Broken Rice Auction 2026: केंद्र सरकार ने जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही के लिए टूटे चावल की बिक्री का रिजर्व प्राइस 2,100 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है. सरकार यह बिक्री ओपन मार्केट सेल स्कीम-डोमेस्टिक (OMSS-D) के तहत करेगी. इसका मकसद बाजार में चावल की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव को रोकना है. भारतीय खाद्य निगम (FCI) ई-नीलामी के जरिए इन सरकारी स्टॉक को खुले बाजार में बेचता है.
क्या है OMSS-D और क्यों होती है बिक्री?
OMSS-D सरकार की एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके जरिए सरकारी गोदामों में रखे अनाज का कुछ हिस्सा खुले बाजार में उतारा जाता है. जब बाजार में किसी अनाज की कीमत बढ़ने का दबाव बनता है या सप्लाई को लेकर चिंता होती है, तब सरकार अपने बफर स्टॉक का इस्तेमाल करती है. बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय खाद्य निगम (FCI) ई-नीलामी के जरिए इस स्टॉक की बिक्री करेगा.
इस व्यवस्था के तहत निजी खरीदार FCI की ई-नीलामी में हिस्सा लेकर चावल खरीद सकते हैं. टूटे चावल के लिए 2,100 रुपये प्रति क्विंटल का रिजर्व प्राइस तय होने का मतलब है कि सरकारी स्टॉक की नीलामी में इससे कम शुरुआती कीमत पर बिक्री नहीं होगी.
बाजार और चावल से जुड़े कारोबार पर क्या असर?
सरकार की इस पहल पर चावल से जुड़े कारोबारी और उद्योग नजर रखते हैं, क्योंकि सरकारी बिक्री का असर बाजार में उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है. चावल का इस्तेमाल सिर्फ खाने के लिए ही नहीं होता, बल्कि फूड प्रोसेसिंग और पशु आहार जैसे कई क्षेत्रों में भी किया जाता है. हालांकि, सरकारी रिजर्व प्राइस और खुले बाजार की कीमत के बीच बड़ा अंतर होने पर नीलामी में खरीदारों की दिलचस्पी कम हो सकती है. अगर किसी इलाके में नई फसल की आवक ज्यादा है और बाजार भाव पहले से ही कम चल रहा है, तो कारोबारी सरकारी स्टॉक खरीदने के बजाय स्थानीय बाजार से खरीदारी को प्राथमिकता दे सकते हैं.
सरकार क्यों रखती है अलग-अलग कीमतें?
सरकार अलग-अलग तरह के चावल और उनके इस्तेमाल के हिसाब से अलग कीमतें तय करती है. इसका मकसद सिर्फ बाजार में अनाज की सप्लाई बनाए रखना नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और दूसरी सरकारी योजनाओं के बीच संतुलन बनाना भी है. उदाहरण के लिए, एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले अनाज की कीमत का ढांचा अलग हो सकता है. एथेनॉल फीडस्टॉक के लिए अक्टूबर 2026 तक 2,320 रुपये प्रति क्विंटल की दर तय है. इससे साफ है कि सरकार खाद्य जरूरतों के साथ-साथ एथेनॉल ब्लेंडिंग जैसे लक्ष्यों को भी ध्यान में रखकर अनाज की कीमतों को मैनेज करती है.
आगे किन बातों पर रहेगी नजर?
आने वाले महीनों में सरकारी ई-नीलामी में कितनी खरीदारी होती है और खुले बाजार में चावल के भाव किस दिशा में जाते हैं, यह अहम रहेगा. इसके अलावा मॉनसून की स्थिति, अलग-अलग राज्यों में फसल की पैदावार और बाजार में नई फसल की आवक भी कीमतों को प्रभावित कर सकती है.
सरकार कुछ ज्यादा उत्पादन वाले राज्यों को विशेष नीलामी से बाहर रखकर किसी एक इलाके में जरूरत से ज्यादा सरकारी स्टॉक आने से भी बचने की कोशिश करती है. वहीं, भविष्य में मौसम में बड़े बदलाव या उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ती है तो सरकार रिजर्व प्राइस, बिक्री या निर्यात से जुड़े फैसलों में बदलाव कर सकती है.