भारत में चीनी निर्यात बंद होने के बाद मिलों की बढ़ी टेंशन, पहले से हुए ऑर्डर फंसे… ISMA ने कही बड़ी बात

सरकार फिलहाल घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना चाहती है ताकि कीमतें ज्यादा न बढ़ें. अनुमान है कि इस सीजन के अंत तक देश में केवल 3.8 मिलियन टन क्लोजिंग स्टॉक बचेगा, जो करीब डेढ़ महीने की खपत के बराबर है. जबकि पिछले पांच वर्षों का औसत स्टॉक लगभग ढाई महीने की मांग के बराबर रहा है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 15 May, 2026 | 08:39 AM

ISMA sugar exports: भारत में चीनी निर्यात पर अचानक लगी रोक के बाद अब चीनी उद्योग की चिंता बढ़ने लगी है. उद्योग संगठनों का कहना है कि सरकार का फैसला घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन जिन निर्यात सौदों पर पहले ही समझौता हो चुका है, उन्हें पूरा करने के लिए कुछ समय दिया जाना चाहिए. उद्योग का मानना है कि अचानक प्रतिबंध लगाने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कंपनियों की साख प्रभावित हो सकती है.

ISMA ने सरकार से की राहत की मांग

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, ISMA ने सरकार से अपील की है कि पहले से तय किए गए निर्यात ऑर्डर पूरे करने की अनुमति दी जाए. संगठन के महानिदेशक दीपक बल्लानी ने कहा कि अगर पहले से हुए समझौतों को पूरा करने की इजाजत मिलती है, तो इससे वैश्विक बाजार में भारतीय सप्लायर्स की विश्वसनीयता बनी रहेगी. उन्होंने बताया कि नवंबर 2025 में केंद्र सरकार ने उस समय के उत्पादन अनुमान को देखते हुए चीनी निर्यात की अनुमति दी थी. उस वक्त उम्मीद थी कि देश में पर्याप्त उत्पादन होगा. लेकिन बाद में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख राज्यों में मौसम की खराब परिस्थितियों और कम उत्पादन के कारण स्थिति बदल गई.

उत्पादन में गिरावट बनी बड़ी वजह

रिपोर्ट के अनुसार पहले चीनी उत्पादन 30.5 मिलियन टन रहने का अनुमान था, लेकिन अब यह घटकर करीब 28 मिलियन टन रह सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि अक्टूबर 2025 में हुई बेमौसम बारिश की वजह से गन्ने की फसल प्रभावित हुई और रिकवरी रेट कम हो गया. इसका असर खासतौर पर महाराष्ट्र और कर्नाटक में देखने को मिला. अक्टूबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में करीब 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है. पूरे सीजन में कीमतें औसतन 5 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं.

सरकार की प्राथमिकता क्या है?

सरकार फिलहाल घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना चाहती है ताकि कीमतें ज्यादा न बढ़ें. अनुमान है कि इस सीजन के अंत तक देश में केवल 3.8 मिलियन टन क्लोजिंग स्टॉक बचेगा, जो करीब डेढ़ महीने की खपत के बराबर है. जबकि पिछले पांच वर्षों का औसत स्टॉक लगभग ढाई महीने की मांग के बराबर रहा है.

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकार चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत यानी MSP बढ़ाने के पक्ष में भी नहीं दिख रही. दूसरी तरफ गन्ने का FRP लगातार बढ़ रहा है. इसके साथ मजदूरी, कटाई, परिवहन, ब्याज और संचालन लागत भी लगातार बढ़ रही है.

मिलों पर बढ़ रहा आर्थिक दबाव

चीनी उद्योग का कहना है कि एथेनॉल कारोबार से भी पहले जैसी राहत नहीं मिल रही. तेल कंपनियों द्वारा एथेनॉल की खरीद धीमी बताई जा रही है और ब्लेंडिंग टारगेट को लेकर भी स्पष्टता नहीं है. ऐसे में चीनी मिलों की कमाई पर दबाव बढ़ रहा है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात बंद होने का असर सीमित रहेगा, क्योंकि पिछले दो वर्षों में कुल बिक्री में निर्यात की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से भी कम रही है. फिर भी लागत बढ़ने की वजह से इस सीजन में मिलों के मुनाफे में करीब 100 बेसिस पॉइंट की गिरावट आने का अनुमान है.

अगले सीजन में भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं

खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश में चीनी की कीमत लगभग 42 हजार रुपये प्रति टन तक पहुंच चुकी है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 10 प्रतिशत ज्यादा है. आने वाले समय में भी कीमतें मजबूत बनी रह सकती हैं.

चीनी उद्योग के अनुसार सरकार ने जो फैसला लिया है, उसके पीछे वजह जरूर होगी, लेकिन अचानक प्रतिबंध लगाने से व्यापारियों को नुकसान हो सकता है. उनका मानना है कि किसी भी बड़े फैसले से पहले उद्योग को कुछ समय देना बेहतर होता.

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