भारत में कृषि तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से देश के पहले AI-आधारित टिकाऊ खेती (Sustainable Farming) पायलट की शुरुआत की गई है. फॉर्च्यून राइस लिमिटेड (Fortune Rice Ltd) ने उत्तर प्रदेश सरकार के स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन (State Transformation Commission) और सिंगापुर-वियतनाम की रायनन टेक्नोलॉजीस (RYNAN Technologies) के साथ मिलकर यह परियोजना शुरू की है. इसका उद्देश्य धान की खेती में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और डेटा आधारित निगरानी के जरिए उत्पादन लागत कम करना, कीटनाशकों का सीमित और वैज्ञानिक उपयोग सुनिश्चित करना, पानी की बचत करना, मीथेन उत्सर्जन कम करना और किसानों को वैश्विक निर्यात बाजारों की गुणवत्ता आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना है.
इस पायलट का उद्घाटन अलीगढ़ जिले के गभाना क्षेत्र के ग्राम दरगवा स्थित फॉर्च्यून राइस के जेवर मॉडल फार्म में किया गया. यहां AI आधारित कीट निगरानी प्रणाली, मीथेन उत्सर्जन मॉनिटर और पांच IoT रडार जल-स्तर सेंसर लगाए गए हैं. सभी उपकरण सौर ऊर्जा से संचालित हैं और लगातार खेत की निगरानी करते हैं.
कीटनाशकों के इस्तेमाल में आएगी कमी
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि खेत में कीटनाशकों का छिड़काव केवल तब किया जाएगा, जब AI आधारित डेटा यह संकेत देगा कि उसकी वास्तव में आवश्यकता है. इससे किसानों की लागत कम होगी, रासायनिक अवशेष घटेंगे और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. वहीं सिंचाई का निर्णय भी सेंसर से प्राप्त वास्तविक आंकड़ों के आधार पर होगा, जिससे पानी की बचत होगी.
परियोजना का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भारतीय बासमती चावल को यूरोपीय बाजारों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना भी है. AI और सेंसर आधारित रिकॉर्डिंग से हर खेत का डिजिटल डेटा तैयार होगा, जो यूरोप जैसे देशों की कड़ी गुणवत्ता और अवशेष (Residue) संबंधी शर्तों को पूरा करने में मदद करेगा. इससे किसानों को प्रीमियम निर्यात बाजारों तक पहुंच और बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ेगी.
फॉर्च्यून राइस कंपनी का नेटवर्क यूपी के 250 गांवों में
फॉर्च्यून राइस पिछले नौ वर्षों से उत्तर प्रदेश के किसानों के साथ अनुबंध आधारित खेती और तकनीकी सहयोग पर काम कर रही है. कंपनी का नेटवर्क चार जिलों के 250 गांवों में फैले 2,500 से अधिक किसानों और 15,000 एकड़ से अधिक क्षेत्र तक पहुंच चुका है. कंपनी किसानों को प्रमाणित बीज और फसल सुरक्षा सामग्री ब्याज-मुक्त उपलब्ध कराती है. इसके अलावा फील्ड टीम नियमित रूप से किसानों के खेतों का दौरा करती है और निजी खरीद प्रणाली के माध्यम से 72 घंटे के भीतर बिना किसी बिचौलिए के भुगतान सुनिश्चित किया जाता है.
वित्त वर्ष 2025-26 में फॉर्च्यून राइस ने यूरोप को 50,000 टन चावल निर्यात किया. कंपनी का दावा है कि पूरा निर्यात यूरोपीय अवशेष मानकों के अनुरूप रहा और किसी भी खेप को अस्वीकृति का सामना नहीं करना पड़ा. अब कंपनी किसानों को केवल धान तक सीमित रखने के बजाय निर्यात-योग्य बागवानी फसलों और अधिक मूल्य वाली खेती की ओर भी प्रोत्साहित कर रही है.
इस पहल का केंद्र जेवर मॉडल फार्म है, जो 18 एकड़ में विकसित एक कार्यशील मॉडल फार्म है. यहां नई धान किस्मों, बेहतर उत्पादन तकनीकों और निर्यात योग्य फलों एवं सब्जियों की खेती का परीक्षण किया जाता है. बेबी कॉर्न, लौकी और भिंडी जैसी फसलों के लिए व्यावहारिक खेती मॉडल विकसित किए जा रहे हैं ताकि किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत तैयार किए जा सकें. फॉर्च्यून का कहना है कि किसी भी तकनीक या पैकेज ऑफ प्रैक्टिस को किसानों तक पहुंचाने से पहले उसका परीक्षण इसी मॉडल फार्म पर किया जाता है.
जेवर फसल क्लीनिक का भी हुआ उद्घाटन
इसी कार्यक्रम के दौरान जेवर फसल क्लीनिक का भी उद्घाटन किया गया. यह केंद्र किसानों को फसल एवं मिट्टी की जांच, वैज्ञानिक सलाह और सत्यापित कृषि इनपुट एक ही स्थान पर उपलब्ध कराएगा. यहां केवल उन्हीं बीजों, उर्वरकों और कीटनाशकों की उपलब्धता होगी जिन्हें फॉर्च्यून राइस ने स्वयं परीक्षण के बाद उपयुक्त पाया है. कंपनी का कहना है कि किसानों को ये इनपुट न्यूनतम संभव कीमत पर उपलब्ध कराए जाएंगे.
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश सरकार के स्टेट ट्रांसफॉर्मेशन कमीशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज कुमार सिंह थे. विशिष्ट अतिथि के रूप में पद्मश्री डॉ. अशोक कुमार सिंह, पूर्व निदेशक, ICAR-IARI उपस्थित रहे. इस अवसर पर ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल, अलीगढ़ मंडल की कमिश्नर संगीता सिंह, RYNAN Technologies के प्रतिनिधि, जिला कृषि अधिकारी धीरेंद्र चौधरी, गभाना के उपजिलाधिकारी तथा ICAR, IARI, IRRI, World Bank, CEEW, APEDA सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के वैज्ञानिक एवं एग्रीटेक विशेषज्ञ भी मौजूद रहे.
यह पहल इस बात का संकेत है कि भारत में कृषि अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि डेटा आधारित, टिकाऊ और निर्यात केंद्रित खेती की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है. यदि यह पायलट सफल रहता है, तो भविष्य में इसे अन्य राज्यों और फसलों तक भी विस्तार दिया जा सकता है.