Papaya Farming: बरसात का मौसम पपीते की खेती के लिए जितना अनुकूल माना जाता है, उतना ही यह रोगों का खतरा भी बढ़ा देता है. डॉ. रजनीश मिश्रा, संयुक्त निदेशक (बागवानी) के अनुसार, जल निकासी, संतुलित सिंचाई और समय पर रोग नियंत्रण अपनाकर किसान गलुआ रोग से फसल को सुरक्षित रखते हुए बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं.
पपीता एक ऐसी फल फसल है जिसकी बाजार में पूरे वर्ष मांग बनी रहती है. यही वजह है कि बड़ी संख्या में किसान इसकी व्यावसायिक खेती कर रहे हैं. लेकिन मानसून के दौरान खेत में पानी भरने से जड़ों में सड़न और फफूंदजनित रोग तेजी से फैल सकते हैं. यदि शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए तो पूरा पौधा नष्ट होने का खतरा रहता है. विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ी सी सावधानी और वैज्ञानिक प्रबंधन से इस नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है.
बरसात में सबसे बड़ा खतरा है गलुआ रोग
डॉ. रजनीश मिश्रा के अनुसार, लगातार बारिश और खेत में पानी रुकने से पपीते के पौधों में गलुआ रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है. इस बीमारी की शुरुआत पत्तियों के पीला पड़ने से होती है, फिर पत्तियां झड़ने लगती हैं और धीरे-धीरे तना व जड़ प्रभावित हो जाते हैं. रोग बढ़ने पर पौधे के आधार भाग में सड़न और सफेद फफूंद दिखाई देने लगती है. समय पर उपचार न मिलने पर पूरा पौधा सूख सकता है.
जल निकासी और सिंचाई का रखें विशेष ध्यान
विशेषज्ञों का कहना है कि पपीते की खेती में सबसे महत्वपूर्ण प्रबंधन पानी का संतुलन है. पौधे को न तो अधिक पानी चाहिए और न ही लंबे समय तक सूखी स्थिति. बरसात में खेत में अतिरिक्त पानी जमा होने पर तुरंत निकासी की व्यवस्था करें. इसके लिए ऊंची मेड़, नालियां और ढलान वाली क्यारियां बनाना लाभदायक रहता है. इससे जड़ों तक ऑक्सीजन पहुंचती है और सड़न का खतरा कम होता है.
ड्रिप सिंचाई से मिलेगा बेहतर परिणाम
डॉ. रजनीश मिश्रा के अनुसार, पपीते में ड्रिप सिंचाई अपनाना किसानों के लिए लाभकारी विकल्प है. इससे पौधे की जरूरत के अनुसार ही पानी दिया जाता है, जिससे जलभराव नहीं होता और पानी की बचत भी होती है. मौसम के अनुसार सिंचाई की मात्रा तय करने से पौधों की वृद्धि बेहतर रहती है और रोग लगने की संभावना कम हो जाती है.
शुरुआती लक्षण दिखते ही करें वैज्ञानिक उपचार
यदि पौधों में पत्तियां पीली पड़ना, झड़ना या जड़ के पास सड़न दिखाई दे तो तुरंत रोग नियंत्रण की कार्रवाई करनी चाहिए. विशेषज्ञों के अनुसार, आवश्यकता पड़ने पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड जैसे फफूंदनाशी का उपयोग निर्धारित मात्रा में जड़ों के आसपास किया जा सकता है. किसी भी कृषि रसायन का प्रयोग कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही करें. साथ ही खेत का नियमित निरीक्षण करते रहें, ताकि बीमारी फैलने से पहले ही उसे नियंत्रित किया जा सके. विशेषज्ञों का मानना है कि रेड लेडी सहित उन्नत किस्मों के साथ वैज्ञानिक जल प्रबंधन अपनाकर किसान बरसात में भी पपीते की स्वस्थ फसल तैयार कर सकते हैं और बेहतर बाजार भाव का लाभ उठा सकते हैं.