कावेरी जल विवाद में नया मोड़! कर्नाटक से बातचीत चाहते हैं CM विजय, किसानों ने खोला मोर्चा

Cauvery Water Dispute: कावेरी नदी में पानी की कमी के बीच तमिलनाडु सरकार कर्नाटक के साथ बातचीत कर जल विवाद का समाधान निकालना चाहती है. हालांकि किसान संगठनों और विपक्षी दल डीएमके ने इस पहल का विरोध किया है. इस बीच, तय 31 टीएमसी फीट के मुकाबले तमिलनाडु को केवल 3.5 टीएमसी फीट पानी मिला है.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 28 Jul, 2026 | 01:52 PM

Kaveri Water Dispute: तमिलनाडु में बढ़ते जल संकट के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर एक बार फिर सियासत और किसानों की चिंता बढ़ गई है. मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय कर्नाटक के साथ बातचीत के जरिए कावेरी जल विवाद का समाधान निकालने के पक्ष में हैं. उनका मानना है कि, दोनों राज्यों के बीच आपसी संवाद से पानी के बंटवारे का रास्ता निकाला जा सकता है. हालांकि, सरकार की इस पहल का किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने विरोध शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि यह मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले और तय कानूनी व्यवस्था के तहत चल रहा है, इसलिए बातचीत की बजाय कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना चाहिए.

पानी की कमी से प्रभावित हो रही खेती

तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में इस समय पानी की भारी कमी है. खासकर तंजावुर, तिरुवारुर और नागपट्टिनम जैसे जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. यहां कुरुवई धान की खेती के लिए समय पर पानी नहीं मिलने से किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं होने के कारण इस साल मेट्टूर बांध को भी परंपरागत तारीख 12 जून को नहीं खोला जा सका. इसका सीधा असर धान की बुवाई और सिंचाई व्यवस्था पर पड़ा है.

किसान संगठनों ने क्यों किया विरोध?

राज्य के कृषि मंत्री आर. विनोथ की अध्यक्षता में हुई बैठक में किसान संगठनों ने सरकार से कर्नाटक के साथ प्रस्तावित बातचीत को रद्द करने की मांग की. तमिलनाडु कावेरी किसान संघ का कहना है कि, दोनों राज्यों के बीच सीधी बातचीत से सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है. किसानों का मानना है कि, राज्य सरकार को अदालत और कानूनी संस्थाओं के जरिए अपने हिस्से का पानी सुनिश्चित करना चाहिए, न कि नई बातचीत शुरू करनी चाहिए.

विपक्ष ने भी सरकार पर उठाए सवाल

मुख्य विपक्षी दल डीएमके ने भी मुख्यमंत्री की पहल पर सवाल खड़े किए हैं. पार्टी का कहना है कि सरकार को बातचीत की बजाय ऐसा स्थायी समाधान तलाशना चाहिए, जिससे तमिलनाडु को उसके हिस्से का पूरा पानी नियमित रूप से मिलता रहे. डीएमके का मानना है कि, राज्य के किसानों के हितों की रक्षा के लिए मजबूत कानूनी कदम ज्यादा जरूरी हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने बनाई थी निगरानी व्यवस्था

कावेरी जल विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में अहम फैसला सुनाया था. इसके बाद कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) का गठन किया गया. इन दोनों संस्थाओं की जिम्मेदारी कर्नाटक और तमिलनाडु सहित संबंधित राज्यों के बीच पानी के आवंटन और उसकी निगरानी करना है.

तय हिस्से से बहुत कम मिला पानी

सुप्रीम कोर्ट के तय कार्यक्रम के अनुसार 1 जून से 22 जुलाई 2026 के बीच तमिलनाडु को 31 टीएमसी फीट पानी मिलना था. लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में राज्य को केवल 3.5 टीएमसी फीट पानी ही मिला. इससे सिंचाई के साथ-साथ कई इलाकों में पेयजल की समस्या भी बढ़ने लगी है. एक्सपर्ट का कहना है कि अगर आने वाले दिनों में पर्याप्त पानी नहीं मिला, तो धान की फसल पर बड़ा असर पड़ सकता है.

मेकेदातु परियोजना पर भी बढ़ी बहस

कावेरी विवाद ऐसे समय फिर चर्चा में आया है, जब केंद्र सरकार ने संसद में कहा है कि, कर्नाटक को कावेरी नदी पर किसी नई परियोजना के लिए तमिलनाडु, केरल या पुडुचेरी की सहमति लेना अनिवार्य नहीं है. केंद्र ने यह भी बताया कि, कर्नाटक ने साल 2019 में मेकेदातु बैलेंसिंग रिजर्वायर और पेयजल परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) पेश की थी. हालांकि, इसे कुछ संशोधनों के लिए वापस भेज दिया गया है.

आगे क्या हो सकता है?

तमिलनाडु सरकार बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश कर रही है, जबकि किसान संगठन और विपक्ष कानूनी रास्ते पर जोर दे रहे हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि राज्य सरकार अपनी बातचीत की पहल को आगे बढ़ाती है या फिर कानूनी विकल्पों पर ज्यादा ध्यान देती है. फिलहाल सबसे बड़ी चिंता कावेरी डेल्टा के किसानों की है, जिन्हें समय पर पानी नहीं मिला तो धान की फसल और उनकी आय दोनों पर असर पड़ सकता है.

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