भारत-यूएस ट्रेड डील पर योगेंद्र यादव ने खोली सरकार की पोल, कहा- किसानों को अंधेरे में रखकर गुमराह किया जा रहा
India US Trade Deal: भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर किसानों के बीच चिंता बढ़ रही है. योगेंद्र यादव ने कहा कि कृषि, डेयरी और आयात शुल्क से जुड़े फैसलों का असर बाजार और किसानों की आय पर पड़ सकता है, इसलिए सरकार को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए. ताकि किसी तरह का भ्रम और डर किसानों में न फैले आगे.
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर पिछले कुछ दिनों से देश में चर्चा तेज हो गई है. सरकार की तरफ से लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस हो रही हैं, लेकिन हर बयान के बाद नए सवाल भी खड़े हो रहे हैं. खासकर किसानों के बीच यह चिंता बढ़ रही है कि इस समझौते का उनकी खेती और आमदनी पर क्या असर पड़ेगा. किसान इंडिया (Kisan India) से बातचीत में सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने इस पूरे मुद्दे को आसान भाषा में समझाते हुए कहा कि ट्रेड डील को सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि किसानों के भविष्य के नजरिए से समझने की जरूरत है. उन्होंने केंद्र सरकार का विरोध करते हुए कहा कि यह समझौता किसानों के लिए घातक साबित होगा. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में सबसे जरूरी बात यह होती है कि देश के किसानों और छोटे उत्पादकों का हित सुरक्षित रहे.
ट्रेड डील पर क्यों बढ़ रही है चिंता
योगेंद्र यादव ने आगे बताया कि भारत ने कई दशकों तक एक स्पष्ट नीति अपनाई थी कि कृषि क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय ट्रेड समझौतों से बाहर रखा जाएगा. अलग-अलग सरकारों ने इस नीति को जारी रखा था. लेकिन अब जो समझौते की बातें सामने आ रही हैं, उनसे यह संकेत मिल रहा है कि कृषि बाजार को धीरे-धीरे विदेशी उत्पादों के लिए खोला जा सकता है. उनका कहना है कि अगर कृषि बाजार का दरवाजा एक बार खुल गया, तो भविष्य में इसे और ज्यादा खोलने का दबाव बढ़ सकता है. यही वजह है कि किसान संगठनों में चिंता दिखाई दे रही है. उन्होंने कहा कि सरकार को साफ-साफ बताना चाहिए कि इस डील में कृषि क्षेत्र को लेकर क्या-क्या शर्तें तय की गई हैं और किसानों की सुरक्षा के लिए कौन-सी व्यवस्था की गई है.
आयात शुल्क घटाने से किसानों पर असर
ट्रेड डील को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा कृषि और खाद्य उत्पादों पर आयात शुल्क (टैरिफ) कम करने को लेकर हो रही है. माना जा रहा है कि सूखे मेवे, फल और प्रोसेस्ड फूड जैसे कुछ उत्पादों पर शुल्क घटाया या खत्म किया जा सकता है. योगेंद्र यादव का कहना है कि अगर विदेशी उत्पाद सस्ते दाम पर भारतीय बाजार में आने लगते हैं, तो इससे स्थानीय किसानों की फसलों के दाम पर दबाव पड़ सकता है. उदाहरण के लिए, अमेरिका से सस्ते सेब आने पर हिमाचल प्रदेश और कश्मीर के बागवानों को नुकसान हो सकता है.
इसी तरह अंगूर से जुड़े उत्पादों के आयात से महाराष्ट्र के किसानों पर असर पड़ सकता है. प्रोसेस्ड फूड के आयात से सब्जी और फल उत्पादकों की कमाई प्रभावित हो सकती है. उनका कहना है कि इसका असर तुरंत नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बाजार की कीमतों में बदलाव के रूप में दिखाई दे सकता है.
मक्का और सोयाबीन को लेकर सबसे ज्यादा सवाल
इस ट्रेड डील में एनिमल फीड और तेल से जुड़े उत्पादों को लेकर भी चर्चा तेज है. योगेंद्र यादव का कहना है कि अगर अमेरिका से DDGS (एनिमल फीड) का आयात शुरू होता है, तो इसका सीधा असर मक्का की मांग पर पड़ सकता है. भारत में पिछले कुछ वर्षों में मक्का का उत्पादन तेजी से बढ़ा है, क्योंकि इसका इस्तेमाल पोल्ट्री फार्म और पशुपालन में बड़े पैमाने पर होता है.
ऐसे में यदि विदेशी फीड सस्ते दाम पर आने लगे, तो देश में मक्का के दाम गिर सकते हैं और किसानों की आय प्रभावित हो सकती है. इसी तरह सोयाबीन और सोया ऑयल को लेकर भी चिंता जताई जा रही है. उनका कहना है कि अगर सस्ता आयातित सोया तेल बाजार में आता है, तो घरेलू सोयाबीन मिलों और किसानों को नुकसान हो सकता है. उन्होंने कहा कि मंडियों में पहले से ही कीमतों को लेकर अनिश्चितता का माहौल बनता दिखाई दे रहा है.
अमेरिकी सस्ता एनिमल फीड घरेलू मक्का किसानों को नुकसान पहुंचाएगा- योगेंद्र यादव
डेयरी और एग्रीकल्चर उत्पादों पर संभावित असर
डेयरी सेक्टर को लेकर भी किसान संगठनों में चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है. भारत दुनिया के सबसे बड़े दूध उत्पादक देशों में गिना जाता है और इस क्षेत्र से सीधे-सीधे करोड़ों ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है. छोटे और मध्यम पशुपालक रोजाना दूध बेचकर ही अपने घर का खर्च चलाते हैं. योगेंद्र यादव का कहना है कि अगर किसी ट्रेड डील के तहत डेयरी बाजार विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिया जाता है, तो सस्ते आयातित डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में आ सकते हैं. इससे स्थानीय दूध उत्पादकों को कीमतों में गिरावट का सामना करना पड़ सकता है. खासकर छोटे पशुपालकों पर इसका असर ज्यादा होगा, क्योंकि उनके पास लागत झेलने की क्षमता कम होती है.
हालांकि अभी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि डेयरी सेक्टर को कितनी छूट दी जाएगी, लेकिन किसान संगठनों की मांग है कि सरकार इस क्षेत्र को लेकर स्पष्ट और ठोस आश्वासन दे. उनका मानना है कि डेयरी और कृषि ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव हैं, इसलिए किसी भी समझौते में इनकी सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
किसान संगठनों का विरोध और राजनीतिक प्रतिक्रिया
भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर किसान संगठनों ने विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है. संयुक्त किसान मोर्चा सहित कई संगठनों का कहना है कि यह समझौता किसानों के हितों के खिलाफ जा सकता है और इससे खेती से जुड़ी आमदनी पर असर पड़ने की आशंका है. योगेंद्र यादव ने कहा कि इससे पहले कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने लंबे समय तक आंदोलन किया था और जरूरत पड़ने पर किसान फिर से संगठित होकर अपनी आवाज उठा सकते हैं.
उनका मानना है कि किसान अपने हितों को लेकर जागरूक हैं और किसी भी बड़े फैसले पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को संसद में उठाया है, लेकिन असली विरोध अक्सर सड़क पर दिखाई देता है. आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि राजनीतिक दल और किसान संगठन इस मुद्दे पर कितना सक्रिय रुख अपनाते हैं.
आगे क्या हो सकता है
योगेंद्र यादव ने बताया कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील अभी पूरी तरह अंतिम रूप में नहीं आई है और दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है. ऐसे में उन्होंने कहा कि इस समय सबसे ज्यादा जरूरत पारदर्शिता की है. उनका मानना है कि सरकार को किसानों और आम लोगों के सामने साफ-साफ जानकारी रखनी चाहिए, ताकि किसी तरह का भ्रम न रहे.
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इस समझौते में कौन-कौन से कृषि और खाद्य उत्पाद शामिल होंगे, किन वस्तुओं पर शुल्क घटेगा या बढ़ेगा, और किसानों की सुरक्षा के लिए कौन से ठोस कदम उठाए जाएंगे. साथ ही यह भी बताया जाना चाहिए कि बाजार की कीमतों पर इसका संभावित असर कितना पड़ सकता है. उनका कहना है कि जब तक पूरी और साफ जानकारी सामने नहीं आएगी, तब तक किसानों के बीच चिंता बनी रहेगी. सही और स्पष्ट जानकारी मिलने से डर और अफवाह दोनों कम हो सकते हैं.