रुपये की गिरावट से सस्ती हुई भारतीय चीनी, एक हफ्ते में 1 लाख टन निर्यात के सौदे तय

इस साल 2026 में भारतीय रुपया करीब 4.5 प्रतिशत गिरकर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है. इसका असर यह हुआ कि विदेशों में चीनी बेचने पर मिलों को ज्यादा पैसा मिलने लगा है. जब रुपया कमजोर होता है, तो निर्यात करने वाली कंपनियों को डॉलर में भुगतान मिलता है, जो रुपये में बदलने पर ज्यादा मूल्य देता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 23 Mar, 2026 | 03:27 PM

Sugar exports: देश के चीनी उद्योग के लिए लंबे समय बाद राहत भरी खबर सामने आई है. कमजोर होते रुपये और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती चीनी की कीमतों ने भारतीय शुगर मिलों को फिर से निर्यात की ओर आकर्षित कर दिया है. हालात ऐसे बने हैं कि पिछले एक हफ्ते में ही करीब 1 लाख टन चीनी के निर्यात सौदे हो चुके हैं, जो पिछले कई हफ्तों की सुस्ती के बाद बड़ी तेजी मानी जा रही है.

बिजनेसलाइन की खबर के अनुसार, पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने वैश्विक बाजार की दिशा बदल दी है, जिसका सीधा फायदा भारत के चीनी उद्योग को मिल रहा है.

कमजोर रुपये ने बढ़ाई निर्यात की कमाई

इस साल 2026 में भारतीय रुपया करीब 4.5 प्रतिशत गिरकर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है. इसका असर यह हुआ कि विदेशों में चीनी बेचने पर मिलों को ज्यादा पैसा मिलने लगा है. जब रुपया कमजोर होता है, तो निर्यात करने वाली कंपनियों को डॉलर में भुगतान मिलता है, जो रुपये में बदलने पर ज्यादा मूल्य देता है. यही वजह है कि अब मिलों को घरेलू बाजार के मुकाबले विदेशों में चीनी बेचना ज्यादा फायदे का सौदा लग रहा है.

वैश्विक कीमतों में उछाल से बढ़ी मांग

अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतें पिछले पांच महीनों के उच्च स्तर के करीब पहुंच गई हैं. इसका कारण पश्चिम एशिया का संकट और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं. कच्चा तेल महंगा होने से एथेनॉल की मांग बढ़ने की उम्मीद है. ऐसे में ब्राजील जैसे बड़े गन्ना उत्पादक देश अपनी ज्यादा गन्ना फसल एथेनॉल बनाने में लगा सकते हैं, जिससे वैश्विक बाजार में चीनी की आपूर्ति कम हो सकती है. यही वजह है कि कीमतें ऊपर जा रही हैं.

किन देशों से मिल रहे हैं ऑर्डर

भारतीय चीनी इस समय लगभग 450 डॉलर प्रति टन (FOB) के भाव पर ऑफर की जा रही है. श्रीलंका, जिबूती, तंजानिया और सोमालिया जैसे देशों ने अप्रैल और मई के लिए ऑर्डर देना शुरू कर दिया है. इसके अलावा अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और मध्य पूर्व के देशों से भी आने वाले समय में मांग बढ़ने की संभावना जताई जा रही है.

अब तक कितना हुआ निर्यात

इस सीजन (सितंबर तक) में अब तक करीब 5.5 लाख टन चीनी के निर्यात के लिए सौदे हो चुके हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो कुल निर्यात 15 लाख टन तक पहुंच सकता है. सरकार ने भी फरवरी में चीनी निर्यात कोटा बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया था, लेकिन अभी तक इसका पूरा उपयोग नहीं हो पाया है.

लॉजिस्टिक दिक्कतें बनी चुनौती

हालांकि निर्यात के मौके बढ़े हैं, लेकिन कुछ समस्याएं अभी भी सामने हैं. कंटेनर की कमी और बढ़ती ढुलाई लागत (फ्रेट) के कारण निर्यात में रुकावट आ रही है. व्यापारियों का कहना है कि मांग तो अच्छी है, लेकिन माल समय पर भेजना मुश्किल हो रहा है. इसके बावजूद भारतीय चीनी एशियाई बाजारों के लिए आकर्षक बनी हुई है, क्योंकि यहां से भेजने का खर्च ब्राजील के मुकाबले कम है.

विशेषज्ञों के मुताबिक अगर पश्चिम एशिया का संकट जारी रहता है और वैश्विक कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारतीय चीनी उद्योग को और फायदा मिल सकता है. कमजोर रुपये और बढ़ती मांग का यह मेल मिलों के लिए कमाई का अच्छा मौका बन सकता है. हालांकि लॉजिस्टिक समस्याओं को जल्द सुलझाना जरूरी होगा, ताकि इस मौके का पूरा फायदा उठाया जा सके.

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