मानसून पर मंडराया खतरा: अल नीनो से मानसून रहेगा कमजोर, कई राज्यों में सूखे जैसे हालात संभव

इस बार मानसून के कमजोर होने की सबसे बड़ी वजह अल नीनो को माना जा रहा है. यह एक ऐसी स्थिति होती है जब प्रशांत महासागर का पानी गर्म हो जाता है और इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है. इसका असर मानसून की शुरुआत से ही दिख सकता है और साल के अंत तक यह और मजबूत हो सकता है.

नई दिल्ली | Updated On: 8 Apr, 2026 | 11:03 AM

Monsoon forecast: भारत में हर साल मानसून को लेकर लोगों, खासकर किसानों की नजरें टिकी रहती हैं. क्योंकि यही बारिश देश की खेती, अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी को सीधे प्रभावित करती है. लेकिन इस बार मानसून को लेकर एक चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है. निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट ने अनुमान जताया है कि इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है.

कितनी हो सकती है बारिश

स्काईमेट के अनुमान के मुताबिक इस बार मानसून औसत का करीब 94 प्रतिशत रह सकता है. भारत में जून से सितंबर तक चार महीनों में होने वाली औसत बारिश 868.6 मिमी मानी जाती है.

94 प्रतिशत का मतलब यह है कि बारिश होगी जरूर, लेकिन उतनी नहीं जितनी सामान्य तौर पर होती है. थोड़ा बहुत फर्क ऊपर-नीचे हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर संकेत यही हैं कि इस बार मानसून पूरी तरह मजबूत नहीं रहेगा.

अल नीनो क्यों बन रहा है वजह

इस बार मानसून के कमजोर होने की सबसे बड़ी वजह अल नीनो को माना जा रहा है. यह एक ऐसी स्थिति होती है जब प्रशांत महासागर का पानी गर्म हो जाता है और इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है. पिछले डेढ़ साल से ला नीना का असर था, जो आमतौर पर अच्छी बारिश से जुड़ा होता है. लेकिन अब मौसम का रुख बदल रहा है और अल नीनो बनने की संभावना बढ़ रही है. इसका असर मानसून की शुरुआत से ही दिख सकता है और साल के अंत तक यह और मजबूत हो सकता है. इसका सीधा मतलब है कि मानसून का दूसरा हिस्सा, यानी अगस्त और सितंबर, थोड़ा कमजोर और अनियमित रह सकता है.

क्या कुछ राहत भी मिल सकती है

हालांकि पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है. इंडियन ओशन डाइपोल यानी IOD एक ऐसा फैक्टर है, जो कुछ हद तक राहत दे सकता है. अगर यह सकारात्मक रहता है, तो अल नीनो के असर को थोड़ा कम कर सकता है और मानसून की शुरुआत बेहतर हो सकती है. लेकिन पूरे सीजन में बारिश एक जैसी रहेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है.

किन इलाकों में ज्यादा असर

इस बार मध्य और पश्चिम भारत के हिस्सों में बारिश कम रहने की आशंका है. पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में खासकर अगस्त-सितंबर में कम बारिश हो सकती है.

वहीं पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत के लिए तस्वीर थोड़ी बेहतर दिख रही है. वहां सामान्य या उससे थोड़ी ज्यादा बारिश हो सकती है, जिससे इन इलाकों को राहत मिल सकती है.

आंकड़े क्या बताते हैं

अगर आंकड़ों की बात करें तो इस साल ज्यादा बारिश होने की संभावना बहुत कम है. करीब 40 प्रतिशत संभावना है कि बारिश सामान्य से कम रहेगी. इतना ही नहीं, करीब 30 प्रतिशत तक संभावना सूखे जैसी स्थिति बनने की भी जताई गई है. यानी इस बार मौसम को लेकर अनिश्चितता ज्यादा है और हालात पूरी तरह अनुकूल नहीं कहे जा सकते.

खेती पर सीधा असर

भारत में कुल सालाना बारिश का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा मानसून से आता है. यही वजह है कि खेती इसके बिना अधूरी है. देश की आधी से ज्यादा कृषि उत्पादन खरीफ फसलों से आता है, जो पूरी तरह मानसून पर निर्भर होता है. अगर बारिश कम हुई तो धान, मक्का, दालें और तिलहन जैसी फसलों पर असर पड़ सकता है. इसका असर सीधे किसानों की आय और गांवों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

महंगाई भी बढ़ सकती है

कम बारिश का मतलब कम उत्पादन और कम उत्पादन का मतलब कीमतों में बढ़ोतरी. पहले भी देखा गया है कि जब मानसून कमजोर होता है, तो खाद्य महंगाई बढ़ जाती है. 2023 में भी ऐसा ही हुआ था, जब कुल बारिश औसत के करीब रही, लेकिन कई इलाकों में सूखे जैसे हालात बन गए थे और फसलें प्रभावित हुई थीं.

इस बार चिंता क्यों ज्यादा

इस बार स्थिति इसलिए और ज्यादा चिंता वाली है, क्योंकि किसानों की लागत पहले ही बढ़ चुकी है. खाद, बीज और ईंधन सब महंगे हो गए हैं. ऊपर से अंतरराष्ट्रीय हालात भी असर डाल रहे हैं. अगर ऐसे में मानसून कमजोर रहता है, तो किसानों पर दोहरी मार पड़ सकती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अब पहले से तैयारी करना जरूरी है. किसानों को पानी बचाने वाली तकनीकों और वैकल्पिक फसलों की तरफ ध्यान देना होगा. सरकार को भी सिंचाई व्यवस्था मजबूत करनी होगी और किसानों को समय पर मदद देनी होगी, ताकि नुकसान को कम किया जा सके.

Published: 8 Apr, 2026 | 10:37 AM

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