मौसम की अनियमित गति ने पूरी दुनिया को मुसीबत में डाल दिया है. ठंडी जलवायु के लिए मशहूर यूरोपीय देश इस साल सड़कों तक को पिघला देने वाली भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं. स्थिति की गंभीरता को इसी बात से समझा जा सकता है कि अकेले फ्रांस में इस साल गर्मी की तपिश के आगे लगभग सौ लोग हार मानकर अपना जीवन गंवा चुके हैं. अरब के रेगिस्तानी इलाकों में भयानक बारिश का सैलाब, ठंडे इलाकों में हीट वेव और हिमालय सहित दुनिया के अन्य ग्लेशियरों का पिघलना, कुदरत के ऐसे बदलाव का साफ संकेत है, जिसकी आहट 21वीं सदी के शुरू में ही महसूस की जाने लगी थी.
इसके बावजूद दुनिया भर में विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ की गति को थामने के बजाय इसे और तेज करने की गला काट प्रतिस्पर्धा ने समूची मानव जाति को महज ढाई दशक में आज इस मुकाम पर ला खडा किया है, जहां से अब किसी को कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा है. कुदरत को बौना साबित करने वाली तथाकथित तरक्की को देख कर लगता है कि मानो सभी देशों ने महाविनाश की ओर ले जा रही इस तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ने का फैसला कर लिया है, यह मानते हुए कि अब पीछे लौटने या रुकने का कोई विकल्प ही नहीं है.
कुदरत के साथ गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी
हालात का तटस्थ विश्लेषण इस बात की ताकीद करता है कि भारत जैसी विशाल आबादी और व्यापक भूभाग वाले विकासशील देशों ने तथाकथित विकसित देशों की तरक्की के मानकों को हासिल करने की अंधी दौड़ में खुद को झोंक कर कुदरत के साथ बेहद गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाने में कोई कसर नहीं छोडी है. हैरत की बात तो यह है कि अभी भी हम में से कोई इस आत्मघाती दौर से बाहर आकर प्रकृति के नियमों को सीखने, समझने और आत्मसात करने के लिए तैयार नहीं है. अब मजबूर होकर कुदरत ही अपने तरीके से सब कुछ दुरुस्त करने को तत्पर हुई है. यह एक स्थापित नियम है कि कुदरत का निजाम बहुत सख्त होता है. इसी का नतीजा है कि संपूर्ण जीव जगत, मैदानी इलाकों में भीषण ताप, दरकते पहाड़ों पर भूस्खलन, कहीं सैलाब, कहीं अकाल और कहीं वेनेजुएला जैसे विनाशकारी जलजले का दंश भोगने को अभिशप्त है.
अगर भारत की ही बात की जाए तो आज पूरा देश, मौसम के बदले मिजाज के कारण भावी खाद्यान्न संकट के मुहाने पर खड़ा है. समशीतोष्ण जलवायु वाले भारतीय उपमहाद्वीप में मैदानी इलाके पिछले तीन महीनों से भीषण हीट वेव की चपेट में हैं. तपती धरती के कहर का आलम यह है कि भारत में साल भर की बारिश की सौगात बनकर आने वाले दक्षिण पश्चिम मानसून की गति को भी प्रचंड गर्मी ने हाल ही में ठिठकने पर मजबूर कर दिया है. केरल तट पर यह मानसून अपने पूर्व निर्धारित समय से देरी से दस्तक देने के बाद पूर्वी एवं उत्तरी इलाकों की तरफ आगे बढ़ने के बजाय थम सा गया. जून का महीना खत्म होने तक उत्तर भारत के मैदानी इलाक़े मानसून की बाट जोहते रह गए. इन इलाकों में मानसून की आमद कब होगी, यह सवाल अनुत्तरित ही बना रहा.
हालांकि मौसम विभाग मानसून की आमद को लेकर लगातार पूर्वानुमान जरूर जता रहा है, लेकिन मौसम की मनमानी हो चुकी चाल ने मौसम वैज्ञानिकों को भी हलकान कर दिया है.
खेती किसानी और खाद्यान्न श्रृंखला मानसून की गति पर ही निर्भर
धरती की बढ़ती तपिश को हमारे मौसम वैज्ञानिक भले ही जलवायु परिवर्तन या अल नीनो जैसे तमाम नाम देकर तसल्ली कर लें, लेकिन ये हालात सामान्य सोच समझ रखने वालों को इस बदलाव से जुड़े हर पहलू पर विचार करने के लिए विवश जरूर कर देते हैं. विचारणीय पहलू यह है कि क्या अल नीनो या जलवायु परिवर्तन, प्रकृति की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं, या मौसम से जुड़ी इन घटनाओं के पीछे कोई और वजह भी है. अगर ये मौसम की सामान्य घटनाएं हैं भी, तो क्या विचार इस बात पर भी नहीं होना चाहिए कि हम और हमारी सरकारें इन घटनाओं के बहुआयामी प्रभावों से निपटने के लिए कितनी तैयार हैं. खासकर तब जबकि भारत में खेती किसानी और खाद्यान्न श्रृंखला पूरी तरह से मानसून की गति पर ही निर्भर है. इस जमीनी हकीकत को भांपने के बाद ही शायद कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस साल कम बारिश के पूर्वानुमान के कारण आने वाले समय में देश के समक्ष खाद्यान्न की कमी होने का सच स्वीकार करना पड़ा.
मतलब साफ है कि प्रशांत महासागर में गर्मी को बढ़ाने वाले अल नीनो प्रभाव से भारत इस साल बुरी तरह प्रभावित है. इसके कारण भारत में बारिश का स्तर सामान्य से कम रहने की आशंका पहले से ही जताई जाने लगी थी. लेकिन अब जबकि मानसून ने दस्तक दे ही दी है, तब इसकी शुरुआती सुस्ती ने सभी की चिंता बढा दी है. कृषि मंत्री ने स्वीकार किया है कि इस साल खरीफ फसलों के उत्पादन पर असर पडे़गा. चौहान ने यह बात मौसम विभाग के उस पूर्वानुमान के आधार पर कही है जिसमें 2 जुलाई तक मानसून की गति सुस्त ही रहने की संभावना जताई गई है. इतना ही नहीं इस साल देश के 315 जिलों में सामान्य से कम बारिश होना तय है। बारिश की कमी वाले ये वही इलाके हैं जिनमें धान बहुतायत में उगाई जाती है. कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश में अब तक खरीफ सीजन की महज 12 फीसदी बुआई ही हो सकी है. कम बारिश का असर निश्चित रूप से बोई जाने वाली और बोई जा चुकी, दोनों प्रकार की फसलों पर पडे़गा.
बारिश की कमी से देश के जलाशयों की सेहत भी तेजी से नाजुक हो रही
इतना ही नहीं, बारिश की कमी के कारण देश के जलाशयों की सेहत भी तेजी से नाजुक हो रही है. कमजोर मानसून के कारण जलाशयों के तेजी से गिर रहे जलस्तर ने खरीफ सीजन को शुरुआत में ही तगड़ा झटका दे दिया है. इस सीजन की सर्वाधिक बुआई वाले राज्य महाराष्ट्र और तेलंगाना में अब तक बोई जाने वाली फसलों का रकबा 85 फीसदी तक घट गया है. हालांकि महाराष्ट्र और तेलंगाना में बारिश शुरू हो गई है, फिर भी इसकी कमी बनी हुई है.
महाराष्ट्र में एक जून को मानसून की बारिश शुरू होने के बाद 24 जून तक सामान्य से 63 फीसदी कम बारिश हुई है. इस समय तक देश के जलाशयों में संचित जल का स्तर घटकर 23 फीसदी तक रह गया है. पिछले साल इसी अवधि में यह स्तर 40 फीसदी था। तेलंगाना और महाराष्ट्र में धान के अलावा कपास एवं सोयाबीन की बुआई भी इस साल कम हुई है. इससे भी बुरा हाल राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का है. राजस्थान में अभी तक तक मात्र 20 फीसदी बुआई का रकबा ही कवर हो पाया है. कुल मिलाकर देश में अब तक खरीफ फसलों की बुआई वाले मात्र 10 फीसदी इलाके में ही इस सीजन की फसलें बोई जा सकी हैं. सरकार ने हालात की गंभीरता को देखते हुए एक आपात प्लान भी तैयार कर लिया है. इसके मद्देनजर देश में 111 जिलों को सूखा एवं कृषि संकट के लिहाज से अतिसंवेदनशील जिले के रूप में चिन्हित किया है. ये वे जिले हें, जिनमें सिंचाई के साधनों का नेटवर्क महज 25 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है. इस फेहरिस्त में 20 जिले अकेले महाराष्ट्र से हैं.
अब सरकार ने इन जिलों के लिए विशेष जल प्रबंधन, कम पानी में पकने वाले वैकल्पिक बीजों की उपलब्धता एवं बिजली, पानी की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करने की पहल की है. हालांकि कृषि मंत्री खुद धान के खेतों में पौध की रोपाई करने की नूराकुश्ती करते सोशल मीडिया में नजर आ रहे हैं, लेकिन सभी को इस जन्नत की हकीकत मालूम है. जमीन पर जो हालात हैं, वे किसानों के लिए उतने ही संवेदनशील हैं, जितना सरकारी सिस्टम किसानों के प्रति संवेदनहीन है.
सरकार के अपने ही आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि देश में खरीफ सीजन की फसलों का सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाले राज्य महाराष्ट्र में अब तक सामान्य से 82 फीसदी, गुजरात में 75 फीसदी, छत्तीसगढ में 69 फीसदी, मध्य प्रदेश में 52 फीसदी, ओडिशा में 48 फीसदी और उत्तर प्रदेश में 43 फीसदी कम बारिश का असर उत्पादन पर पड़ना तय है. ऐसे में यक्ष प्रश्न यह है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान देश को खाद्यान्न संकट से कैसे बचाय जा सकेगा. खासकर तब जबकि युद्धरत दुनिया में वैश्विक बाजार पहले से ही मंदी की मार का सामना कर रहा हो. शायद इसके मद्देनज़र ही भारत में खुदरा मंहगाई 5.1 प्रतिशत तक पहुंचने की आरबीआई द्वारा भी चेतावनी जारी कर दी गई है.
संकट के पीछे सरकार का अपना ही द्वंद्व जिम्मेदार
सरकार और सरकार का सिस्टम भले ही इस संकट का ठीकरा बादलों के बेइमान होने पर फोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से बच ले, लेकिन यह बात महज इस एक साल की ही नहीं है. इस संकट की आहट तो 21वीं सदी के शुरू में ही महसूस की जाने लगी थी. इतना ही नहीं, इससे निपटने के लिए खेती के तौर तरीकों को बदलने की कवायद भी भारत सरकार ने 2011 में शुरू भी कर दी थी, मगर 2014 में देश ने खुद को 2047 तक विकसित बनाने का संकल्प लेकर बदलती जलवायु के अनुरूप फसलें उपजाने की कवायद की दिशा और दशा को ही बदल दिया. इस संकट के पीछे सरकार का अपना ही द्वंद्व जिम्मेदार है. एक तरफ सरकार नदी, जंगल और पहाडों की हिमायती बनते हुए दिखना चाहती है, वहीं दूसरी ओर सरकार हिमालय की छाती से लेकर समंदर की गहराईयों तक यातायात के रास्तों का जाल बिछाने के लिए विवश भी है. हमारी सरकार हंसती खिलखिलाती नदी और झीलों को मैदान बनाकर कंक्रीट के जंगल उगाने में इस कदर मशगूल है कि उसे इस सोच के दुष्परिणामों का शायद अहसास भी नहीं है.