भारत में सौर ऊर्जा के दोहन की अपार संभावनाओं को देखते हुए सरकार ने इस दिशा में सार्थक रणनीति को अपनाया है. इसके मद्देनजर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने में पर्यावरण हितैषी तकनीक के तौर पर सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की पहल की है. इस मकसद की पूर्ति के लिए ही पीएम मोदी की पहल पर 2015 में फ्रांस के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस बनाया गया है. इसके तहत 2030 तक कुल 1000 गीगा वाट सोलर पावर उत्पादन करने का लक्ष्य तय किया है. वहीं, शहर और गांव भी सोलर एनर्जी इस्तेमाल की प्रतिस्पर्धा में तेजी से भाग रहे हैं. इस कड़ी में जम्मू कश्मीर का पल्ली गांव एक नजीर बन कर उभरा है. यह गांव पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर आधारित हो गया है.
सूर्य देव के भरपूर अनुग्रह से युक्त भारत ने सौर ऊर्जा उत्पादन के काम में अपनी अग्रणी भूमिका को स्वीकार करते हुए 2030 तक 300 गीगा वाट संचयी सौर ऊर्जा क्षमता हासिल करने का संकल्प लिया है. इतना ही नहीं, भारत ने 2030 तक 500 गीगा वाट गैर जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा का उत्पादन करने की क्षमता हासिल करने का लक्ष्य भी तय किया है. इसमें 300 गीगा वाट सौर ऊर्जा होगी.
स्पष्ट है कि इस लक्ष्य को पूरा करने पर स्वच्छ ऊर्जा के मामले में भारत दुनिया का नेतृत्व करने वाला देश होगा. ऐसे में मोदी सरकार ने इस संकल्प को सिद्ध करने के लिए दो स्तरों पर समानांतर रूप से काम करने वाली महत्वाकांक्षी योजना को पूरी शिद्दत से लागू कर दिया है. इसके तहत शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा उत्पादन की असीमित संभावनाओं का दोहन करने के लिए दो अलग अलग योजनाएं संचालित की जा रही हैं. इसका मकसद गांव और शहरों की विषम परिस्थितियों को देखते हुए दोनों क्षेत्रों के लिए दो पृथक कार्य योजनाएं लागू करना है. इनके संचालन में शासन स्तर पर किसी प्रकार का टकराव न हो, इसका भी पूरा ध्यान रखते हुए इन योजनाओं को लागू किया गया है.
भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन का इतिहास
भौगोलिक एवं जलवायु की दृष्टि से समूचा भारतीय उपमहाद्वीप सूर्य की सीधी तपिश वाला इलाका है। इसे ध्यान में रखते हुए ही भारतीय परंपराओं में सूर्य की उपासना का विधान अनादि काल से रहा है. इसके पीछे मूल वजह सूर्य से मिलने ऊर्जा को न केवल मनुष्यों बल्कि, संपूर्ण जीव जगत के जीवन की प्राण ऊर्जा मानना है. अब आधुनिक युग में भी सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा को विज्ञान की मदद से भौतिक ऊर्जा में तब्दील कर इसका सदुपयोग जीवन की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में किया जा रहा है. सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में तब्दील करने वाली आधुनिक तकनीक पर आधारित अध्ययन से पता चला है भारतीय उपमहाद्वीप में कुल 748 गीगा वाट सौर ऊर्जा का सालाना उत्पादन करने की क्षमता है.
इस मामले में भारत की बात की जाए तो सौर ऊर्जा के इस्तेमाल का प्रचलन 1990 के दशक में प्राय: देखने को मिलने लगा था. उस दौर में सोलर कुकर से खाना बनाने और सौर लालटेन का इस्तेमाल अंधेरा मिटाने के लिए बहुतायत में होने लगा था. इसके बाद 21वीं सदी के पहले दशक में सरकार ने प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करने के लिए गैर जीवाश्म ईंधन आधारित सौर ऊर्जा को नवीनीकृत ऊर्जा के रूप में अपनाया. शहर और गांव, हर तरफ ऊर्जा की तेजी से बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार ने 2010 में राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन की शुरुआत करते हुए 2022 तक 20 गीगा वाट सौर ऊर्जा उत्पादन करने का लक्ष्य रखा. इस लक्ष्य को 2022 के बाद के वर्षों में 100 गीगा वाट तक बढाने की बात भी इसमें कही गई थी. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए मिशन के तहत किए जा रहे काम की गति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2010 से 2014 तक, 4 साल के दौरान, भारत ने महज 2 गीगा वाट सौर ऊर्जा का उत्पादन करने की क्षमता ही हासिल कर पाई थी.

जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले की पल्ली पंचायत में सौर ऊर्जा संयंत्र का केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने दौरा किया.
इस कमी को दूर करने के लिए 2014 के बाद भारत की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढाने का काम मिशन मोड की मूल भावना के अनुरूप किया गया. इसका परिणाम यह हुआ कि साल 2025-26 में देश की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता 100 गीगावाट पहुंच गई है. इसके साथ ही जापान को सौर ऊर्जा उत्पादन के मामले में पीछे छोड़ते हुए भारत, दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक देश बन गया है.
प्रतिस्पर्धा का बना माहौल- पल्ली गांव सौर ऊर्जा पर
सौर ऊर्जा को बढावा देने में सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर चल रही तमाम योजनाओं और परियोजनाओं के कारण पूरे देश में सौर ऊर्जा का उत्पादन करने की प्रतिस्पर्धा का माहौल बन गया है. राज्य, शहर और अब गांव भी इस प्रतिस्पर्धा में सरपट भाग रहे हैं. इस कड़ी में जम्मू कश्मीर का पल्ली गांव एक नजीर बन कर उभरा है. यह गांव पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर आधारित हो गया है. इस कारण पल्ली ग्राम पंचायत भारत की पहली कार्बन-न्यूट्रल पंचायत के रूप में उभर कर सामने आई है.
इस दिशा में केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर चल रही सोलर पार्क परियोजनाएं सरकारी प्रतिस्पर्धा को दर्शाती हैं. इसके अलावा राज्यों के बीच भी ग्रीन एनर्जी उत्पादन को लेकर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का माहौल पूरे देश में साफ तौर पर देखा जा सकता है. ग्रीन एनर्जी के मामले में सौर ऊर्जा की भागीदारी सबसे आसान इसलिए भी हो गई है क्योंकि इसके उत्पादन में देश का हर नागरिक अब अपनी जिम्मेदार भूमिका को प्रत्यक्ष रूप से निभा पा रहा है. इस माहौल को बनाने में केंद्र सरकार द्वारा शहर और गांवों के लिए संचालित अलग अलग योजनाओं की महती भूमिका है.