देश में पराली जलाने के मामलों में 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी, MP-UP में हालात सबसे गंभीर
सैटेलाइट के जरिए इन घटनाओं की निगरानी की जा रही है, जिससे सटीक आंकड़े सामने आ रहे हैं. 1 अप्रैल से 22 अप्रैल के बीच कुल 32,630 आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 26,574 थी. केवल 22 अप्रैल को ही 3,463 मामले सामने आए, जो यह दिखाता है कि समस्या कितनी तेजी से बढ़ रही है.
देश में गेहूं की कटाई के बाद पराली जलाने की समस्या एक बार फिर तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है. ताजा आंकड़ों के अनुसार इस साल गेहूं की पराली जलाने के मामलों में करीब 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह सिर्फ पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि खेती और मिट्टी की सेहत के लिए भी एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है.
सैटेलाइट के जरिए इन घटनाओं की निगरानी की जा रही है, जिससे सटीक आंकड़े सामने आ रहे हैं. 1 अप्रैल से 22 अप्रैल के बीच कुल 32,630 आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 26,574 थी. केवल 22 अप्रैल को ही 3,463 मामले सामने आए, जो यह दिखाता है कि समस्या कितनी तेजी से बढ़ रही है.
मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा मामले
मध्य प्रदेश इस मामले में सबसे आगे है. यहां 1 अप्रैल से 22 अप्रैल के बीच 22,475 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जो कुल मामलों का लगभग 69 प्रतिशत हिस्सा है. राज्य के कई जिलों में यह समस्या ज्यादा गंभीर रूप में सामने आई है. विदिशा में 2,491, रायसेन में 2,179, उज्जैन में 2,096, होशंगाबाद में 1,705 और सिवनी में 1,639 मामले दर्ज किए गए हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि राज्य के बड़े हिस्से में पराली जलाना अभी भी आम प्रथा बनी हुई है.
उत्तर प्रदेश में तेजी से बढ़ती समस्या
उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है, जहां 9,952 मामले सामने आए हैं, जो कुल का करीब 30 प्रतिशत है. यहां स्थिति इसलिए ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि पिछले साल के मुकाबले मामलों की संख्या दोगुने से भी ज्यादा हो गई है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिले इस समस्या में सबसे आगे हैं. सिद्धार्थनगर में 3,042, गोरखपुर में 1,277, देवरिया में 952, महाराजगंज में 928 और संतकबीरनगर में 847 घटनाएं दर्ज की गई हैं.
हरियाणा, पंजाब और दिल्ली की स्थिति
हरियाणा में इस अवधि के दौरान 108 मामले सामने आए हैं, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 8 प्रतिशत ज्यादा हैं. वहीं पंजाब में 88 मामले दर्ज किए गए हैं, जो पिछले साल के बराबर हैं. जबकि दिल्ली में सिर्फ 7 मामले सामने आए हैं, लेकिन आसपास के राज्यों में पराली जलाने का असर राजधानी की हवा पर भी पड़ता है.
क्यों बढ़ रही है यह समस्या
विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों के सामने समय और संसाधनों की कमी एक बड़ी वजह है. खासकर उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों में अब किसान धान की बुवाई से पहले तीसरी फसल के रूप में कम अवधि वाली मक्का उगा रहे हैं. ऐसे में खेत जल्दी खाली करने के लिए पराली जलाना आसान तरीका बन जाता है.कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, राज्यों को इस मुद्दे पर ज्यादा सक्रिय होने की जरूरत है. स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों को शामिल कर किसानों को समझाना होगा कि पराली जलाना लंबे समय में नुकसानदायक है.
पर्यावरण और खेती पर असर
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं हवा को प्रदूषित करता है, जिससे सांस से जुड़ी बीमारियां बढ़ती हैं. इसके अलावा यह मिट्टी की उर्वरता को भी कम करता है और जमीन की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर डालता है. लंबे समय में यह खेती की उत्पादकता को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे किसानों को ही नुकसान उठाना पड़ता है.
समाधान की दिशा में कदम जरूरी
इस समस्या का समाधान केवल सख्ती से नहीं, बल्कि जागरूकता और तकनीकी विकल्पों से ही संभव है. किसानों को ऐसे विकल्प देने होंगे, जिससे वे बिना जलाए खेत साफ कर सकें. सरकार को मशीनों, सब्सिडी और प्रशिक्षण के जरिए किसानों की मदद करनी होगी, ताकि वे पर्यावरण के अनुकूल तरीके अपनाएं.