भारत ने घटाई पाम ऑयल खरीद, आयात गिरकर 3 महीने के निचले स्तर पर, किसानों को मिल सकता है फायदा

महंगे कच्चे पाम ऑयल के कारण रिफाइनिंग मार्जिन भी नकारात्मक असर हुआ है. यानी कंपनियों के लिए आयात करके तेल बनाना पहले जितना लाभकारी नहीं रह गया है. इसी कारण कई कंपनियों ने आयात कम कर दिया और कीमतों के स्थिर होने का इंतजार करना बेहतर समझा.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 3 Apr, 2026 | 01:57 PM

Palm oil imports 2026: भारत में खाद्य तेल के बाजार में मार्च 2026 के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला. पाम ऑयल का आयात अचानक घट गया और यह तीन महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतें हैं, जिनका असर सीधे भारत के आयात पर पड़ा है. इस बदलाव का असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे किसानों और घरेलू बाजार पर भी असर पड़ सकता है.

पाम ऑयल आयात में तेज गिरावट

इकोनॉमिक्स टाइम्स की खबर के अनुसार, मार्च महीने में भारत ने करीब 6.89 लाख टन पाम ऑयल आयात किया, जो फरवरी के 8.47 लाख टन के मुकाबले लगभग 19 प्रतिशत कम है. यह गिरावट दिसंबर 2025 के बाद सबसे कम स्तर को दर्शाती है. विशेषज्ञों का मानना है कि जब कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो रिफाइनर खरीद कम कर देते हैं और बाजार के स्थिर होने का इंतजार करते हैं.

कुल खाद्य तेल आयात भी घटा

पाम ऑयल के साथ-साथ कुल खाद्य तेल आयात में भी गिरावट दर्ज की गई. मार्च में भारत का कुल खाद्य तेल आयात करीब 11.8 लाख टन रहा, जो फरवरी के मुकाबले लगभग 9 प्रतिशत कम है. यह अप्रैल 2025 के बाद सबसे कम स्तर माना जा रहा है. इसका मतलब साफ है कि बाजार में महंगे तेलों के कारण मांग में कमी आई है और आयातकों ने खरीद सीमित कर दी है.

सोयाबीन और सूरजमुखी तेल का ट्रेंड

जहां पाम ऑयल की मांग घटी, वहीं अन्य तेलों का अलग रुख देखने को मिला. सोयाबीन तेल का आयात मार्च में 3 प्रतिशत घटकर 2.9 लाख टन रह गया. लेकिन इसके विपरीत सूरजमुखी तेल का आयात 36.3 प्रतिशत बढ़कर 1.98 लाख टन तक पहुंच गया. इससे यह साफ होता है कि बाजार में विकल्पों की तलाश बढ़ रही है और व्यापारी अलग-अलग तेलों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

कीमतों में उछाल बना वजह

पाम ऑयल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी इस गिरावट की मुख्य वजह है. मार्च में मलेशियाई पाम ऑयल फ्यूचर्स में करीब 19.47 प्रतिशत की बढ़त देखी गई, जो अप्रैल 2022 के बाद सबसे बड़ी मासिक बढ़ोतरी है.

इस बढ़ोतरी के पीछे ऊर्जा बाजार में तेजी और पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव को बड़ा कारण माना जा रहा है. जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो बायोडीजल की मांग भी बढ़ती है, जिससे पाम ऑयल की कीमतों पर असर पड़ता है.

रिफाइनिंग मार्जिन पर भी असर

महंगे कच्चे पाम ऑयल के कारण रिफाइनिंग मार्जिन भी नकारात्मक असर हुआ है. यानी कंपनियों के लिए आयात करके तेल बनाना पहले जितना लाभकारी नहीं रह गया है. इसी कारण कई कंपनियों ने आयात कम कर दिया और कीमतों के स्थिर होने का इंतजार करना बेहतर समझा.

घरेलू बाजार को मिल सकता है सहारा

आयात में कमी का एक सकारात्मक पहलू भी है. जब विदेशी तेल कम आता है, तो घरेलू तिलहन फसलों जैसे सरसों और सोयाबीन की मांग बढ़ सकती है. इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना बनती है. इसके अलावा, नए सीजन की सरसों फसल बाजार में आ रही है, जिससे आयात पर दबाव और कम हुआ है.

सप्लाई और आयात का संतुलन

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, खासकर पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है. वहीं सोयाबीन और सूरजमुखी तेल अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन से आयात किए जाते हैं. मार्च में नेपाल के जरिए भी करीब 60,000 टन खाद्य तेल (मुख्य रूप से सोयाबीन तेल) भारत आया, जो आंकड़ों में शामिल नहीं है.

अगर कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो आने वाले महीनों में भी आयात दबाव में रह सकता है. हालांकि, स्टॉक कम होने के कारण भारत को बाद में ज्यादा आयात करना पड़ सकता है.

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