतिहासिक जड़ें बुंदेलखंड में समाहित हैं. यहां के पारंपरिक व्यंजन पोषण से भरपूर होने के चलते इन्हें कई तरह की बीमारियों को रोकने में कारगर माना जाता है. ऐसे व्यंजन स्थानीय कृषि उत्पादों और औषधीय मसालों से बनाए जाते हैं. बुंदेलखंड क्षेत्र में उगाई जाने वाली कई दलहन, अनाज, मोटे अनाज, तिलहन और कंद आदि फसलें और जड़ी-बूटियां जो कई लाभकारी पोषक तत्वों एवं औषधीय गुणों से भरपूर हैं. इनका इस्तेमाल खूब बुंदेली व्यंजनों को बनाने में किया जा रहा है. यहां के व्यंजनों का स्वाद दुनिया की जुबान पर ले जाने की जरूरत है और इसीलिए यहां के व्यंजनों पर फूड बेस्ड स्टार्टअप्स के लिए भरपूर संभावनाएं मौजूद हैं.

बुंदेली पोषण से भरपूर व्यंजनों के संकलन ‘बुंदेली कलेवा – समुंदी’ तैयार करने वाले झांसी स्थित रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और निदेशक (शिक्षा) डॉ. अनिल कुमार ने कहा कि स्वस्थ भोजन का सेवन व्यक्ति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं और समग्र स्वास्थ्य और जीवन शैली के लिए आवश्यक हैं. इसमें ‘आहार‘ और ‘अन्न‘ पर विशेष जोर दिया गया है. पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण भोजन व्यक्ति के मन, आत्मा और शरीर को पोषण करता है. इस प्रकार बुंदेली व्यंजनों में ‘‘अन्न है पूर्ण ब्रह्म‘‘ का दर्शन है. पोषण के दावे स्वास्थ्य लाभ या परिणाम के संबंध को बताए बिना केवल पोषक तत्वों की जानकारी को व्यक्त करते हैं, हालांकि बुन्देली व्यंजनों में उपभोक्ताओं को उत्पाद-विशिष्ट के स्वास्थ्य लाभों के बारे में संदेश देकर संभावित उत्पादों के प्रति रूचि को प्रदर्शित करने एवं उनके मूल्यवर्धन में सहायक होते हैं.

पोषक तत्वों और औषधीयों से बनने वाला ‘न्यूट्री-आयूर‘ कई रोगों की रोकथाम में मददगार

शहरीकरण के चलते व्यक्ति के आहार पैटर्न और जीवन शैली में बहुत बदलाव हुआ है. इससे पूरा स्वास्थ्य सिस्टम प्रभावित हुआ है. क्या हम सभी कोविड-19 महामारी के बाद और उससे आगे भी एक स्वस्थ जीवन शैली बनाए रखना चाहते हैं, तो अपने दैनिक आहार में पौधे-आधारित पोषक तत्वों और औषधीय पौधों से बने बुंदेली व्यंजनों को शामिल करना होगा. पोषण और औषधीय का सम्मिलन ‘न्यूट्री-आयूर‘ के रूप में जाना जाता है. जो नवोन्वेषी एवं क्रियाशील खाद्य पदार्थों को तैयार करता है. इसका उपयोग विभिन्न रोगों जैसे मधुमेह, मोटापा, उच्च रक्तचाप, कैंसर, हृदय और जीवन शैली की बीमारियों की शुरूआत को रोकन और कम करने एवं शारीरिक सुधार के लिए किया जा सकता है.

बुंदेली फूड बेस्ड स्टार्टअप के लिए असीम संभावनाएं

इसी प्रकार बुंदेली व्यंजनों के पकाने की विधियों पर आधारित खाद्य पदार्थों से कई प्रकार के न्यूट्रास्यूटिकल्स के अलावा मूल्य वर्धित उत्पादों, स्वास्थ्य खाद्य पदार्थों के विकास से कृषि उद्यमिता को बढ़ावा देने और नए खाद्य आधारित स्टार्टअप के निर्माण की असीम संभावनाएं हैं. यह लोक-स्वास्थ्य के संवर्धन के लिए वैज्ञानिक और चिकित्सीय ढंग एवं युक्तिकरण से न्यूट्री-अयुर नवाचारों के आधार पर खाद्य उद्यमों के विकास के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करेगा. स्वस्थ भोजन को बढ़ावा देने में खाद्य उद्यमों की बहुत बड़ी भूमिका है जो उपभोक्ताओं के लिए भोजन खरीदते समय चुनने के लिए बेहतर स्वास्थ्यप्रद विकल्प प्रदान करते हैं. बुंदेली व्यंजन जो पोषक तत्वों से भरपूर हैं यह अंतराष्ट्रीय बाजार में अपनी अनूठी पहचान बना सकते हैं.

शेफ और खाद्य उद्यमियों के साथ पोषक विज्ञानियों को आगे आना होगा

बुंदेली लोक संस्कृति के अलावा आजकल बुंदेली व्यंजन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के लोकल फॉर वोकल और ग्लोबल नीति के तहत वैश्विक परिदृश्य में अपनी खुशबू बिखेरने की अहमियत रखते हैं. बुन्देली कला, संस्कृति, खानपान, साहित्य, विशिष्ट कृषि के लिये अतुलनीय प्रयास इस धरा को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने में सक्षम होंगे. हमने बुन्देली खानपान की कॉन्टीनेंटल फूड चेन को पेश किया, जिसको जनमानस में अत्यधिक पसंद किया जा रहा है. ऐसे स्वादिष्ट और रूचिकर बुंदेली व्यंजनों की पहचान स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए पांच सितारा होटल के शेफ और खाद्य उद्यमियों के साथ पोषक विज्ञानी को आगे आना होगा.

पोषण से भरपूर प्रसिद्ध बुंदेली व्यंजन

बुंदेली व्यंजनों में प्रसिद्ध जैसे बिर्रा रोटी, दरिया, महेरा खुरचन, विरचन, गूंजा, पपड़िया, बरा, गुना, राजगिरा का हलवा, भर्ता गक्कड़, लचका, दुबरी सहित लुप्त हो चुके व्यंजन शामिल हैं. इसी तरह कई तरह की प्रसिद्ध बुंदेली मिठाइयां जिसमें गुड़ के खुरमा, पिठी के लड्डू, मालपुआ, कुरकुरी जलेबी, उड़द दाल अंगूर दाना, इमरती साकपूरी, दूधफरा के साथ अन्य मिठाइयां एवं पकवान लोगों में आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं. अन्य बुंदेली व्यंजनों में माड़े, लपसी, थोपा, आंवरिया, हिंगोरा, दुबरी, लटा, भुरका, मुसैला, गकरिया और भाजी का भुर्रा ऐसे नाम जो अन्यत्र दुर्लभ हैं. महुआ और बेर बुंदेलखंड की गरीब बहुसंख्यक जनता का प्रिय भोजन है. कच्चा और पक्का दोनों प्रकार का भोजन यहां के विवाह समारोह में परोसा जाता है. प्रमुख त्योहारों में बनने वाले भोजन में दाल (चना की) कढ़ी, भात, बरी, बरा, मगौरा, पापड़, कचरिया, गोरस फुलका और माड़े भी चलते हैं.

बुंदेलखंड के भोजन में मोटे अनाजों का खूब इस्तेमाल

बुंदेलखंड के भोजन में मोटे अनाजों का भी बहुत ज्यादा प्रयोग होता है. बुंदेलखंड के भोजन में जैन व्यंजनों की भी छाप है. अब तो लगभग ऐसे बेजोड़ स्वाद के व्यंजनों को लोग भूलते जा रहे हैं. सुबह के नाश्ते का कलेवा एवं रात्रि भोजन को ब्यारी कहते हैं. अब आवश्यकता इस बात की है इन बुंदेली व्यंजनों में नवीनता और आधुनिक साज-सज्जा के साथ बाजार में उतारा जाए तो इसके माध्यम से नए स्टार्टअप्स लगने की अपार संभावनाएं हैं. हमें अपनी जड़ों में लौटकर यहां की स्वादिष्ट एवं स्वास्थ्य से भरपूर बुंदेली व्यंजनों को पुनर्जीवन देना है.

बुंदेलखंड पिछड़ा हुआ क्षेत्र है और गरीबी के साथ ही रोजगार की समस्याएं चरम सीमा पर हैं. इसलिए गांव के किसानों, युवाओं एवं महिलाओं को संगठित कर किसान उत्पादक संघ (एफपीओ), स्वयं सहायता समूह को गठित कर बुंदेलखंड के खाद्य पदार्थों, दूध-दही घी-तेल, सब्जियां, फल-फूल की आपूर्ति गांव से शहर तक की जा सकती है. इसके जरिए छोटे-छोटे कुटीर उद्योग लगाकर ग्रामीण उत्थान और रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं. रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय झांसी भी किसानों के साथ, उपभोक्ता एवं खाद्य स्टार्टअप्स के गठन में अपनी सेवाएं देने के लिए तैयार है. आज जरूरत है बुंदेली कलेवा की खाद्य श्रृंखला की शुरुआत बुंदेलखंड से अन्य राज्यों और विश्व पटल पर ले जाने के लिए स्टार्टअप्स को आगे आना चाहिए.

नोटः (प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार झांसी स्थित रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में निदेशक (शिक्षा) हैं. उन्होंने कृषि सेक्टर में ग्रोथ लाने के लिए कई उल्लेखनीय शोध किए हैं. वहीं, इस लेख में शोधार्थी अंजली सिंह ने भी सहयोग किया है.)

Published: 18 Mar, 2026 | 03:52 PM

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