Himachal Apple Price: हिमाचल प्रदेश के सेब किसानों के लिए इस साल का मौसम आसान नहीं रहा. कई इलाकों में फूल आने के समय बारिश, ओलावृष्टि और ठंड ने फसल को नुकसान पहुंचाया. इसका असर अब सेब के उत्पादन पर साफ दिखाई दे रहा है. कई बागों में फल उम्मीद से काफी कम आए हैं. दूसरी तरफ मजदूरी, खाद, दवाइयों, पैकिंग और ढुलाई का खर्च बढ़ने से किसानों की कमाई पर भी दबाव बढ़ गया है. हालांकि, अच्छी क्लाविटी वाले सेब को शिमला की ढल्ली मंडी में 20 किलो की पेटी के लिए करीब 3,000 से 3,500 रुपये तक का भाव मिल रहा है. किसानों के लिए यह भाव फिलहाल संतोषजनक है, लेकिन उनका कहना है कि बढ़ते खर्च को देखते हुए लंबे समय तक अच्छे और स्थिर भाव मिलना जरूरी है.
फूल आने के समय बिगड़ा मौसम
सेब की फसल के लिए फूल आने का समय बेहद अहम होता है. इसी दौरान इस साल मौसम बार-बार बदला. कई जगह बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और ठंड पड़ने से पेड़ों के फूल खराब हो गए. इसका सीधा असर फल बनने पर पड़ा. ANI की रिपोर्ट के अनुसार, शिमला जिले के रत्नारी गांव के किसान दौलत राम ने बताया कि, शुरुआत में बागों में अच्छी फसल की उम्मीद थी. लेकिन मौसम खराब होने के बाद कई पेड़ों पर फल कम लगे. निचले और मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों में नुकसान ज्यादा देखने को मिला है. हालांकि कुछ ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फसल की स्थिति बेहतर बताई जा रही है.
अच्छे सेब को मिल रहा बेहतर भाव
ढल्ली मंडी में इन दिनों सेब के भाव उसकी क्लाविटी के हिसाब से अलग-अलग हैं. अच्छी क्लाविटी वाले सेब के 20 किलो के डिब्बे पर करीब 3,000 से 3,500 रुपये तक का भाव मिल रहा है. वहीं छोटे और कम क्लाविटी वाले सेब को काफी कम कीमत मिल रही है. किसानों का कहना है कि मंडी में अच्छा भाव मिलना राहत की बात है, लेकिन केवल भाव देखकर मुनाफे का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. पूरे साल बाग में मजदूर लगाने, खाद और दवाइयां खरीदने, पेटियां तैयार करने और सेब को मंडी तक पहुंचाने में काफी पैसा खर्च होता है.
छोटे किसानों की परेशानी ज्यादा
कम उत्पादन और बढ़ती लागत के बीच छोटे बागवानों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं. किसानों ने सरकारी बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत मिलने वाले भुगतान में देरी का मुद्दा भी उठाया है. उनका कहना है कि कुछ छोटे किसान अभी पिछले मौसम की उपज का भुगतान मिलने का इंतजार कर रहे हैं. छोटे किसानों के पास बड़े बागवानों की तरह आर्थिक संसाधन नहीं होते. इसलिए समय पर भुगतान और उचित मंडी भाव उनके लिए बेहद जरूरी है.
छोटे सेबों की मांग कमजोर
इस साल कई इलाकों में सेब का आकार भी सामान्य से छोटा बताया जा रहा है. छोटे आकार के सेब को स्थानीय बाजार में अलग नाम से बेचा जाता है और इसका भाव आमतौर पर कम रहता है. इससे उन किसानों को ज्यादा नुकसान हो रहा है जिनके बागों में बड़े आकार के फल कम आए हैं.
व्यापारियों के सामने भी चुनौती
सेब के बढ़े हुए खरीद भाव से व्यापारियों की परेशानी भी बढ़ी है. व्यापारियों के मुताबिक पिछले साल अच्छी क्लाविटी वाले सेब का एक डिब्बा करीब 1,800 से 2,000 रुपये में खरीदा जा रहा था, जबकि इस साल यही भाव करीब 2,800 से 3,000 रुपये तक पहुंच गया है. लेकिन दूसरी ओर बाहर के बाजारों में मांग उतनी मजबूत नहीं है. उत्तर प्रदेश जैसे बाजारों में महंगे सेब को बेचना चुनौती बन रहा है. कश्मीर से आने वाले सेब का असर भी बाजार पर पड़ रहा है. ऐसे में इस साल हिमाचल के सेब किसानों के लिए कम उत्पादन, बढ़ती लागत और बाजार की अनिश्चितता बड़ी चुनौती बनी हुई है. अच्छी क्लाविटी वाले सेब को बेहतर भाव मिलना राहत जरूर दे रहा है, लेकिन किसानों की असली चिंता लागत निकालने के बाद बचने वाली कमाई को लेकर है.