फरवरी 2026 बना दुनिया का पांचवां सबसे गर्म महीना, तापमान ने तोड़े पुराने रिकॉर्ड… जलवायु परिवर्तन की चिंता गहराई
यूरोपीय मौसम एजेंसी से जुड़े कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की रिपोर्ट में बताया गया है कि फरवरी 2026 में पृथ्वी की सतह का औसत वायु तापमान 13.26 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. यह 1991 से 2020 के बीच फरवरी के औसत तापमान से लगभग 0.53 डिग्री ज्यादा है.
Global temperature february 2026: दुनिया में बढ़ते तापमान का असर अब और साफ दिखाई देने लगा है. हाल ही में जारी एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2026 वैश्विक स्तर पर अब तक का पांचवां सबसे गर्म फरवरी महीना रहा. इस दौरान धरती का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से करीब 1.49 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया.
यूरोपीय मौसम एजेंसी से जुड़े कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की रिपोर्ट में बताया गया है कि फरवरी 2026 में पृथ्वी की सतह का औसत वायु तापमान 13.26 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. यह 1991 से 2020 के बीच फरवरी के औसत तापमान से लगभग 0.53 डिग्री ज्यादा है. विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ते तापमान और असामान्य मौसम घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब तेजी से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई देने लगा है.
कई देशों में भारी बारिश और तूफान
बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, फरवरी 2026 के दौरान दुनिया के कई क्षेत्रों में मौसम बेहद असामान्य रहा. यूरोप के कई देशों में तेज तूफान और भारी बारिश के कारण हालात बिगड़ गए. खासतौर पर फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल और मोरक्को जैसे देशों में रिकॉर्ड बारिश दर्ज की गई, जिससे कई जगहों पर गंभीर बाढ़ की स्थिति बन गई. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, मोजाम्बिक और बोत्सवाना में भी भारी बारिश और बाढ़ की घटनाएं सामने आईं. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की चरम मौसम घटनाएं अब पहले की तुलना में ज्यादा देखने को मिल रही हैं.
आर्कटिक में बर्फ का स्तर भी घटा
इस रिपोर्ट में एक और चिंता की बात सामने आई है. फरवरी महीने के दौरान आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री बर्फ का विस्तार सामान्य से काफी कम दर्ज किया गया. यह फरवरी के लिए अब तक का तीसरा सबसे कम स्तर माना गया है. आर्कटिक में बर्फ कम होने से वैश्विक जलवायु संतुलन पर असर पड़ सकता है, क्योंकि बर्फ सूर्य की किरणों को परावर्तित कर पृथ्वी को ठंडा रखने में मदद करती है.
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
यूरोपीय मौसम पूर्वानुमान केंद्र (ECMWF) में जलवायु मामलों की रणनीतिक प्रमुख समंथा बर्गेस के अनुसार, फरवरी 2026 की चरम मौसम घटनाएं जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को दिखाती हैं. उनके अनुसार, “इस महीने दुनिया का तापमान औद्योगिक काल से पहले के स्तर से लगभग 1.49 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया, जो एक गंभीर संकेत है. पश्चिमी और दक्षिणी यूरोप में अत्यधिक नमी वाली हवाओं की वजह से रिकॉर्ड बारिश और बाढ़ की स्थिति बनी, जबकि आर्कटिक में बर्फ का स्तर काफी कम रहा.”
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग स्थिति
फरवरी 2026 के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से ज्यादा रहा. अमेरिका, उत्तर-पूर्वी कनाडा, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और पूर्वी अंटार्कटिका में तापमान औसत से ऊपर दर्ज किया गया.
वहीं दूसरी ओर अलास्का, उत्तरी कनाडा, ग्रीनलैंड और रूस के उत्तरी हिस्सों में तापमान सामान्य से कम रहा. इससे यह साफ होता है कि वैश्विक तापमान बढ़ने के बावजूद अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम के प्रभाव अलग तरह से दिखाई दे सकते हैं.
सर्दियों का तापमान भी रहा ज्यादा
दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच का समय, जिसे उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों का मौसम माना जाता है, वह भी तापमान के लिहाज से असामान्य रहा. इस दौरान वैश्विक औसत तापमान 1991–2020 के औसत से 0.51 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया. हालांकि यूरोप में इस दौरान कुछ हिस्सों में ठंड भी देखने को मिली और यह पिछले 13 वर्षों में सबसे ठंडी सर्दियों में से एक मानी गई.
समुद्र का तापमान भी बढ़ा
रिपोर्ट में समुद्र के तापमान को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है. फरवरी 2026 में समुद्र की सतह का औसत तापमान 20.88 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. यह फरवरी महीने के लिए अब तक का दूसरा सबसे अधिक तापमान माना गया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र का तापमान बढ़ने से तूफानों की तीव्रता और संख्या पर भी असर पड़ सकता है.
जलवायु परिवर्तन की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ता वैश्विक तापमान आने वाले समय में और गंभीर मौसम घटनाओं को जन्म दे सकता है. तेज बारिश, सूखा, बाढ़ और लू जैसी घटनाएं पहले की तुलना में ज्यादा देखने को मिल सकती हैं. इसी वजह से वैज्ञानिक लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है. यदि समय रहते प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में इसका असर पर्यावरण, कृषि और मानव जीवन पर और गहरा पड़ सकता है.