India–US Trade Deal: अमेरिका से मसूर दाल पर जीरो ड्यूटी की तैयारी, लेकिन बाकी दालों को नहीं मिलेगी राहत
व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक फैक्टशीट में कहा गया कि भारत अमेरिका से आने वाले कई औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क घटाएगा या पूरी तरह खत्म करेगा. इसमें डीडीजीएस, रेड ज्वार, ड्राई फ्रूट्स, ताजे और प्रोसेस्ड फल, कुछ दालें, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स जैसे उत्पाद शामिल बताए गए.
India US trade deal: भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत के बीच दालों को लेकर एक अहम संकेत सामने आया है. सूत्रों के मुताबिक, भारत अमेरिका से सीमित मात्रा में मसूर दाल (लेंटिल) के आयात पर शून्य शुल्क (Zero Duty) की अनुमति दे सकता है. अभी तक मसूर दाल पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है. हालांकि, सरकार का यह रुख दूसरी दालों जैसे पीली मटर (येलो पीज) और काबुली चना के लिए नरम नहीं दिख रहा है. इन दालों पर फिलहाल कोई बड़ी छूट दिए जाने की संभावना कम मानी जा रही है.
व्हाइट हाउस की फैक्टशीट से बढ़ी चर्चा
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, मंगलवार को व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक फैक्टशीट में कहा गया कि भारत अमेरिका से आने वाले कई औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क घटाएगा या पूरी तरह खत्म करेगा. इसमें डीडीजीएस, रेड ज्वार, ड्राई फ्रूट्स, ताजे और प्रोसेस्ड फल, कुछ दालें, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स जैसे उत्पाद शामिल बताए गए. हालांकि, गौर करने वाली बात यह है कि इस सूची में सिर्फ “कुछ दालों” का जिक्र किया गया है. पिछले सप्ताह भारत-अमेरिका के बीच जो संयुक्त समझौता हुआ था, उसमें दालों का नाम साफ तौर पर नहीं लिया गया था. इसी वजह से बाजार और किसानों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है.
किन दालों पर अभी भी भारी टैक्स
फिलहाल भारत में पीली मटर पर 30 प्रतिशत और काबुली चने पर 40 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है. इसके अलावा इन दोनों पर 10 प्रतिशत कृषि उपकर (सेस) भी लिया जाता है. ऐसे में अगर इन दालों पर ड्यूटी घटाई जाती है, तो इसका सीधा असर घरेलू किसानों पर पड़ सकता है. यही वजह है कि सरकार इस मामले में काफी सतर्क नजर आ रही है.
मसूर पर ड्यूटी खत्म होने का असर कितना होगा?
अनाज और दाल व्यापार से जुड़े विशेषज्ञ राहुल चौहान (आईग्रेन इंडिया) का मानना है कि मसूर पर 10 प्रतिशत ड्यूटी हटने से बाजार पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा. उनके अनुसार, अमेरिका लाल मसूर (रेड लेंटिल) का बड़ा उत्पादक देश नहीं है, जबकि भारत में लाल मसूर की ही ज्यादा खपत होती है. भारत अभी भी अपनी जरूरत की मसूर मुख्य रूप से कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से आयात करता है.
हालांकि, अमेरिका से ग्रीन लेंटिल के आयात की संभावना जरूर बन सकती है. चौहान का कहना है कि जब भारत में अरहर (तुअर) की कीमतें बढ़ती हैं, तब अमेरिका से हरी मसूर का आयात बढ़ सकता है.
येलो पीज और काबुली चने पर संशय
व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि येलो पीज और काबुली चने पर अमेरिका अभी भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कमजोर स्थिति में है. अगर इन दालों पर आयात शुल्क शून्य किया गया, तो एक खतरा यह भी हो सकता है कि अमेरिका कनाडा से दालें खरीदकर भारत को री-एक्सपोर्ट करे. यही वजह है कि इन दोनों दालों पर सरकार कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहती.
वाणिज्य मंत्री के बयान से संकेत
7 फरवरी को मीडिया से बातचीत में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि अमेरिका को कुछ कृषि उत्पादों में रियायतें दी गई हैं, जिनमें कुछ दालें भी शामिल हैं. हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि मसूर के अलावा और कौन-कौन सी दालें इस दायरे में आएंगी.
उन्होंने यह भी कहा था कि कुछ उत्पादों पर ड्यूटी तुरंत शून्य की जाएगी, जबकि कुछ पर यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी होगी.
मसूर आयात के आंकड़े क्या कहते हैं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में मसूर दाल का कुल आयात 2024-25 में 27 प्रतिशत से ज्यादा घटकर 12.19 लाख टन रह गया, जिसकी कीमत करीब 916 मिलियन डॉलर थी. इससे पहले 2023-24 में यह आयात 16.76 लाख टन और 1.29 बिलियन डॉलर का था.
लेकिन अमेरिका से मसूर का आयात इस दौरान चार गुना बढ़कर 69,945 टन हो गया, जिसकी कीमत 78.43 मिलियन डॉलर रही.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में मसूर के भाव
आईग्रेन इंडिया की 5 फरवरी की रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ी हरी मसूर करीब 0.26 डॉलर प्रति पाउंड, जबकि एक्स्ट्रा लार्ज ग्रीन लेंटिल 0.22 डॉलर और छोटी हरी मसूर 0.20 डॉलर प्रति पाउंड पर कारोबार कर रही थी. वहीं, लाल मसूर के दामों में मजबूती देखी गई और पुराने स्टॉक की कीमत करीब 0.25 डॉलर प्रति पाउंड रही.