चीनी मिलों ने सरकार से जूट वर्ष 2026-27 में चीनी की अनिवार्य जूट पैकेजिंग से पूरी तरह छूट देने की मांग की है. मिलर्स का कहना है कि जूट की बोरियों में चीनी की पैकिंग से स्वास्थ्य और गुणवत्ता से जुड़े जोखिम हैं. इसके अलावा इससे चीनी उद्योग पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है, जिसका असर 5 करोड़ से ज्यादा गन्ना किसानों पर पड़ सकता है. मिल मालिकों ने मांग की है कि जब तक किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति की ओर से इस मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक चीनी की अनिवार्य जूट पैकेजिंग पर रोक लगाई जाए. सरकार हर साल मांग और आपूर्ति को ध्यान में रखते हुए तय करती है कि चीनी की बोरियों में कितने प्रतिशत जूट और कितने प्रतिशत PPV पैकेजिंग का इस्तेमाल किया जाएगा. यह फैसला जूट पैकेजिंग सामग्री (वस्तुओं की पैकिंग में अनिवार्य उपयोग) अधिनियम, 1987 की धारा 4 के तहत लिया जाता है.
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (NFCSF) ने सरकार से चीनी की जूट की बोरियों में अनिवार्य पैकेजिंग से 100 फीसदी छूट देने की मांग की है. दोनों संगठनों ने संयुक्त बयान में कहा कि जूट की पैकेजिंग से चीनी की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं की सेहत पर खतरा हो सकता है. संगठनों का दावा है कि जूट की बोरियों को तैयार करने में जूट बैचिंग ऑयल (JBO) का इस्तेमाल होता है. यह पेट्रोलियम आधारित पदार्थ है और इसमें मौजूद कुछ रसायनों को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना गया है. उनका कहना है कि इसके अवशेष चीनी में पहुंच सकते हैं, जिससे उपभोक्ताओं, खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए जोखिम पैदा हो सकता है.
SAC ने जूट पैकेजिंग पर घटाई अनिवार्यता
इन चिंताओं को देखते हुए अक्टूबर 2025 में स्टैंडिंग एडवाइजरी कमेटी (SAC) ने इस मामले की स्वतंत्र विशेषज्ञों से जांच कराने का आदेश दिया था. इस अध्ययन में AIIMS, FSSAI, BIS और जूट कमिश्नर कार्यालय के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है. ISMA के मुताबिक, स्वतंत्र विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक स्टैंडिंग एडवाइजरी कमेटी (SAC) ने चीनी की अनिवार्य जूट पैकेजिंग की सीमा 20 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी कर दी थी. संगठन का कहना है कि यह फैसला भी इस बात को दिखाता है कि मौजूदा पैकेजिंग नियमों पर दोबारा विचार करने की जरूरत है.
महंगी जूट पैकेजिंग से बढ़ी चीनी उद्योग की लागत
ISMA ने कहा कि चीनी नमी जल्दी सोखती है, जबकि जूट की बोरियां नमी रोककर रखती हैं. इससे चीनी में गांठ बनने, जमने और उसकी शेल्फ लाइफ कम होने की समस्या हो सकती है. इसके अलावा जूट की बोरियां दूसरे विकल्पों के मुकाबले करीब 2.5 से 3 गुना महंगी हैं. इससे उद्योग पर हर साल करीब 800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च पड़ रहा है. वहीं, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) ने भी अनिवार्य जूट पैकेजिंग व्यवस्था को लेकर चिंता जताई है. बताया गया है कि इस व्यवस्था के कारण शॉपिंग बैग और होम डेकोर जैसे ज्यादा मूल्य वाले दूसरे उत्पादों के लिए पर्याप्त जूट उपलब्ध नहीं हो पाता.
चीनी की जूट पैकेजिंग पर मिलर्स सख्त
ISMA के डायरेक्टर जनरल दीपक बल्लानी ने कहा कि जूट बैचिंग ऑयल (JBO) में मौजूद हानिकारक रसायनों को लेकर वैज्ञानिक और कानूनी स्तर पर पर्याप्त सबूत सामने आ चुके हैं. उन्होंने कहा कि चीनी हर घर में इस्तेमाल होती है और बच्चों तक इसकी पहुंच है. ऐसे में जब तक स्टैंडिंग एडवाइजरी कमेटी (SAC) के निर्देश पर चल रहा स्वतंत्र अध्ययन पूरा नहीं हो जाता, तब तक पेट्रोलियम आधारित JBO से उपचारित जूट की बोरियों में चीनी की पैकिंग जारी रखना उचित नहीं है. वहीं, NFCSF के मैनेजिंग डायरेक्टर प्रकाश नाइकनावरे ने कहा कि चीनी को अनिवार्य जूट पैकेजिंग से छूट देने से उत्पाद की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं की सेहत की सुरक्षा होगी. साथ ही, इससे कच्चे जूट का इस्तेमाल शॉपिंग बैग और अन्य वैल्यू-एडेड उत्पादों के लिए बढ़ाया जा सकेगा, जिससे जूट उद्योग को लंबे समय में फायदा मिल सकता है.