जनवरी में 42 प्रतिशत गिरा भारत का ऑयलमील निर्यात, सोयाबीन और सरसों खली की भी मांग घटी

केवल जनवरी ही नहीं, बल्कि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की अप्रैल से जनवरी अवधि में भी ऑयलमील निर्यात में करीब 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. इस अवधि में कुल 32.35 लाख टन निर्यात हुआ, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 36.03 लाख टन था. यह संकेत देता है कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने और घरेलू आपूर्ति पर असर पूरे वर्ष पड़ा है.

नई दिल्ली | Updated On: 19 Feb, 2026 | 07:19 AM

oilmeal exports: भारत के कृषि निर्यात क्षेत्र के लिए जनवरी महीना खासा चुनौतीपूर्ण रहा. ताजा आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 में देश से ऑयलमील (तेल निकासी के बाद बची खली) का निर्यात करीब 42 प्रतिशत से अधिक घट गया. सोयाबीन मील और रेपसीड (सरसों) मील की शिपमेंट में लगभग आधी कमी दर्ज की गई, जिससे निर्यातकों और प्रोसेसिंग उद्योग की चिंता बढ़ गई है.

पिछले साल जनवरी 2025 में जहां भारत ने 4.52 लाख टन ऑयलमील का निर्यात किया था, वहीं इस साल जनवरी 2026 में यह घटकर 2.60 लाख टन रह गया. यह गिरावट अचानक आई और मुख्य रूप से सोयाबीन मील व सरसों मील के कम निर्यात की वजह से देखी गई.

सोयाबीन और सरसों मील में बड़ी गिरावट

जनवरी 2026 में सोयाबीन मील का निर्यात 2.86 लाख टन से घटकर केवल 1.32 लाख टन रह गया. इसी तरह सरसों मील (रेपसीड मील) का निर्यात भी 1.31 लाख टन से घटकर लगभग 64,782 टन पर सिमट गया. यानी दोनों प्रमुख उत्पादों में लगभग 50 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई.

विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के महीनों में सरसों की पेराई (क्रशिंग) कम होने से तेल और मील दोनों का उत्पादन सीमित रहा. नई फसल की आपूर्ति फरवरी-मार्च से शुरू होने की उम्मीद है, जिसके बाद स्थिति में सुधार संभव है.

अप्रैल-जनवरी अवधि में भी निर्यात कमजोर

केवल जनवरी ही नहीं, बल्कि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की अप्रैल से जनवरी अवधि में भी ऑयलमील निर्यात में करीब 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. इस अवधि में कुल 32.35 लाख टन निर्यात हुआ, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 36.03 लाख टन था. यह संकेत देता है कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने और घरेलू आपूर्ति संबंधी चुनौतियों का असर पूरे वर्ष पड़ा है.

कीमतों में उतार-चढ़ाव

सरसों मील की कीमतों में भी हाल के महीनों में बदलाव देखा गया है. कांडला बंदरगाह पर भारतीय सरसों मील की औसत कीमत लगभग 20,300 रुपये प्रति टन बताई जा रही है. नवंबर-दिसंबर 2025 में यह करीब 18,500 रुपये प्रति टन थी, जबकि जनवरी में यह 21,617 रुपये तक पहुंच गई थी.

अंतरराष्ट्रीय बाजार की बात करें तो भारतीय सरसों मील की कीमत लगभग 235 डॉलर प्रति टन (FAS कांडला) है, जबकि यूरोपीय संघ की मिलों से निकलने वाली सरसों मील करीब 276 डॉलर प्रति टन पर कोट की जा रही है. कीमतों के इस अंतर से भारत को कुछ बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिल सकती है, लेकिन कुल मांग में कमी का असर साफ दिखाई दे रहा है.

सोयाबीन मील में ‘प्राइस डेफिशिएंसी स्कीम’ का असर

सोयाबीन क्षेत्र में मध्य प्रदेश सरकार की ‘भावांतर भुगतान योजना’ ने अहम भूमिका निभाई. इस योजना के तहत किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार मूल्य के अंतर की भरपाई की गई, जिससे उन्हें एमएसपी का लाभ मिला, जबकि उद्योग को कच्चा माल बाजार कीमत पर उपलब्ध होता रहा.

इस व्यवस्था से किसानों और उद्योग दोनों को फायदा हुआ. मौजूदा खरीफ सीजन में दिसंबर तक लगभग 16 लाख टन सोयाबीन मील इस योजना के माध्यम से बाजार में आया. इससे क्रशिंग और निर्यात को सहारा मिला, हालांकि वैश्विक मांग में कमजोरी के कारण कुल निर्यात फिर भी घट गया.

प्रमुख आयातक देशों का रुख

दक्षिण कोरिया ने अप्रैल-जनवरी 2025-26 के दौरान भारत से 3.15 लाख टन ऑयलमील आयात किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में कम है. इसमें सरसों मील, कैस्टरसीड मील और सोयाबीन मील शामिल रहे.

चीन ने इस अवधि में 7.18 लाख टन ऑयलमील आयात किया, जिसमें अधिकांश हिस्सा सरसों मील का था. बांग्लादेश ने भी 3.33 लाख टन आयात किया, लेकिन यह भी पिछले वर्ष की तुलना में कम रहा. इसके अलावा जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों ने भारतीय सोयाबीन मील की खरीद जारी रखी, जो भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता पर भरोसे को दर्शाता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि नई फसल की आमद और वैश्विक मांग में सुधार से आने वाले महीनों में निर्यात में कुछ बढ़त देखने को मिल सकती है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अर्जेंटीना, ब्राजील और यूरोपीय देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी.

Published: 19 Feb, 2026 | 07:19 AM

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