खरीफ से पहले बड़ा झटका: गैस की कमी से यूरिया सप्लाई पर असर, कीमतें बढ़ने के आसार
भारत में खरीफ सीजन खेती का सबसे महत्वपूर्ण दौर होता है, जिसमें देश का करीब 60 फीसदी कृषि उत्पादन होता है. इस दौरान धान, मक्का और अन्य फसलों की बुवाई होती है, जिनमें यूरिया की मांग बहुत ज्यादा रहती है. ऐसे में यूरिया की कमी का सीधा असर खेती और उत्पादन पर पड़ सकता है.
fertilizer crisis India: देश में आने वाले खरीफ सीजन से पहले यूरिया की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. अंतरराष्ट्रीय हालात, खासकर ईरान से जुड़े तनाव और गैस सप्लाई में अनिश्चितता के कारण भारत का उर्वरक सेक्टर दबाव में है. हालांकि सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि किसानों को समय पर पर्याप्त खाद मिल सके, लेकिन इसके लिए उसे ज्यादा कीमत और सब्सिडी का बोझ उठाना पड़ सकता है.
खरीफ सीजन क्यों है अहम?
भारत में खरीफ सीजन खेती का सबसे महत्वपूर्ण दौर होता है, जिसमें देश का करीब 60 फीसदी कृषि उत्पादन होता है. इस दौरान धान, मक्का और अन्य फसलों की बुवाई होती है, जिनमें यूरिया की मांग बहुत ज्यादा रहती है. ऐसे में यूरिया की कमी का सीधा असर खेती और उत्पादन पर पड़ सकता है.
गैस सप्लाई पर टिकी यूरिया उत्पादन की स्थिति
यूरिया उत्पादन पूरी तरह प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है. अभी गैस सप्लाई की स्थिति स्थिर नहीं है और इसे “वोलाटाइल” बताया जा रहा है. इसी कारण उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है. सरकार ने उर्वरक कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे अमोनिया का इस्तेमाल सिर्फ यूरिया बनाने में करें, ताकि उत्पादन बढ़ाया जा सके और किसानों को पर्याप्त खाद मिल सके.
65 फीसदी गैस पर चल रहा काम
फिलहाल बड़ी उर्वरक कंपनियों को उनकी जरूरत का करीब 65 फीसदी गैस ही मिल पा रहा है.
IFFCO: इसके 5 में से 3 प्लांट पूरी क्षमता से चल रहे हैं, जबकि 2 प्लांट मेंटेनेंस के कारण बंद हैं. उपलब्ध गैस को इन 3 प्लांट्स में इस्तेमाल किया जा रहा है.
KRIBHCO: हजीरा स्थित प्लांट अभी पूरी क्षमता से नहीं चल पा रहा है, क्योंकि गैस सप्लाई 65 फीसदी तक नहीं पहुंची है. यह प्लांट देश का दूसरा सबसे बड़ा यूरिया उत्पादन केंद्र है, जिसने 2023-24 में 2.34 मिलियन टन उत्पादन किया था, जो इसकी क्षमता (2.1 मिलियन टन) से ज्यादा है.
NFL (नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड): इसके 5 में से 4 प्लांट चल रहे हैं और लगभग 65 फीसदी क्षमता पर काम कर रहे हैं. पंजाब के नांगल स्थित प्लांट मेंटेनेंस पर है और बाकी प्लांट भी मार्च के अंत या अप्रैल में बंद हो सकते हैं.
हालांकि पिछले एक हफ्ते में गैस सप्लाई में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी सभी कंपनियों को पर्याप्त गैस नहीं मिल रही है.
गैस की कमी से यूरिया महंगा, सब्सिडी खर्च बढ़ने की संभावना, pc-AI
विदेशी सप्लाई से उम्मीद, लेकिन महंगाई तय
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत गैस की कमी को रूस, अमेरिका, ब्राजील और गुयाना से आयात बढ़ाकर पूरा कर सकता है. हालांकि सप्लाई तो मिल सकती है, लेकिन कीमतें बढ़ेंगी. पहले यूरिया की वैश्विक कीमत 500 डॉलर प्रति टन से कम थी, लेकिन अब यह 700 डॉलर प्रति टन तक पहुंचने की खबर है (हालांकि अभी कोई सौदा नहीं हुआ है). भारत में घरेलू उत्पादन की लागत अभी 450-500 डॉलर प्रति टन के आसपास है, लेकिन LNG की कीमत 20 डॉलर प्रति mmBtu से ऊपर जाने के कारण लागत बढ़ने की संभावना है.
अमेरिका में भी गैस की कीमत 27 फरवरी के 2.80 डॉलर/mmBtu से बढ़कर 3.02 डॉलर/mmBtu तक पहुंच गई है.
मांग और स्टॉक की स्थिति
2025 के खरीफ सीजन में यूरिया की मांग 18.54 मिलियन टन थी, लेकिन बिक्री 4 फीसदी बढ़कर 19.32 मिलियन टन हो गई. 2026 के लिए अभी मांग का अनुमान तय नहीं हुआ है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 10 मार्च तक देश में 6.15 मिलियन टन यूरिया का स्टॉक मौजूद था. अगर 2025 की तरह (अप्रैल-सितंबर) 14.48 मिलियन टन उत्पादन होता है, तो सप्लाई संतुलित रह सकती है.
उत्पादन और समय का संतुलन
अप्रैल महीना यूरिया उत्पादन के लिए आमतौर पर “लीन सीजन” होता है, क्योंकि असली मांग जून में मानसून के साथ शुरू होती है. इस बार कुछ फैक्ट्रियों ने पहले ही मार्च में मेंटेनेंस कर लिया है ताकि आगे उत्पादन प्रभावित न हो. मार्च 2025 में 2.48 मिलियन टन और अप्रैल में 2.19 मिलियन टन उत्पादन हुआ था.
सरकार पर बढ़ेगा सब्सिडी का बोझ
यूरिया किसानों को सिर्फ 267 रुपये प्रति 45 किलो बैग में दिया जाता है, जबकि इसकी असली लागत इससे कहीं ज्यादा होती है.
आयातित यूरिया पर सब्सिडी: करीब 2100 रुपये प्रति बैग
घरेलू यूरिया पर सब्सिडी: करीब 1397 रुपये प्रति बैग
2026-27 के लिए कुल यूरिया सब्सिडी 1,16,805 करोड़ रुपये तय की गई है, जो पिछले साल 1,26,475 करोड़ रुपये से 7.6 फीसदी कम है. लेकिन आयातित यूरिया पर सब्सिडी में 52 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी का अनुमान है, जिससे सरकार पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है.
खेती पर असर
कृषि विशेषज्ञ निर्मल यादव के अनुसार अगर युद्ध लंबा चलता है और गैस सप्लाई प्रभावित रहती है, तो खाद की उपलब्धता पर असर पड़ेगा. खासकर मक्का जैसी फसलें, जो ज्यादा खाद पर निर्भर हैं, उनकी पैदावार प्रभावित हो सकती है. मई में मक्का की बुवाई शुरू होती है, इसलिए समय पर खाद मिलना बेहद जरूरी है.