Stubble Burning: पराली जलाने की ये समस्या सिर्फ अक्टूबर-नवंबर में ही क्यों दिखती है? यही सवाल जब रायसेन की तस्वीरें सामने आईं, तो केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को भी अपने भाषण में उठाना पड़ा. खेतों में जलती पराली का धुआं हर साल देश को घुटन में डाल देता है, लेकिन कुछ ही महीनों बाद अप्रैल में वही समस्या अचानक खामोश नजर आती है. क्या यह समस्या सच में खत्म हो जाती है या सिर्फ मौसम इसे ढक देता है? ये कहानी सिर्फ किसानों की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की भी है जो हर साल एक ही संकट को दोहराने देता है.
मध्य प्रदेश और यूपी से सामने आते बड़े आंकड़े
ताजा आंकड़ों के अनुसार, 14 अप्रैल तक मध्य प्रदेश में 12,617 से अधिक पराली जलाने के मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह संख्या लगभग 4,701 तक पहुंच गई है. ये आंकड़े पिछले साल की तुलना में ज्यादा हैं, जो यह दिखाते हैं कि समस्या लगातार बढ़ रही है. वहीं पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में, जहां इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा बहस होती है, मामले अपेक्षाकृत कम दर्ज हुए हैं.
रायसेन की तस्वीरों ने बढ़ाई चिंता
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले की कुछ तस्वीरें सामने आने के बाद यह मुद्दा और भी गंभीर हो गया. इन्हीं तस्वीरों का जिक्र केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अपने भाषण में करते हुए किसानों से पराली न जलाने की अपील की. यह साफ संकेत है कि समस्या सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की चिंता बन चुकी है.
अप्रैल में खामोशी, अक्टूबर में हंगामा क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब समस्या अप्रैल में भी मौजूद है, तो उस समय इतना शोर क्यों नहीं होता? इसका कारण मौसम है. अप्रैल में तेज हवाएं धुएं को फैलाकर उसे कम दिखाई देने योग्य बना देती हैं, जबकि अक्टूबर-नवंबर में ठंडी और स्थिर हवा धुएं को जमीन पर रोक लेती है, जिससे प्रदूषण ज्यादा खतरनाक हो जाता है. पराली जलाना अब कई किसानों के लिए एक आदत और मजबूरी दोनों बन चुका है. खेत खाली करने का सबसे आसान तरीका आज भी जलाना ही माना जाता है. जब तक इसे बदलने के लिए आसान और किफायती विकल्प नहीं दिए जाएंगे, तब तक यह समस्या हर साल दोहराती रहेगी.
समाधान की दिशा: बाजार और तकनीक जरूरी
इस समस्या को खत्म करने के लिए केवल रोक लगाना काफी नहीं है. पराली के उपयोग के लिए बाजार बनाना, इसे जैविक खाद, बायोफ्यूल या अन्य उपयोगी उत्पादों में बदलने की तकनीक को बढ़ावा देना जरूरी है. साथ ही किसानों को ऐसे संसाधन उपलब्ध कराने होंगे, जिससे वे बिना जलाए आसानी से फसल अवशेष का प्रबंधन कर सकें.
अगर पराली जलाने की आदत पर अभी काम नहीं किया गया, तो हर साल अप्रैल-मई में खामोशी और अक्टूबर-नवंबर में हाहाकार जारी रहेगा. समस्या मौसम की नहीं, व्यवस्था और आदत की है और समाधान भी वहीं से शुरू होना चाहिए.